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Wednesday, November 7, 2012

वे कुछ भी नहीं देखते, कुछ भी याद नहीं करते

-मार्कंडेय काटजू


रौ में है रख्शे-ऐ-उम्र कहाँ देखिये थमे
नै हाथ बाग पर है, न पा है रकाब में
मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर सारतः आज के भारत की ऐतिहासिक परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करता है.
“रौ” का मतलब है रफ़्तार, “रख्श” का मतलब है घोड़ा (?), “उम्र” का मतलब है समय (इसका मतलब जिन्दगी भी है, लेकिन यहाँ इसका मतलब समय या युग है), “बाग” का मतलब घोड़े का “लगाम” और “रकाब” का मतलब पैर रखने का कुंडा.
इस तरह इस शेर का मतलब है- “समय का घोड़ा सरपट दौड़ रहा है, देखें यह कहाँ जा कर रुकता है/ घुड़सवार के हाथों में लगाम है, न उसके पैर ही कुंडे में हैं.”
ग़ालिब संभवतः 1857 के महान विप्लव के दौर में होने वाली घटनाओं के विषय में लिख रहे थे, जब घटनाएँ सरपट भाग रही थीं. लेकिन ग़ालिब की शायरी की खूबसूरती यही है (जो उर्दू की ज्यादातर शायरी में दिखती है) कि यह स्थान और काल के मामले में सर्वकालिक है.
आज के भारत में, इतिहास की रफ़्तार तेज हो गयी है. घटनाएँ पहले की तुलना में तेजी से घटित हो रही हैं और हर कोई अचम्भे में है कि आखिर इनका अंत कहाँ होगा.
मीडिया में एक के बाद एक घोटाले की रिपोर्ट आ रही है, जिनमें अमूमन उन राजनेताओं के लिप्त होने की बात होती है जो समाज के गरीब और वंचित तबकों के नाम पर कसमें खाते हैं.
टैलीरां (फ़्रांसिसी कूटनीतिग्य) ने बोर्बों वंश के राजाओं के बारे में कहा था कि उन्होंने- “कुछ भी नहीं देखा, कुछ भी याद नहीं किया और कुछ भी नहीं भूला.” अधिकतर भारतीय राजनेता भी आज किसी बोर्बों की याद दिलाते हैं. वे अपने खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश को नहीं देख रहे हैं, जो सारी हदें पर करता जा रहा है. वे इस बात को याद नहीं करते कि बोर्बों शासकों, हैप्सबर्गों और रोमोनोवों का क्या हश्र हुआ (पता नहीं, उन्हें इनके बारे में कुछ मालूम भी है या नहीं). और वे अपनी सत्ता और धन-दौलत को नहीं भूलते, वे यही सोचते हैं कि यह सब हमेशा कायम रहेगा, जैसा कि दुर्भाग्य के शिकार उपरोक्त राजवंशों के लोग सोचा करते थे.
अर्थव्यवस्था निर्णायक कारक है. योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने हाल ही में कहा कि भारतीय सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर में गिरावट आते-आते अब वह 5.5 फीसदी पर ठहर गयी है. यह सुहावनी तस्वीर स्टैण्डर्ड एंड पुअर की इस चेतावनी के एकदम विपरीत है जिसमें कहा गया है कि 24 महीने में भारतीय अर्थव्यवस्था का संप्रभु कर्ज मूल्यांकन (क्रेडिट रेटिंग) घट कर “रद्दी हालत” में पहुँच जायेगा.
जिस चीज को डॉ. अहलुवालिया जैसे अर्थशास्त्री नहीं देखते, वह यह है कि भारत में समस्या  उत्पादन को कैसे बढ़ाया जाय, यह नहीं है (भारी संख्या में इन्जीनियरों और तकनीशियनों तथा विपुल प्राकृतिक संसाधनों को देखते हुए इसे बड़ी आसानी से बढ़ाया जा सकता है) बल्कि समस्या यह है कि भारतीय जनता की क्रय शक्ति कैसे बढ़ाई जाय. आख़िरकार, जो भी उत्पादन होता है, उसे बेचना भी तो होता है, लेकिन बिकेगा कैसे, जबकि हमारी 75-80 फीसदी जनता गरीब है, जो लगभग 25 रुपये रोज पर गुजार-बसर करती है?
यही नहीं, अगर सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि केवल धनी लोगों को और अधिक धनी बनाने के काम आती हो, जबकि गरीब जनता महंगाई के चलते और भी कंगाल होती जा रही हो, तो जाहिर है कि तैयार होने वाला माल बिक ही नहीं सकता, क्योंकि लोगों में खरीदने की क्षमता नहीं है.
हाल के महीनों में, भारत के विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट आयी है. निर्यातोन्मुख उद्योगों को खास तौर पर करारा झटका लगा है, क्योंकि पश्चिमी देशों में मंदी आई हुई है.
भारत की तुलनात्मक स्थिरता का आधार आबादी का महज 15-20 फीसदी मद्ध्यम वर्ग है, जिसकी कुल संख्या, 120 करोड़ की भारी आबादी में लगभग 20-25 करोड़ होगी. हमारे माल और सेवाओं को यही तबका बाजार माँग मुहय्या करता है. आसमान छूती महंगाई के चलते इस मद्ध्यम वर्ग की क्रय शक्ति में भी गिरावट आ रही है. इसी का नतीजा है कि भारतीय स्थिरता की जमीन तेजी से खिसक रही है, जिसे हालिया आन्दोलनों में देखा जा सकता है.
विकराल गरीबी, भारी पैमाने पर बेरोजगारी, आसमान छूती महंगाई, ग़रीबों के इलाज का आभाव, किसानों की आत्महत्याएँ, बाल कुपोषण, इत्यादि, इन सब से एक विस्फोटक मिश्रण तैयार हुआ है. अगर बोर्बों अब भी नहीं जागे (फ़िलहाल जिसकी कोई उम्मीद मुझे दिख नहीं रही है) तो आने वाले समय में, भारत एक लम्बे समय तक चलने वाले उथल-पुथल और अराजकता की गिरफ्त में होगा, और अब वह दिन बहुत दूर नहीं.
(मार्कंडेय काटजू सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और प्रेस काउन्सिल ऑफ इण्डिया के अध्यक्ष हैं. द हिंदू में प्रकाशित अंग्रेजी लेख की साभार प्रस्तुति. अनुवाद- दिगम्बर.)   

