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Thursday, August 2, 2012

पावर ग्रिड ठप्प या कल्पनाशीलता का लोप?

कल दुनिया के सबसे बड़े बिजली संकट के कारण ट्रेन यातायात बाधित रहा

-एम जी देवसहायम
(लेखक श्री देवसहायम एक सेवानिवृत्त भारतीय प्रसाशनिक अधिकारी [आईएएस] और हरियाणा राज्य विद्युत बोर्ड के पूर्व प्रमुख हैं.)   

मंगलवार को दोपहर एक बजे एक-के-बाद एक तीन ग्रिड फेल होने के कारण इतिहास का सबसे बड़ा बिजली संकट आया जिसने 60 करोड़ लोगो को अपनी चपेट में ले लिया.
राष्ट्रीय पावर ग्रिड एक छोर पर ट्रांसमिसन लाइनों और विद्युत उत्पादन केन्द्रों से जुड़े सब-स्टेशनों और दूसरे छोर पर लोड केन्द्रों (या वितरण कम्पनियों) का आपस में गुथा हुआ जाल है. उत्पादन केन्द्र ट्रांसमिसन लाइनों के जरिये ग्रिड को बिजली भेजते हैं. लोड केन्द्र इन लाइनों से बिजली लेकर अंतिम छोर पर मौजूद उपभोक्ताओं को देते हैं.

बिजली कि आपूर्ति में अवरोध न हो, इसके लिए उत्पादन और खपत के बीच हमेशा एक नाजुक  संतुलन बनाये रखना जरूरी होता है.
भारत में पाँच बिजली ग्रिड हैं- उत्तरी, पूर्वी, उत्तरपूर्वी, दक्षिणी और पश्चिमी. सरकारी कम्पनी पावर ग्रिड कार्पोरेशन, जो उन 95,000 हज़ार सर्किट किलोमीटर से भी ज्यादा ट्रांसमिसन लाइनों का संचालन करती है, जिन के जरिये ये ग्रिड काम करते हैं. इन पाँच ग्रिडो में तीन ग्रिड- उत्तरी, पूर्वी और उत्तरपूर्वी मंगलवार को बैठ गये.
कोई ग्रिड तभी फेल होता है जब इससे जुड़े राज्य या तो इसकी क्षमता से ज्यादा बिजली निकासी करने लगते हैं या उत्पादन केन्द्र से बहुत ज्यादा बिजली आने लगती है. ग्रिड फेल होने का इससे कोई लेना-देना नही होता कि बिजली उत्पादन की स्थापित क्षमता या इसकी मात्रा कितनी है.

क्षमता से ज्यादा बिजली निकासी का मतलब यह है कि एक दिन पहले ग्रिड आपरेटर को जो  रिपोर्ट दी जाती है, जिसमें उस दिन बिजली का कितना उपभोग होना है इसका हर 15 मिनट का ब्यौरा होता है, उसमें बताई गयी क्षमता से ज्यादा बिजली की निकासी करना. केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग हर राज्य के लिए बिजली निकासी की सीमा तय करता है, जो राज्यों और उत्पादक कम्पनियों के बीच हुए समझौते पर आधारित होता है.

ग्रिड फेल होने की मुख्य जिम्मेदारी पवार ग्रिड कार्पोरेशन और नेसनल लोड डिस्पैच सेंटर की होती है और यह विभिन्न उत्पादन, ट्रांसमिसन और वितरण कम्पनियों की भी साझा जिम्मेदारी होती है.
इसका मूल कारण बिजली से सम्बंधित विभिन्न संस्थाओं में फैली सडांध है जिनके पास प्रबंधन का कोई दर्शन नहीं है और जो वितरण और विभाजन की कार्यकुशलता को बिलकुल महत्त्व नहीं देते. वे केवल अधिक से अधिक विद्युत उत्पादन का राग अलापते रहते हैं, और वह भी केंद्रीकृत, क्योंकि उसमें भारी पूँजी निवेश होता है तथा घूसखोरी और भ्रष्टाचार की भरपूर गुन्जाइश होती है.
बिजली विहीन भारत ‘अंधा युग’ में प्रवेश कर रहा है. इसका एक मात्र समाधान है एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना. इसमें विकेन्द्रित रूप से अलग-अलग जगहों पर उत्पादन करना (ग्रिड से इतर अक्षय ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता), वितरण और विभाजन का आधुनिकीकरण, माँग पक्ष का प्रबंधन और अंतिम उपभोक्ता तक पहुँचाने में कार्यकुशलता, सब शामिल है. बिजली उपभोग के मामले में प्रबंध संस्कृति के प्रतिमान में भी बदलाव लाना जरूरी है.
 (अनुवाद- सतीश)