Tuesday, August 28, 2012

दुनिया की अर्थव्यवस्था ढाँचागत संकट की गिरफ्त में (पांच भागों में)

पाँचवाँ भाग 


ढाँचागत संकट पूँजीवाद का व्यवस्थागत संकट है। इसमें वित्तीय महासंकट, दुनिया के अलगअलग देशों और एक ही देश के भीतर अलगअलग वर्गों के बीच बेतहाशा बढ़ती असमानता, राजनीतिक पतनशीलता और चरम भ्रष्टाचार, लोकतन्त्र का खोंखला होते जाना और राजसत्ता की निरंकुशता, सांस्कृतिक पतनशीलता, भोगविलास, पाशविक प्रवृति, अलगाव, खुदगर्जी, और व्यक्तिवाद को बढ़ावा, अतार्किकता और अन्धविश्वास का बढ़ना, सामाजिक विघटन और पहले से मौजूद टकरावों और तनावों का सतह पर आ जाना, प्रतिक्रियावादी और चरमपंथी ताकतों का हावी होते जाना तथा पर्यावरण संकट, धरती का विनाश और युद्ध की विभीषिका इत्यादि सब शामिल है। हालाँकि अपने स्वरूप, कारण और प्रभाव के मामले में इन समस्याओं की अपनीअपनी विशिष्टता और एकदूसरे से भिन्नता है, लेकिन ये सब एक ही जटिल जाला समूह में एकदूसरे से गुँथी हुई हैं तथा एक दूसरे को प्रभावित और तीव्र करती हैं। इन सबके मूल में पूँजी संचय की साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था है जो दुनिया भर के सट्टेबाजों, दैत्याकार बहुराष्ट्रीय निगमों और अलगअलग सरकारों के बीच साँठगाँठ और टकरावों के बीच संचालित होती है। इसका एक ही नारा हैमुनाफा, मुनाफा, हर कीमत पर मुनाफा ।वैसे तो दुनिया की तबाही के लिये आर्थिक संकट, पर्यावरण संकट और युद्ध में से कोई एक ही काफी है लेकिन  इन विनाशकारी तत्वों के एक साथ सक्रिय होने के कारण मानवता के आगे एक बहुत बड़ी चुनौती मुँह बाये खड़ी हैं। कुल मिलाकार यह संकट ढाँचागत है और इसका समाधान भी ढाँचागत बदलाव में ही है।


इस बुनियादी बदलाव के लिये वस्तुगत परिस्थिति आज जितनी अनुकूल है, इतिहास के किसी भी दौर में नहीं रही है। इस सदी की शुरुआत में रूसी क्रांति के समय पूरी दुनिया में मजदूर वर्ग की कुल संख्या दस करोड़ से भी कम थी, जबकि आज दुनिया की लगभग आधी आबादी, तीन अरब मजदूर हैं। इनमें बड़ी संख्या उन मजदूरों की है जो शहरी हैं और संचार माध्यमों से जुड़े हुए हैं। इनके संगठित होने की परिस्थिति पहले से कहीं बेहतर है। दूसरे, वैश्वीकरणउदारीकरणनिजीकरण की लुटेरी नीतियों और उनके दुष्परिणामों के चलते पूरी दुनिया में मेहनतकश वर्ग का असंतोष और आक्रोश लगातार बढ़ता गया है। इसकी अभिव्यक्ति दुनिया के कोनेकोने में निरंतर चलने वाले स्वत%स्फूर्त संघर्षों में हो रही है। तीसरे, आज उत्पादन शक्तियों का विकास उस स्तर पर पहुँच गया है कि पूरी मानवता की बुनियादी जरूरतें पूरी करना मुश्किल नहीं। फिर भी दुनिया की बड़ी आबादी आभाव ग्रस्त है और धरती विनाश के कगार पर पहुँच गयी है, क्योंकि बाजार की अंधी ताकतें और मुनाफे के भूखे भेड़िये उत्पादक शक्तियों के हाथपाँव में बेड़ियाँ डाले हुए हैं। इन्हें काट दिया जाय तो धरती स्वर्ग से भी सुन्दर हो जायेगी।

लेकिन बदलाव के लिये जरूरी शर्तमनोगत शक्तियों की स्थिति भी क्या अनुकूल है ? निश्चय ही आज दुनियाभर में वैचारिक विभ्रम का माहौल है और परिवर्तन की ताकतें बिखरी हुई हैं। ऐसे में निराशा और आशा, व्यक्तिवाद और सामूहिकता, अकेलापन और सामाजिकता, निष्क्रियता और सक्रियता, खुदगर्जी और कुरबानी, प्रगतिशीलता और प्रतिक्रियावाद, सभी तरह की प्रवृतियाँ समाज में संक्रमणशील हैं। बुनियादी सामाजिक बदलाव में भरोसा रखने वाले मेहनतकशों और उनके पक्षधर बुद्धिजीवियों का यह ऐतिहासिक दायित्व है कि जमीनी स्तर पर क्रान्तिकारी सामाजिक शक्तियों को चेतनासम्पन्न और संगठित करें। वर्तमान मानव द्रोही, सर्वनाशी सामाजिकआर्थिक ढाँचे के मलबे पर न्यायपूर्ण, समतामूलक और शोषणविहीन समाज की बुनियाद खड़ी करने की यह प्राथमिक शर्त है, जिसके बिना आज के इस चैतरफा संकट और विनाशलीला से निजात मिलना असम्भव है।

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चौथा भाग यहाँ पढ़ें

दुनिया की अर्थव्यवस्था ढाँचागत संकट की गिरफ्त में (पाँच भागों में)