Thursday, September 15, 2011

भ्रष्टाचार के प्रति भद्रलोक का भ्रामक नजरिया - दिगम्बर


र्तमान समाज में प्रचलित और स्थापित धारणा यही है कि अपनी पद-प्रतिष्ठा और जिम्मेदारी का दुरुपयोग करके अपने और अपने खास लोगों के स्वार्थों कि पूर्ति करना तथा पूंजीवादी नैतिकता के मानदंडों और कानूनों का उल्लंघन करके नाजायज धन-संपत्ति जमा करना भ्रष्टाचार है. एक दूसरे प्रकार का भ्रष्टाचार भी है जिस पर यह पूरी समाज व्यवस्था टिकी हुई है, लेकिन वह हराम या गैर-कानूनी नहीं है- पूंजीवादी शोषण और लूट-खसोट. उदाहरण के लिए श्रम का निर्मम शोषण, प्राकृतिक संसाधनो का बेहिसाब दोहन, निजीकरण के नाम पर सार्वजनिक सम्पात्ति का मालिकाना निजी पूंजीपतियों को सौंपना, पूंजीपतियों को टैक्स में छूट और हर तरीके से उनकी तिजोरी भरना, जनता पर टैक्स लादकर मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, नौकरशाहों और बुद्धिजीवियों के लिए मोटी तनख्वाहों, राजसी ठाट-बाट और विशेषाधिकारों का इंतजाम करना. पूंजीवादी नैतिकता के अनुसार ये भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं आते, लेकिन बहुसंख्य मेहनतकश वर्गों और मानवता की दृष्टि से यह सब निकृष्ट और भ्रष्ट आचरण है. भ्रष्टाचार के खिलाफ धर्मयुद्ध छेडने वाले योद्धा इस दूसरे तरह के भ्रष्टाचार की कहीं कोई चर्चा नहीं करते, उनकी निगाह में ये सभी काली करतूतें नैतिक और जायज हैं, केवल स्थापित कानूनों का उल्लंघन करके काला धन बटोरना ही भ्रष्टाचार है जबकि भ्रष्टाचार का ये कानूनी प्रकार इस समूचे लूटतंत्र के आगे कुछ भी नहीं. लेकिन इसकी चर्चा बाद में. पहले प्रचलित अर्थों में भ्रष्टाचार को ही लें, जो लोगों को प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है, जिसे लेकर लोगों के मन में आक्रोश है और जिसकी रोक-थाम के लिए आज विश्व बैंक, सरकार और भद्रलोक एनजीओ अपने-अपने तरीके से जोर लगा रहे हैं.
भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के भद्रलोक एनजीओ नेता भ्रष्टाचार के प्रति सतही और भ्रामक नजरिया अपनाते हैं. कैसे?
पहला-- वे रोग के लक्षण को ही रोग बताते हैं, महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की तबाही और लाखों की संख्या में आत्महत्याएं, मजदूरों का निर्मम शोषण, अमीरी-गरीबी के बीच बढ़ती खाई, बहुसंख्य जनता की कंगाली, बदहाली और प्रवंचना, सांस्कृतिक पतनशीलता और अन्य तमाम लक्षणों की तरह भ्रष्टाचार भी वर्तमान रुग्ण पूंजीवादी व्यवस्था के लाइलाज रोग का एक लक्षण मात्र है. लेकिन भ्रष्टाचार विरोधी धर्मयोद्धा यह भ्रम फैला रहे हैं कि भ्रष्टाचार समाज कि सभी बुराइयों की जड़ है जिसे खत्म कर दिया जाय तो सारी समस्याओं का अंत हो जायेगा.
अपने रोजमर्रे की जिंदगी में आये दिन लोगों का भ्रष्टाचार से सामना होता रहता है. हर छोटे-बड़े काम के लिए उन्हें रिश्वत देनी पड़ती है. इसी का फायदा उठाकर भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के कर्ता-धर्ताओं ने इसे देश कि सारी समस्याओं की जड़ बनाकर पेश किया. कारपोरेट नियंत्रित मीडिया-- टीवी, रेडियो और अखबारों ने अपने धुआँधार प्रचार के द्वारा आम लोगों के मन में इसे कॉमन सेंस की तरह स्थापित कर दिया है. हर कॉमन सेंस की तरह यह भी सरासर गलत है. इसके लिए एक सूत्र अजमाया जाय. हर व्यक्ति अपने एक साल का लेखा-जोखा ले कि उसने कितनी जगह कितनी रिश्वत दी. उससे उसे खुद कितना फायदा हुआ? नहीं देने से कितना नुकसान होता? पता चलेगा की 20 रुपये रोज पर गुजर-बसर करने वाले 80 फीसदी लोगों की जिन्दगी में भ्रष्टाचार की कोई गुंजाइश ही नहीं है. यही कारण है कि इन 80 फीसदी लोगों को भद्रलोक इस लायक नहीं समझता कि वे उसके भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में झण्डा, टोपी और टैटू के साथ शामिल हों. आम माध्यम वर्ग के लिए भी यह ढेर सारी समस्याओं में से एक है.
भ्रष्टाचार कि तरह ही पूंजीवादी रोग का एक लक्षण महंगाई है जिसके चलते हर आदमी को अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ता है, चाहे 20 रूपये पर गुजारा करने वाले हों या हजारों रुपये मासिक कमाने वाले. तुलना करें कि एक साल में किसने हमारा कितना अधिक प्रत्यक्ष दोहन किया? बेरोजगार यह सोचें कि यदि सम्मानजनक रोजगार मिल जाये तो पिछले एक साल में भ्रष्टाचारियों को दी गयी रिश्वत की तुलना में उसका कितना फायदा होता? खेती तबाह न हो तो कोई किसान आत्माहत्या करने के बजाय क्या ब्याज चुकाना और घूस देना पसंद नहीं करेगा? इन बातों का मतलब भ्रष्टाचार का समर्थन करना नहीं बल्कि उनके ‘कॉमन सेंस’ का जवाब उन्हीं की भाषा में देना है. क्योंकि इसी पद्धति से भ्रष्टाचार विरोधी भ्रष्टाचार को सबसे बड़ी समस्या बना कर उसे लोगों के मष्तिस्क में रोप रहे हैं. भ्रष्टाचार को लक्षण की जगह रोग बताने वाले ये ध्वजाधारी वास्तव में लोगों का ध्यान जनता की मूल समस्याओं-- महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की तबाही, आम जनता की बढती बदहाली और कानून के संरक्षण में हो रहे देशी-विदेशी पूंजीपतियों की बेलगाम लूट से हटा रहे हैं, जिनके मूल में नवउदारवादी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है. इसके चलते लोगों को लगता है कि जन लोकपाल बनने और लोकपाल का पद सृजन होने से उनकी सारी समस्याएं हल हो जाएँगी. इस तरह जनता का गुस्सा कुछ समय के लिए शांत हो जायेगा. आंदोलनकारियों का यही मकसद है .
दूसरा— भ्रष्टाचार की जड़ तक पहुँचने, उसका कारण तलाशने या उसके असली स्रोतों को निशाना बनाने और उसे निर्मूल करने के बजाय भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलनकारी केवल ऊपरी तौर पर सुधार करने और कानून के जरिये इस पर रोक लगाने की बात करते हैं. इस कानून के अधीन देशी-विदेशी पूंजीपतियों को लाने से इन्कार करते हैं और केवल उनके निरंतर जारी भ्रष्टाचार में सहयोग करने वाले नेताओं और नौकरशाहों के खिलाफ कानून बनाने कि बात करते हैं. 2जी स्पेक्ट्रम का घोटालेबाज में ए. राजा तो पहले से मौजूद कानून के तहत ही जेल में है. लेकिन जिन मोबाइल कंपनियों को उसके जरिये 1,75,000 करोड़ का मुनाफा हुआ उन देशी-विदेशी पूंजीपतियों को इस नये कानून के अधीन लाने का कहीं कोई जिक्र नहीं है. इसी तरह वे व्यस्थापोषक मीडिया और एनजीओ को भी इस कानून की पकड़ से बाहर रखने के हिमायती हैं.
अन्ना टीम यह मानकर चलती है कि भ्रष्टाचार केवल सरकारी संस्थानों में ही है. इसीलिए वे निचले स्तर तक के सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने कि मांग करते हैं. सरकारी स्कूल, अस्पताल और सरकारी सेवाओं के भ्रष्टाचार के प्रति उनकी चिंता जायज है. लेकिन आज निजीकरण के चलते शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, सड़क और पानी-बिजली का जिम्मा नाम मात्र ही सरकार के अधीन है. ये सारे कारोबार अब निजी पूंजीपति और एनजीओ सम्भाल रहे हैं जिन पर कोई सरकारी अंकुश नहीं है, सरकारी लोकपाल और जनलोकपाल दोनों में ही उन्हें शामिल नहीं किया गया. इसमें अचरज की कोई बात नहीं, क्योंकि दोनों ही पक्ष नवउदारवादी नीतियों के प्रबल समर्थक हैं और दोनों को पूंजीपतियों के भ्रष्टाचार से कोई शिकायत नहीं है.
1991 में नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद जितने भारी पैमाने पर भ्रष्टाचार की घटनाएं सामने आई हैं उसने माध्यम वर्गीय लोगों में तीव्र आक्रोश उत्पन्न किया है. अन्ना के आह्वान पर ऐसे लोग सडकों पर उतरे. अन्ना टीम ने उस जनाक्रोश को सही दिशा देने और भ्रष्टाचार की जड़ों पर प्रहार करने के बजाय उसे सतही और बेमानी सुधारों के ठन्डे पानी में डुबो दिया क्योंकि इस भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का अंतिम लक्ष्य केवल एक अदद कानून बनाना था. निजीकरण-उदारीकरण के नाम पर देश की सार्वजनिक सम्पदा और प्राकृतिक संसाधनों को कौडियों के मोल पूंजीपतियों के हवाले करने वाली नीतियों को पलटे बगैर किसी भी कानून से इस भ्रष्टतंत्र पर कोई आंच नहीं आने वाली है. इस विषय पर अन्ना टीम मौन है. भ्रष्टाचार का स्रोत देशी-विदेशी पूंजीपति हैं. पूंजीवादी-साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था और उसके असली मालिक पक्ष–विपक्ष की पार्टियों के नेता और नौकरशाह दिन-रात उनकी सेवा में जुटे रहते हैं. अपनी अपार संपत्ति के दम पर पूंजीपति वर्ग अपने मनोनुकूल कानून बनवाने और लागू करवाने के लिए नेताओं, नौकरशाहों, मीडिया, पत्रकारों, विशेषज्ञों और लॉबिंग करने वालों को खरीदते हैं. वे करोड़ों की रिश्वत देकर अरबों-खरबों की लूट करते हैं. चाहे सरकारी लोकपाल हो या अन्ना का जन लोकपाल, दोनों में से किसी ने भी इनको निशाना नहीं बनाया. शायद यही कारण है कि अन्ना के आन्दोलन को इन्हीं पूंजीपतियों का प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोग और समर्थन हासिल हुआ.
विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी साम्राज्यवादी संस्थाएं और बहुराष्ट्रीय निगम दुनिया भर में भ्रष्टाचार के बहुत बड़े स्त्रोत हैं. इस पर अनेक शोध, अध्ययन और लेख प्रकाशित हो चुके हैं. तीसरी दुनिया के देशों के शासन-प्रशासन के ढाँचे को भ्रष्ट करके अपने मनोनुकूल नीतियां बनवाना, अपने गुप्त समझौतों और दुरभिसंधियों को लागू करवाना, अपने लिए बड़े-बड़े ठेके और परियोजनाएं हासिल करना, हथियार के सौदे करना, अपने निर्यात को सुलभ बनाना, प्राकृतिक संसाधनों को हथियाना इनके रोजमर्रे के काम हैं. भारत में बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार की जमीन इन्हीं विदेशी ताकतों और देशी पूंजीपतियों की मिलीभगत से तैयार हुई है. जब भ्रष्टाचार का कोई ठोस मामला किसी तरह उजागर हो जाता है तो वह सबको दिख जाता है और लोगों को गुस्सा भी आता है. लेकिन कानूनी लबादे से ढका हुआ भ्रष्टाचार का विकट दानव हमें नहीं दिखाई देता. हम उसे स्वाभाविक मानते हैं क्योंकि विकास के नये मंत्र के रूप में सब हमारे मन-मष्तिस्क में रोप दिया जाता है. अन्ना टीम इसी स्थिति का लाभ उठाते हुए केवल सतही भ्रष्टाचार को निशाना बनाते हैं और इसके लिए भारी समर्थन भी हासिल कर लेते हैं.