चौथा भाग


इसमें कोई संदेह नहीं कि दुनिया को तबाही की ओर ले जाने वाला विश्वव्यापी आर्थिक संकट हो, पर्यावरण विनाश का खतरा हो या युद्ध और नरसंहार से होने वाली तबाही, ये सब प्राकृतिक आपदाएँ नहीं हैं। इनके लिये दुनियाभर के शोषकों द्वारा सोचसमझ कर लागू की गयी नीतियाँ जिम्मेदार हैं। 1990 के आसपास बर्लिन की दीवार ढहने, रूसी खेमे के पतन और युगोस्लाविया के बिखराव के बाद विश्वशक्तिसंतुलन में भारी बदलाव आया। राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और समाजवाद की ओर से 1917 की रूसी क्रांति सम्पन्न होने के बाद से ही पूँजीवादी खेमे को मिलने वाली चुनौती, वैसे तो सोवियत संघ में ख्रुश्चोव द्वारा तख्तापलट के बाद से ही लगातार क्षीण हो रही थी, अब रूसी साम्राज्यवादी खेमे की रहीसही चुनौती भी समाप्त हो गयी। इसके चलते पूरी दुनिया में अमरीकी चैधराहट वाले साम्राज्यवादी खेमे का पलड़ा भारी हो गया।

इस बदले हुए माहौल में विश्व पूँजीवाद को दुनिया के बाजार, कच्चे माल के स्रोत और सस्ते श्रम पर कब्जा जमाने का अनुकूल अवसर मिल गया। साथ ही आत्मनिर्भर विकास का सपना देखने वाले तीसरी दुनिया के तमाम शासकों ने भी हवा का रुख देखते हुए साम्राज्यवाद के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की देखरेख में वाशिंगटन आमसहमतिके नाम से एक नयी आर्थिक विश्व व्यवस्था का पुनर्गठन किया गया, जिसका मकसद सम्पूर्ण विश्व में पूँजी की लूट के मार्ग से सभी बाधाओं को एकएक कर हटाना था। तटकर और व्यापार पर आम सहमति (गैट) की जगह डंकल प्रस्ताव के अनुरूप विश्व व्यापार संगठन की स्थापना की गयी, जिसने दुनियाभर में बहुराष्ट्रीय निगमों, शेयर बाजार के निवेशकों और बैंकों की लूट का रास्ता आसान बना दिया। प्रकृति के दोहन और मानव श्रमशक्ति के शोषण की रफ्तार सारी सीमाएँ लाँघ गयी।

पूरी दुनिया पर पूँजीवाद की निर्णायक जीत और इतिहास के अंतकी दुंदुभि बजाते हुए दुनिया के पैमाने पर अतिरिक्त मूल्य की उगाही के लिये अमरीका की चैधराहट में आर्थिक नवउपनिवेशवादी व्यवस्था का एक मुकम्मिल ढाँचा तैयार किया गया। इस पिरामिडनुमा ढाँचे के शीर्ष पर अमरीका और उसके नीचे ग्रुप 7 के बाकी देश काबिज थे। उनके नीचे हैसियत के मुताबिक दूसरे पूँजीवादी देश और सबसे नीचे सम्राज्यवादी लूट और कर्जजाल में फँसकर तबाह हो चुके तीसरी दुनिया के देशों को जगह दी गयी थी। इस नये लूटतंत्र के अंदर माले गनीमत (लूट के माल) में किसे कितना हिस्सा मिलेगा, यह इस बात से तय होना था कि किस देश के पास कितनी पूँजी है और टेक्नोलॉजी का स्तर क्या है। अब संकट की घड़ी में इसकी कीमत भी अलगअलग देशों को अपनी हैसियत के मुताबिक ही चुकानी होगी, यानी क्रमश% ऊपर के पायदानों पर खड़े साम्राज्यवादी देश कम प्रभावित होंगे और सबसे गरीब, तीसरी दुनिया के देश पहले से भी अधिक तबाही के शिकार होंगे।