तीसरा- भ्रष्टाचार को लेकर हाय-तौबा मचाने वाले नैतिकता के प्रचारक, धर्मोपदेशक, अर्थशास्त्री, समाज सुधारक, पत्रकार और बुद्धिजीवी, इसके वर्गीय आधारों पर पर्दा डालते हैं और इसे लोभ-लालच की सामान्य मानवीय प्रवृत्ति और नैतिक पतन का नतीजा मानते हैं. वे हीरा चुराने वालों और खीरा चुराने वालों को एक ही तराजू पर तौलते हैं. इस तरह यह आम धारणा बन गयी है कि हमारे समाज में सभी लोग भ्रष्ट हैं. यह सरासर झूठ है.
समाज के विभिन्न वर्गों और भ्रष्टाचार के साथ उनके संबंधों की जांच करें तो इस प्रचलित धारणा से एकदम अलग ही तस्वीर सामने आती है. कुछ वर्ष पहले प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो.अरुण कुमार ने भारत में भ्रष्टाचार पर अपना अध्ययन प्रस्तुत किया था जिसके अनुसार उस दौरान देश में 25,00,0000 करोड़ की काले धन की सामानांतर अर्थव्यवस्था मौजूद थी. इस अपार काली कमाई के लिए जिम्मेदार कौन है? इस पर किसका कब्ज़ा है?
हमारे देश में लगभग 30 करोड़ लोग शहरों में रहते हैं जिनमें से आधी आबादी छोटे-मोटे धंधो में लगे लोगों और मेहनतकशों की है. देश की कुल अर्थव्यवस्था में इनका हिस्सा बहुत कम है तथा भ्रष्टाचार और काले धन की अर्थव्यवस्था में इनकी भागीदारी नगण्य है. शहरी आबादी के बाकी आधा भाग का अधिकांश हिस्सा ही भ्रष्टाचार में लिप्त है जिनके शीर्ष पर पूंजीपति, उद्योगपति और उनका प्रबंध तंत्र, डीलर, डिस्ट्रीब्यूटर, कमीशन एजेंट, सट्टेबाज तथा निर्माण, रियल इस्टेट, शिक्षा,स्वास्थ्य, मनोरंजन, पेंशन और सेवा क्षेत्र के विभिन्न व्यवसायों के मालिक और सरकारी अधिकारी, कर्मचारी, छोटे-मझोले पूंजीपति, व्यापारी और अन्य परजीवी शामिल हैं. ये सब आपस में मौसेरे भाई हैं. ग्रामीण आबादी का एक बहुत छोटा और नगण्य हिस्सा ही काले धन कि अर्थव्यवस्था में शामिल है क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था में ग्रामीण इलाके की भागीदारी बहुत कम, लगभग 20% है. प्रोफ़ेसर अरुण कुमार का अनुमान है कि आबादी का 3% उपरी हिस्सा ही काले धन की अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा लिप्त है. यदि छोटे-बड़े सभी तरह के भ्रष्टाचार को ले लिया जाय तो यह दायरा 15% उपरी तबके तक जाता है. एक अध्ययन के मुताबिक देश की आधी आय ऊपरी 20% लोगों के हाथ में जाती है. यानि इतनी बड़ी आमदनी के साथ-साथ यही उपरी तबका 25,00,0000 लाख करोड़ के काले धन पर भी काबिज है. इसी काले धन कि बदौलत इस वर्ग का इस देश की सत्ता पर भी नियंत्रण है जिसके जरिये यह धनाढ्य वर्ग कानूनी तौर पर अपने लिए मोटी तनख्वाह और सुविधाएं (वेतन आयोग बनाकर या संसद में प्रस्ताव पास करके) जुटाने के अलावा, टैक्स में छूट, सरकारी धन का बंदरबाँट, अरबों का फायदा पहुँचाने के बदले करोड़ों की रिश्वत और हर तरह के जुगाड़ से सार्वजनिक संपत्ति की कानूनी-गैरकानूनी लूट में दिन रात शामिल रहता है. यही तबका वैश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण का सबसे बड़ा पैरोकार और नवउदारवादी लूटतंत्र का सामाजिक आधार है. इसे अपने अलावा सभी भ्रष्ट नजर आते हैं और सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार पर प्रवचन भी यही लोग देते हैं. अन्ना के आन्दोलन में भी इसी तबके के लोग सबसे आगे थे. अपनी सुविधानुसार भ्रष्टाचार को लेकर इनके अलग-अलग बोध हैं. इनका मानना है कि इनकी परिभाषा के मुताबिक़ जो भ्रष्टाचार है, उसे खत्म कर दिया जाये तो यह व्यवस्था सुचारू रूप से चलने लगेगी. सरकार और सिविल सोसाइटी के बीच टकराव का कारण यही अलग-अलग बोध है. अगर देश में पहले से ही मौजूद कानूनों को कड़ाई से लागू कर दिया जाय तो शायद इस तबके के कुछ लोगों को छोड़कर बाकी सभी जेल की सलाखों के पीछे होंगे. लेकिन व्यवस्था को चलाने वाले लोग भी चूँकि इसी तबके से हैं, इसीलिए हमारे यहाँ छोटे चोरों को सजा होती है और बड़े चोरों को पुरस्कृत किया जाता हैI जब तक चोरी पकड़ी नहीं जाती, तब तक हर चोर प्रतिष्ठित नागरिक होता है, चाहे कलमाड़ी हों, ए.राजा, हसन अली, रेड्डी बंधु, यदुरप्पा या अलां-फलां... सूची अंतहीन है. सत्ता के शीर्ष पर विराजमान लोगों तथा सफेदपोश और संगठित अपराधियों के बीच गहरे रिश्ते हैं. लोकपाल की जगह साक्षात ब्रह्मा-विष्णु-महेश भी आ जायें तो वे भी इस व्यवस्था के रहते कुछ नहीं कर पाएंगे.
दरसल भ्रष्टाचार इस व्यवस्था का अलिखित विधि-विधान और समान्तर कार्य-प्रणाली है. यह इस व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में ग्रीस और मोबिल ऑयल का काम करता है. भ्रष्टाचार से एकत्रित काले धन का एक हिस्सा स्विस बैंक या लिचेंस्टीन बैंक में जमा होता है फिर विश्व अर्थव्यवस्था में सफ़ेद बनकर दौड़ता है. (भारत में विदेशी निवेश और कर्ज के रूप में वापस आकर प्रतिष्ठित होता है.) दूसरा भाग अपने ही देश में सफ़ेद होकर पूँजी में बदल दिया जाता है और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का वैधानिक हिस्सा बन जाता है. इस कार्य के लिए एक पूरी कार्य प्रणाली विकसित हुई है- दान-पुण्य से लेकर खेती की आय, मनोरंजन उद्योग, भवन निर्माण उद्योग और यहाँ तक की मनी लैंडरिंग (काले धन की स्वैछिक घोषणा ) कानून तक. ताजा समाचार यह है कि भारत के पूंजीपतियों ने सरकार से विदेशों में जमा कला धन आसानी से वापस लाने के लिए क़ानून बनाने की अपील कि है ताकि पूंजी निवेश कि समस्या हल हो. इस तरह वर्तमान दौर में भ्रष्टाचार की बेलगाम बढ़ती प्रवृत्ति दरअसल आदिम पूँजी संचय का ही एक रूप है. यह आदम-हव्वा के द्वारा वर्जित फल खाने की तरह ही पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का आदिम पाप है. पूँजी शिष्टाचार से पैदा नहीं होती, जन्म से ही वह खून और कीचड़ से लथपथ होती है.
वैश्वीकरण के इस दौर में अर्थतंत्र और राजनीति के बीच, सार्वजनिक और निजी स्वार्थों के बीच तथा व्यवसाय और जनसेवा के बीच के सारे फर्क मिटाए जा रहे हैंI इसी के साथ सत्ता की राजनीति खुद ही एक नग्न रूप ले चुकी हैI एक जमाना था जब इसे ठीक नहीं माना जाता था हालाँकि तब भी सत्ता की राजनीति पूंजीवादी व्यवसाय को संरक्षण देने और बदले में अपने लिए उनसे चंदा लेने का काम करती थी जो स्वीकृत और जायज था. अक्सर यह भ्रम फैलाया जाता है कि लोकतंत्र में सरकार का काम बाजारवाद और पूँजीवादी अर्थतंत्र पर अंकुश रखना है, ताकि वे जनता का निर्मम शोषण न करें. सच्चाई यह है कि सरकार का काम पूँजीवाद की हिफाजत करना है. नेहरूवाद के दौर में इस पर समाजवाद-संरक्षणवाद का पर्दा पड़ा हुआ था जिसे अब हटा दिया गया है. अब पूंजीपति और उनके नुमाइंदों के बीच का अंतर काफी हद तक मिट गया है. यही कारण है कि पूँजीवाद द्वारा श्रम की वैधानिक लूट और शोषण, जो वास्तव में भ्रष्टाचार ही है, उसे काफी पीछे छोड़ते हुए हर कीमत पर मानव श्रम, प्राकृतिक संसाधन और सार्वजनिक संपत्ति की लूट-खसोट में ज्यादा तेजी आयी है. इसके साथ ही भ्रष्टाचार का नंगा नाच भी पहले से कई गुना अधिक बढ़ा है. इंदिरा गाँधी के ज़माने में जो 10 लाख रुपये का नागरवाला कांड हुआ था, वह आज के हर्षद मेहता, हसन अली, कलमाड़ी और ए. राजा कांड के आगे भला क्या था? ‘भद्रलोक’ को पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और पूंजीवादी शोषण के बेलगाम होने से कोई शिकायत नहीं है. वे सतह पर दिखने वाले भष्टाचार के इस घिनौने चेहरे से लज्जित हैं और इसे खत्म करके पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की छवि सुधारने का अपना कर्त्तव्य निभा रहे हैं. इससे आगे वे देखना नहीं चाहते.
अमेरिका के कहने पर मणि शंकर अय्यर को हटा कर मुरली देवड़ा को पेट्रोलियम मंत्री बनाना, क्योंकि अमेरिका इरान-पकिस्तान-भारत गैस पाइप लाइन के विरुद्ध था, यह कहाँ का शिष्टाचार है? पूंजीपतियों का एक समूह एक लौबिस्ट को भरपूर पैसा देकर अपने मनमाफिक आदमी ए.राजा को संचार मंत्री बनवाता है, अतीतग्रस्तता के कारण गुटनिरपेक्षतापूर्ण बयानबाजी कि जुर्रत करने वाले विदेश मंत्री नटवर सिंह को निकाल बाहर करना और वे तमाम बातें जिनका खुलासा विकिलिक्स ने किया, भला किस कोटि का आचार हैं? बिना लेन-देन के ही सही, सार्वजनिक संपत्तियों की कोड़ियों के मोल नीलामी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में असमान व्यापार समझौते, नाभिकीय समझौते पर संसद की मोहर लगवाने के लिए खरीद-फरोख्त (जिसके बारे में सर्वोच्च न्यायालय ने पूंछा है कि इतना पैसा कहाँ से आया?) यह सब नैतिकता की किस कोटि में आते है? ऐसे मामलों में ‘भद्रलोक’ गाँधी जी के तीन बंदरों कि तरह आचरण क्यों करता है?
सबसे बड़ी बात यह कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में कोई भी भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन जाता है, जब व्यवस्था के संचालक किसी भ्रष्ट आचरण-व्यवहार या पेशे को कानूनी जामा पहना देते हैं, जैसे- वित्तमंत्री के मुख्या सलाहकार कौशिक बासु ने कुछ विशेष प्रकार की रिश्वतखोरी को वैधानिक बना देने का सुझाव दिया और शीर्षस्थ पूंजीपति नारायणमूर्ति सहित अनेक लोगों ने इसका समर्थन भी किया. लॉबिंग को परामर्श सेवा का दर्जा देने कि चर्चा चल रही है, पैसा लेकर सवाल पूछने और अमेरिका की तरह यहाँ भी सांसदों को लॉबी बनाने की इजाजत देने की सिफारिश कुछ साल पहले भाजपा ने की थी. काले धन को सफ़ेद करने के लिए कानून बनाया जाना, सोने के आयात की छूट देना, सीमा शुल्क 350% से घटाकर 10% कर देना, श्रम कानूनों में ढील देकर मजदूरों के निर्मम शोषण को कानूनी रूप देना, उदारीकरण-निजीकरण के जरिये पूँजी को बेलगाम छूट देना, 1991 से पहले गैर कानूनी समझे जाने वाले काले धंधों (काला बाजारी, सट्टेबाजी, जमाखोरी, कर चोरी) को कानून बनाकर वैधानिक करार देना भी उसके अन्य उदाहरण हैं. विदेशों से सोना लाने वाले तश्करों पर अब फिल्में नहीं बनती. नेपाल से विदेशी उपभोक्ता वस्तुओं की तश्करी अब पुराने ज़माने की बात हो गयी है. ऐसे ढेर सारे धंधे जो 1991 से पहले भ्रष्टाचार की श्रेणी में आते थे आज वे शिष्टाचार हैं. अभी ढेर सारे ऐसे भ्रष्टाचार है जो शिष्टाचार की श्रेणी में बदले जाने की प्रतीक्षा में है. सम्भव है कि लोकपाल के पदभार सँभालने तक भ्रष्टाचार के ढेर सारे मामले उनके दायरे से बाहर हो जायें. संसद में अस्सी से अधिक कानून पास होने कि बात जोह रहे हैं.
भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के ध्वजवाहक लोगों में लोकरंजक शैली में कहते हैं कि ‘सरकार नौकर है और हम सब उसके मालिक हैं’. वे यह नहीं बताते कि आखिर क्यों यह नौकर अपने मालिक की छाती पर मूंग दल रहा है? लोकतंत्र बहुमत की इच्छा न होकर कुलीनतंत्र क्यों है? राज्य के संचालकों के पास जितने अधिकार केंद्रित होते हैं उसके कारण उनका नौकर से मालिक बन जाना, भ्रष्टाचार रोकने के बजाय उसका स्रोत बन जाना लाजिमी है. साथ ही, यह प्रक्रिया उतनी ही तेज होती जाती है जितनी तेजी से गरीबी-अमीरी की खाई चौड़ी होती जाती है, बहुसंख्य जनता कंगाली के गर्त में धकेली जाती है, उसे राज-समाज के काम-काज में भागीदार होने के लायक नहीं समझा जाता (क्योंकि सरकारी नीतियों के चलते भद्रलोक की तुलना में राष्ट्रीय आय में उनका हिस्सा लगातार कम से कमतर होता जाता है) और सरकार के विभिन्न अंग जितना अधिक खुद को जनता से दूर करते जाते हैं. भ्रष्टाचार की आपराधिक कार्यवाहियों के अलावा शासक वर्ग अपने विशेष अधिकारों के दम पर अपने और अपने सहयोगियों के वेतन-भत्ते और सुविधाएं, जनता की बहुमत की औसत आय (जहाँ 77% लोग 20 रूपया रोज पर गुजर करते हैं) से कई कई गुना अधिक बढ़ाते चले जाते हैं. आर्थिक हैसियत के साथ-साथ उनकी सामाजिक हैसियत भी बढ़ती है और वे जनता के ऊपर सवारी गांठने वाले नये राजा-महाराजा बनते जाते हैं. आज की पीढ़ी के लिए कल्पना करना शायद कठिन हो कि पहले अधिकांश नेता (भले ही उनके विचार पूंजीवादी हों और वे मूलतः पूंजीपतियों के ही नुमाइंदे रहे हों) आज से बहुत कम सुविधा संपन्न थे. बसों में आज भी ‘सांसद और विधायक सीट’ लिखा दिख जाता है जो बताता है कि पहले वे लोग भी बसों में सफर करते रहे होंगें. जनता की बढ़ती कंगाली की कीमत पर अपने लिए वैभव-विलास जुटाने कि यह कार्यवाही खुली तानाशाही के अधीन तो होती ही है, लेकिन उन लोकतान्त्रिक देशों में भी निर्बाध रूप से होती है जहाँ राज्य के केवल एक अंग (विधायिका) का मतदान के द्वारा चुनाव करने की औपचारिकता के अलावा ऊपर से नीचे तक किसी भी ‘लोकतान्त्रिक’ संस्था में या उसकी कार्यवाहियों में जनता की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होती. राज्य के प्रमुख कार्यकारी अंग नौकरशाही और न्यायतंत्र का चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से नहीं होता, बल्कि इन विशेषाधिकार प्राप्त और सुविधा संपन्न लोगों को जनता पर ऊपर से थोप दिया जाता है. निगम नियंत्रित मीडिया भी जिसे लोकतंत्र का पहरेदार कहा जाता है, बाजार और मुनाफे से प्रेरित है और मुनाफाखोरी के परम हितैषी है. पिछले दिनों मीडिया-नेताओं-पूँजीपतियों की दुरभिसंधियों के एक से बढ़कर एक मामले सामने आये. कुल मिलाकर इनमें से कोई भी संस्था जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है. इन सबका हित जनता के विपरीत है. इनको जनता का नौकर बताना जनभावनाओं को सहलाना और लोगों को भरमाना है. भ्रष्टाचार की जननी, इस पूरी व्यवस्था की असलियत बताने और पर्दाफाश करने के बजाय उसी पर निर्भर रहते हुए भ्रष्टाचार मिटाने की बात करना, उसे और अधिक मजबूत बनाने के लिए कठोर कानून की हिमायत करना और उसके प्रति अन्धश्रद्धा को बढ़ावा देना दरसल भ्रष्टाचार को चिरस्थायी बनाना है. भ्रष्टाचार की जड़ पर प्रहार करने के बजाय उस पर अंकुश लगाने के लिए प्रशासनिक और कानूनी सुधारों की मांग करना जनता में व्याप्त व्यवस्था विरोधी असंतोष और आक्रोश को शांत करना और उसके मन में व्यवस्था के प्रति विश्वास पैदा करने का प्रयास मात्र है. जब तक राज्य के सभी अंगों का जनता से अलगाव दूर नहीं होता, राज्य चलाने के कार्यों में जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित नही होती, राज्य के सभी अंग जनता के प्रति पूरी तरह से जवाबदेह नहीं होते, चुने जाने, चुनने और वापस बुलाने का अधिकार सही मायने में बहुमत के हांथों में नहीं आता, तब तक ‘नौकर के मालिक बन बैठने’ और उसे भ्रष्ट होने से दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं सकती. यह सतही सुधारों या कानूनी फेर-बदल से नहीं होगा. लूट पर टिकी पूंजीवादी अर्थव्यस्था के रहते इनमें से कुछ भी सम्भव नहीं है.