साम्राज्यवादी वैश्वीकरण की इन नीतियों ने पूरी दुनिया को एकाधिकारी पूँजी संचय की एक ऐसी व्यवस्था के भीतर जकड़ दिया, जिस पर कहीं से कोई अंकुश, कोई नियंत्रण नहीं रहा। यही कारण है कि इस नयी विश्व व्यवस्था में एक तरफ जहाँ अमीरीगरीबी के बीच की खाई बेहिसाब चैड़ी होती गयीदुनियाभर में अर्थव्यवस्थाएँ ठहराव और वित्तीय उथलपुथल का शिकार हुईं, दूसरी ओर हमारी धरती भी विनाश के कगार पर पहुँचा दी गयी। लेकिन इस के बावजूद, विश्व पूँजीवाद का अन्तर्निहित संकट हल होने के बजाय और भी घनीभूत, और भी असमाधेय होता गया। कारण यह कि श्रम की लूट और पूँजी संचय जितने बड़े पैमाने पर होगा, पूँजी निवेश का संकट उतना ही विकट होता जायेगा। यह एक ऐसा दुष्चक्र है, जो पूँजीवाद के प्रारंभिक दौर, मुक्त व्यापर के जमाने से ही बना रहा है। लेकिन एकाधिकारी पूँजी के मौजूदा दौर में यह संकट इसलिए असाध्य है, क्योंकि यह अब सम्पूर्ण पूँजीवादी व्यवस्था का ढाँचागत संकट बन चुका है।

प्रारम्भिक पूँजीवाद के दौर में आने वाला आवर्ती संकट और वर्तमान ढाँचागत संकट के बीच साफसाफ फर्क है। इसे स्पष्ट रूप से समझकर ही भविष्य की सही दिशा तय की जा सकती है। क्योंकि नयी और जटिल समस्याओं का समाधान पूराने सूत्रों और समीकरणों से नहीं हो सकता। आवर्ती या मीयादी संकट जब भी आता था, तो उसका समाधान पहले से स्थापित ढाँचे के भीतर ही हो जाता था, लेकिन आज का बुनियादी संकट समूचे ढाँचे को ही संकट ग्रस्त कर देता है। यह किसी एक भौगोलिक क्षेत्र या उद्योग की किसी खास शाखा तक या किसी खास अवधि तक सीमित नहीं होता। यह सर्वग्रासी होता है, जिसकी चपेट में वित्त, वाणिज्य, कृषि, उद्योग और सभी तरह की सेवाएँ आ जाती हैं।

पुराने जमाने में उच्च स्तर कि तकनोलॉजी और उत्पादकता वाले उद्योग गलाकाटू प्रतियोगिता और मंदी की मार से बच जाते थे, लेकिन एकाधिकारी वित्तीय (सटोरिया) पूँजी के वर्तमान दौर में, सर्वग्रासी संकट की घड़ी में अब ये कारक उद्धारकर्ता की भूमिका नहीं निभा सकते। उल्टे आज तकनीकी श्रेष्ठता वाले विकसित पूँजीवादी देशों में ही संकट ज्यादा गहरा है।

दूसरे, ऐसा नहीं कि मंदी एक खास अवधि तक ही बनी रहे तथा पूँजी और उत्पादक शक्तियों की क़ुर्बानी लेने के बाद फिर आर्थिक गतिविधियों का ग्राफ उठने लगे, जैसा पुराने दौर में हुआ करता था।अब तो अर्थव्यवस्था मंदी में दोहरी, तिहरी डुबकी लगाने के बाद भी उससे उबर नहीं पाती। सीमित समय के लिये चक्रीय क्रम में आने वाली मंदी अब चिरस्थायी और दीर्घकालिक चरित्र ग्रहण कर चुकी है।

तीसरे, पुराने समय में मंदी किसी एक देश या एक भौगोलिक क्षेत्र तक ही सीमित होती थी। दुनिया का बहुत बड़ा हिस्सा, जो पूँजीवादी दुनिया का अंग नहीं बना था, वहाँ भले और ढेर सारी समस्याएँ थीं, लेकिन पूँजीवादी संकट जैसी किसी चीज का अस्तित्व नहीं था। पूँजी के वैश्वीकरण के मौजूदा दौर में विश्वअर्थव्यवस्था आपस में इस तरह अंतरगुम्फित है कि धरती के किसी भी कोने से शुरू होने वाला संकट धीरेधीरे पूरी दुनिया में पाँव पसारने लगाता है। अमरीकी गृह ऋण संकट का बुलबुला फटने के बाद से अब तक की घटनाएँ इस बात की जीतीजागती मिसाल हैं।