भ्रष्टाचार के खिलाफ टीम अन्ना का आन्दोलन : एक विश्लेषण - दिगम्बर

टीम अन्ना के नेतृत्व में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए एक सशक्त लोकपाल पद का सृजन करने और जन लोकपाल कानून बनाने को लेकर चल रहा आंदोलन 28 अगस्त की सुबह 10 बजे अन्ना हजारे द्वारा ‘आमरण अनशन’ तोड़ने के साथ समाप्त हो गया. आंदोलन के नेतृत्व ने यह घोषणा की थी कि प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने सहित अपनी किसी भी मांग से वे पीछे नहीं हटेंगे और जन लोकपाल बिल संसद में पारित होने तक अन्ना का अनशन जारी रहेगा. इसके लिए सरकार को 1 सितम्बर तक का समय दिया गया था. लेकिन सुलह-समझौते और नाटकीय घटनाक्रम के बाद आखिरकार कम महत्व वाली तीन मांगो पर सहमति को आधार बनाकर एक भव्य आयोजन के साथ अनशन समाप्त हो गया.

अपने जन लोकपाल बिल के समर्थन में अन्ना हजारे ने 16 अगस्त से दिल्ली में आमरण अनशन करने कि घोषणा की थी. सरकार ने इसकी इजाजत नहीं दी और 16 अगस्त की सुबह अनशन शुरू करने से पहले ही अन्ना हजारे और उनके समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया. इस घटना ने आग में घी का काम किया. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोटने की इस कुकृत्य ने सरकार के प्रति लोगों में व्याप्त आक्रोश को और अधिक तीव्र कर दिया. टीवी चैनलों ने इस पूरे प्रकरण का सीधा प्रसारण किया. छोटी से छोटी घटना को लगातार दिखाने और आन्दोलन का बढ़-चढकर प्रचार-प्रसार करने से शहरी मध्यम वर्ग प्रभावित हुआ. लोग उद्वेलित होकर खुद-ब-खुद सड़कों पर उतरने लगे.

इस घटना में जल्दी ही एक नाटकीय मोड़ आया जब कुछ ही घंटो के भीतर अन्ना टीम और उनके समर्थकों को सरकार ने रिहा कर दिया. लेकिन तिहाड़ जेल से बाहर आने के बजाय अन्ना ने जेल के अंदर ही अनशन शुरू कर दिया. 16 अगस्त कि रात और 17 अगस्त को दिनभर दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के साथ अन्ना टीम की समझौता वार्ता चलती रही. आखिरकार सरकार ने 21 दिन के लिए रामलीला मैदान में अनशन और प्रदर्शन की इजाजत भी दे दी. दिल्ली नगर निगम ने दिन-रात एक करके रामलीला मैदान की सफाई और अस्थायी शौचालय की व्यवस्था की और वहाँ सुरक्षा का भी विशेष इंतजाम किया. (याद रहे कि इसी रामलीला मैदान में अपने खर्चे पर भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे स्वामी रामदेव और उनके समर्थकों पर पुलिस ने आधी रात को अचानक हमला किया था.) बाद की हर एक घटना से अधिकांश परिचित हैं क्योंकि अन्ना की गिरफ़्तारी के बाद से ही सारे के सारे समाचार चैनल पूरे देश की बाकी ख़बरों को किनारे लगते हुए अन्ना आन्दोलन की हर छोटी-बड़ी घटना का 24*7 घन्टे सीधा प्रसारण करते रहे. इस आन्दोलन को ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’, ‘व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई’, और ऐसे ही प्रचंड और पाखंडपूर्ण उद्घोष करने के लिए टीवी चैंनलों और अखबारों में होड़ लग गयी.

रामलीला मैदान के मंच पर नामी-गिरामी लोगों, फ़िल्मी सितारों, खिलाड़ियों, गायकों, कवियों, धर्मगुरुओं और समाज सेवियों का जमावड़ा तथा उत्तेजनापरक, अतिशयोक्तिपूर्ण और लोकलुभावन भाषण का क्रम अविरल जारी था. उधर सरकार और अन्ना टीम के बीच समझौता वार्ता और कई स्तर पर मंत्रणाएं चलती रहीं. कई मध्यस्थ आये और गए जिनमें धर्मगुरु, पार्टियों के नेता, एनजीओ मठाधीश और यहाँ तक कि आदर्श घोटाले के आरोपी विलास राव देशमुख जैसे लोग प्रमुख भूमिका में रहे. और जैसा कि पहले ही तय था कि आन्दोलन का पटाक्षेप भ्रष्टाचार विरोधी कानून और एक पद सृजन के लिए आपसी समझौते में होगा, अंततः हुआ भी वही. इस बीच आन्दोलन के नेतृत्व की संरचना और उसके समर्थकों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, भ्रष्टाचार के प्रति नेतृत्वकारी लोगों का दृष्टिकोण, आन्दोलन का तौर-तरीका और यहाँ तक कि उनके आर्थिक स्रोत, राजनीतिक पार्टियों के साथ उनके सम्बन्ध और प्रतिक्रियावादी ताकतों के साथ संश्रय को लेकर भी बहुत सारे प्रश्न उठे. लेकिन जनता के एक खास तबके की स्वतःस्फूर्त पहलकदमी देखकर कई संगठन और व्यक्ति इतने अभिभूत और भाव विह्वल हो गए कि उन्होंने उपरोक्त सवालों को जनता से कटे निष्क्रिय बुद्धिजीवियों का प्रलाप कहकर ख़ारिज कर दिया. कारपोरेट मीडिया के अहर्निश प्रचार-प्रसार से जो बवंडर उठा, उसने कई विवेकशील, विचारवान और जनपक्षधर बुद्धिजीवियों, संगठनों को भी असमंजस में डाल दिया. अब, जबकि यह तूफ़ान थम गया है और अन्ना आन्दोलन ‘आधी जीत’ की अपनी चरम परिणति तक पहुँच गया है, इस पूरी परिघटना पर विचार करना जरूरी है ताकि भविष्य के लिए जरूरी सबक और कार्यभार निकाले जा सकें.