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तीसरा भाग 

जहाँ तक हथियारों की होड़ और युद्ध का सवाल है, चरम परजीवी और मरणासन्न वित्तीय पूँजी के इस युग का एक चारित्रिक लक्षण है युद्ध। पिछली एक सदी के इतिहास पर नजर डालें, तो शायद ही कोई दिन गुजरा होगा जब धरती के किसी न किसी कोने में साम्राज्यवादियों द्वारा थोपा गया युद्ध या गृहयुद्ध जारी न रहा हो। 1929 की महामंदी के बाद भी व्यापार युद्ध और आगे चलकर विश्व युद्ध की फिजा बनने लगी थी और अपने संकट से निजात पाने के लिये साम्राज्यवादी खेमे ने पूरी दुनिया को विश्वयुद्ध की आग में झोंक दिया था। आज स्थिति हूहू वैसी ही नहीं है। साम्राज्यवादी देशों के बीच फिलहाल आपसी कलह और टकराव का स्तर वहाँ नहीं पहुँचा है कि वे आमनेसामने खड़े हो जायें। खेमेबंदी और गलाकाट प्रतियोगिता उसी रूप में नहीं है। लेकिन संकट गहराने के साथ ही अंदरअंदर टकराव और मोर्चाबंदी चल रही है। नये संश्रय कायम हो रहे हैं, एक धु्रवीय विश्व की छाती पर नयीनयी गोलबन्दियाँ हो रही हैं। हालाँकि अभी अमरीका को सीधे चुनौती देने वाला कोई गुट नहीं उभरा है, लेकिन विश्व रंगमंच की ढेर सारी घटनाएँ बताती हैं कि अब बीस साल पहले वाली बात नहीं रही। वाशिंगटन आम सहमतिके भीतर दरार दिखने लगे हैं, चाहे ईरान पर प्रतिबन्ध की बात हो, सीरिया का मामला हो या संयुक्त राष्ट्र संघ के विभिन्न प्रस्तावों का।

आने वाले समय का अनुमान लगाने के लिये सितम्बर 2002 में प्रकाशित अमरीकी सुरक्षा रणनीति दस्तावेज पर गौर करना जरूरी है, जिसमें कहा गया था कि हम दूसरी महाशक्तियों का मजबूती से प्रतिरोध करेंगे।...हम महाशक्तियों के बीच प्रतियोगिता की पुरानी बुनावट के दुबारा उभरने की सम्भावना के प्रति सचेत हैं। आज अनेक महाशक्तियाँ आतंरिक संक्रमण से गुजर रही हैं, जिनमें रूस, भारत और चीन अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।... यह अमरीकी सैन्य शक्ति की अनिवार्य भूमिका को एक बार फिर सुनिश्चित करने का समय है। हमें अपने सुरक्षा बल का इस तरह निर्माण और देखरेख करना जरूरी है, कि कोई उसे चुनौती न दे सके।इस दस्तावेज में असली चिन्ता चीन को लेकर थी । उल्लेखनीय है कि इसी के बाद से भारत में महाशक्ति बनने का शेखचिल्लीपन पैदा हुआ जो बेबुनियाद है बहरहाल एक ध्रुवीय विश्व और साम्राज्यवादी समूह के निर्विकल्प चै/ारी की यह चिंता वैश्वीकरण के इस दौर में काफी महत्त्व रखता है ।
सच तो यह है कि आज विश्व शांति के लिये अमरीका से बढ़कर कोई दूसरा खतरा नहीं है । इसकी अर्थव्यवस्था भले ही लगातार नीचे लुढ़क रही हो, सैनिक ताकत के मामले में आज भी इसका कोई सानी नहीं। पिछले बीस बरसों से दुनिया के कुल सैनिक खर्च का एक तिहाई अकेले अमरीका करता है। 2011 में यह खर्च चीन से पाँच गुना, रूस से दस गुना, भारत से पन्द्रह गुना और ईरान से चालीस गुना था। आर्थिक रूप से संकट ग्रस्त होने के बावजूद अमरीका अपनी सैनिक वरीयता बनाये हुए है और इसी से अपनी आर्थिक बर्बादी की क्षतिपूर्ती करता है। सैनिक मामलों में अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये उसके पास दो बहाने हैंतेल के स्रोतों पर कब्जा और चीन का भय।

साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था में शामिल होने के बाद चीन का जिस तरह विकास और विस्तार हुआ है, उसे देखते हुए अमरीका का यह भय बेबुनियाद नहीं। चीनी अर्थवयवस्था सट्टेबाजी पर नहीं, बल्कि मूलत% वास्तविक उत्पादन के दम पर गतिमान है। दो सौ साल देर से पूँजीवादी दौड़ में शामिल होने के बावजूद, लगभग तीन दशकों तक वहाँ लागू की गयी समाजवादी नीतियाँ और उत्पादक शक्तियों का चहुँमुखी विकास आज भी वहाँ पूँजीवादी विकास का उत्प्रेरक है। दुनिया के कुल लौह अयस्क की सालाना खपत का 30 प्रतिशत, इस्पात 27 प्रतिशत, अल्युमिनियम 25 प्रतिशत, कोयला 31 प्रतिशत और पेट्रोलियम का 7 प्रतिशत अकेले चीन करता है। उसने ईरान से 7,000 करोड़ डॉलर का तेल और गैस खरीदने का सौदा किया है। चीन का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 2,300 अरब डॉलर है, जिसमें से 1,700 अरब का निवेश डॉलर परिसंपत्तियों में किया हुआ है। निश्चय ही ये तथ्य अमरीका को बेचैन करने के लिये काफी हैं।

अमरीकी नेशनल इंटेलिजेंस काउन्सिल ने कहा था कि दुनिया की अर्थव्यवस्था में उभरती ताकतें अमरीकी वर्चस्व के लिये चुनौती हैं। हालाँकि अभी यह मुख्यत% व्यापार, पूँजी निवेश, नयी तकनोलॉजी और दूसरी कम्पनियों के अधिग्रहण के इर्दगिर्द ही है । व्यापार युद्ध को वास्तविक युद्ध बदलते देर नहीं लगती। इसी बौखलाहट में अमरीका ने चीन को घेरने की एक बहुआयामी और दीर्घकालिक योजना बनायी है, जिसमें जापान, आस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया में इंटरसेप्टर मिसाइल लगाना, ताईवान को हथियारों से लैस करना और भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी शामिल हैं। हालाँकि चीन आज भी साम्राज्यवादी शक्ति नहीं बना है, लेकिन भविष्य की गति इसी दिश की ओर संकेत करती है।

आज साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच में आपसी टकराव और उनके युद्ध आसन्न नहीं है, लेकिन इसकी सम्भावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता। कारण यह कि एकाधिकारी पूँजी के मरणासन्न और चिरस्थाई ढाँचागत संकट के मौजूदा दौर में साम्राज्यवाद अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये मानवता को युद्ध की आग में झोंकने से भी बाज नहीं आयेगा। पहला और दूसरा विश्व युद्ध आर्थिक संकट का ही नतीजा था, जो अब पहले से भी विकट हो चुका है । विश्व युद्ध भले ही न हों, लेकिन उद्धत अमरीका का जो युद्धोन्माद इराक, अफगानिस्तान और लीबिया में दिखायी दिया, वही अब इरान और सीरिया के खिलाफ दिख रहा है। हालाँकि अमरीका की अब वैसी ही साख नहीं है जो इराक और अफगानिस्तान पर हमले के समय थी।

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दुनिया की अर्थव्यवस्था ढाँचागत संकट की गिरफ्त में (पाँच भागों में)


दूसरा भाग 

औद्योगिक क्रांति के बाद लगातार
200 सालों तक कोयला, पेट्रोलियम और ऊर्जा के अन्य साधनों के अंधाधुंध इस्तेमाल और कच्चा माल के लिये प्राकृतिक संसाधनों के बेतहाशा दोहन के चलते धरती तेजी से गर्म होती गयी। नतीजा यह कि साइबेरिया के बर्फीले मैदान पिघल रहे हैं और उनसे मिथेन गैस का रिसाव हो रहा है जो धरती और जलवायु के लिये कार्बन डाई ऑक्साइड से 30 गुना ज्यादा खतरनाक है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक महासागर की बर्फीली सतह और हिमालय सहित दुनियाभर के ग्लेसियर पिघलने से समुद्र का जलस्तर हर साल 2 सेंटी मीटर ऊपर उठ रहा है। इसी का नतीजा है 1998 में बांग्लादेश का 65 प्रतिशत इलाका बाढ़ में डूब गया था। 16 लाख की आबादी वाले भोला द्वीप का आधा हिस्सा बाढ़ में बह गया। अनुमान है कि ग्लोबल वार्मिंग से पैदा होने वाली बीमारियों की चपेट में आने से बांग्लादेश के डेढ़ लाख लोग हर साल मर जाते हैं। बांग्लादेश ही नहीं, दुनिया के कई इलाके ऐसा ही प्रकोप झेल रहे हैं।

विकास के नाम पर पूँजीवाद ने पूरी दुनिया में जो विध्वंस किया है उसके कारण आज हर घंटे पौधे और जानवरों की तीन प्रजातियाँ लुप्त हो जा रही हैं । पिछले 35 सालों में ही रीढ़धारी प्राणियों की एक तिहाई प्रजातियाँ धरती से गायब हो गईं। और अब इंसानों की बारी है। पूर्वी अफ्रीका के अर्धसिंचित इलाकों में बारिस न होने के चलते इथोपिया, सोमालिया, केन्या और सूडान में लगातार सूखा पड़ रहा है । दारफुर में 1984–85 के अकाल में एक लाख लोग मर गये । यह हालत तो तब है जब कार्बन की मात्रा 3870 लाख अंश प्रति टन है। अनुमान है कि जल्दी ही यह 4000–4500 लाख अंश प्रति टन हो जाने वाला है। इसके कारण धरती का औसत तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ जायेगा और जलवायु में अचानक भारी बदलाव आयेगा। तब धरती को बचाना भी असम्भवप्राय हो जायेगा।

दुनियाभर के वैज्ञानिक धरती पर मँडराने वाले खतरे की चेतावनी दे रहे हैं, लेकिन शोषकशासक पूँजीपति वर्ग के कान पर जूँ नहीं रेंगती। वे ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठकर जश्न मना रहे हैं और पूरी धरती को विनाश की ओर धकेल रहे हैं। विश्व पर्यावरण सम्मेलन मजाक बन कर रह गये हैं। पृथ्वी सम्मेलन (1992) से लेकर रियो सम्मेलन (2012) तक, और इन बीस वर्षों में हुए क्वेटो, कोपेनहेगन और कानकुन बैठकों की असफलता से जाहिर है कि दुनिया के शासकों को धरती के विनाश की कोई परवाह नहीं। उल्टे अब वे जलवायु संकट या ग्लोबल वार्मिंग की सच्चाइयों को ही झुठलाने पर आमादा हैं।

साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के बाद से प्रकृति का दोहन और ऊर्जा का इस्तेमाल पहले से कईकई गुना अधिक हो गया है। भारत में भी आज देशीविदेशी पूँजी के नापाक गठबंधन से हर तरह के खनिज पदार्थ की लूट अपने चरम पर है। इसके लिये कानून की धज्जी उड़ाना, उन इलाकों के निवासियों को उजाड़ना और विरोध के स्वर को बंदूकों के दम पर कुचलना, औपनिवेशिक दौर में गुलाम बनाये गये देशों पर ढाये जाने वाले कहर की याद ताजा करते हैं। पहले जो दमनउत्पीड़न विदेशी आक्रांता करते थे, वही अब बहुराष्ट्रीय निगमों के साथ साँठगाँठ करके अपने ही देश के शासक कर रहे हैं।