अन्ना टीम की मुहिम यदि केवल एक कानून बनवाने और एक लोकपाल पद के सृजन तक ही सीमित होती तो इसे गंभीरता से लेने की जरुरत नहीं थी. पूंजीवादी लोकतंत्र में ऐसे दबाव समूह और पैरोकार (लौबिस्ट) होते हैं जो किसी खास मामले में सरकार पर दबाव बनाते रहते हैं. उनके उद्देश्य बहुत सीमित होते हैं. लेकिन रामलीला मैदान के मंच से जिस तरह ‘व्यवस्था परिवर्तन’, ’संपूर्ण क्रांति’, ’लोकतंत्र की पुनर्बहाली’ और ‘दूसरी आजादी’ का शब्द-जाल फैलाया गया, उसने कई सारे लोगों के मन में फर्जी उम्मीद जगायी और भ्रम फैलाया है. लोग इस व्यवस्था से त्रस्त हैं और अपनी रोज-बरोज की समस्याओं से मुक्ति चाहते हैं. अपनी इन्हीं आकांक्षाओं और भावनाओं के साथ लोग अन्ना की ओर आकर्षित हुए. और अब अन्ना आन्दोलन को महिमामंडित करके उसे जनांदोलनों के एक आदर्श नमूने के रूप में स्थापित करने का प्रयास चल रहा है. ऐसी स्थिति में यह जरूरी है कि इस पूरे प्रकरण का तथ्यपरक विश्लेषण किया जाय और देखा जाय कि यह समूह अपने बड़े-बड़े दावों को पूरा करने लायक है भी या नहीं. इसके लिए हम मुख्यतः छ: मानदंडों पर अन्ना टीम और उसके लोकपाल आन्दोलन को जांचने कि कोशिश करेंगे.

(1- विचारधारा और राजनीति (2- उद्देश्य, कार्यक्रम और मांग (3- सांगठनिक उसूल और कार्य प्रणाली (4- नेतृत्व की संरचना (5- समर्थक और जनाधार (6- मीडिया की भूमिका और (7- आर्थिक स्रोत.

शब्दाडम्बरों से नहीं बल्कि इन्हीं मानदंडों से हम किसी भी संगठन या आन्दोलन को परख सकते हैं कि वह वास्तव में किन वर्गों या तबकों की नुमाइंदगी करता है.

विचारधारा और राजनीति

अन्ना टीम कि कोई सुसंगत, सुनिश्चित और समान विचारधारा नहीं है. इसमें परम्परावादी और आधुनिकतावादी, धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष, तरह-तरह के विचारों वाले लोग शामिल हैं. एक बात सबमें साझा है कि इनमें से कोई भी बुनियादी बदलाव (रेडिकल चेंज) का समर्थक नहीं है. अधिक से अधिक इन्हें सुधारवादी माना जा सकता है. इसमें परस्पर विरोधी आस्थाओं वाले धार्मिक समूह हैं, सीमित उद्देश्य के लिए काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) हैं और कुछ महत्वाकांक्षी लोग हैं जिनकी कोई सुसंगत सोच नहीं है. मुस्लिम समाज के प्रति विष-वमन करने वाले वरुण गाँधी और सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोगों से इस टीम को कोई गुरेज नहीं है. आरक्षण विरोधी ‘यूथ फॉर इक्वेलिटी’ से भी इन्हें कोई परहेज नहीं है. खुद अन्ना हजारे गुजरात नरसंहार के आरोपी नरेन्द्र मोदी और गैरमराठी ‘बाहरी लोगों’ के विरुद्ध नफरत फ़ैलाने वाले राज ठाकरे के प्रसंशक हैं. वे ‘नोट के बदले वोट’ के आरोपियों को फांसी देने कि मांग करते हैं, लेकिन यह साजिश किसने और क्यों की, इस पर वह मौन रहते हैं .

अन्ना हजारे ने अपने गाँव रालेगण सिद्धि में जो आदर्श गाँव का मॉडल बनाया है, वह प्रतिगामी विचारों पर आधारित है. वहाँ जातिगत पेशे में लगे लोगों को अपना-अपना काम निष्ठापूर्वक करना जरुरी है. उनका मानना है कि हर आदर्श गाँव में एक लोहार, एक सुनार, एक कुम्हार और एक चमार परिवार का होना जरूरी है, ताकि गाँव आत्मनिर्भर बने. वहाँ पंचायत और कॉपरेटिव का चुनाव नहीं होता. दारू पीने और अन्य सामाजिक बुराइयां करने वालों की सार्वजनिक रूप से पिटाई की जाती है. जहिर है कि इन सब के पीछे अलोकतांत्रिक, वर्णाश्रम आधारित, ब्राह्मणवादी, सामंती सोच है. जन लोकपाल आन्दोलन की व्यावहारिक कार्यवाहियों के दौरान भी विभिन्न रूपों में इसका इजहार हुआ..

नवउदारवादी आर्थिक ‘सुधार’ हमारे देश का सबसे बुनियादी मसला है. इसने भारतीय समाज में पहले से मौजूद समस्याओं को तीखा किया है और नयी-नयी समस्याओं को जन्म दिया है (विराट और बेलगाम भ्रष्टाचार भी इनमें से एक है). उदारीकरण-निजीकरण की इन नीतियों के परिणामस्वरूप लाखों मजदूरों-किसानों ने आत्महत्या की है और अधिकांश जनता की जिंदगी नरक से भी बदतर हो गयी है. लेकिन अन्ना टीम का इन नीतियों से कोई विरोध नहीं है.

कोई भी विचार या नीति यदि बहुसंख्य मेहनतकश जनता के हित में नहीं है, उनके जीवन में खुशहाली लाने वाली नहीं है तो वह ‘व्यवस्था परिवर्तन’ का वाहक नहीं हो सकती. अन्ना टीम मेहनतकश जनता के प्रति पक्षधर और प्रतिबद्ध नहीं है. जिन राजनीतिक पार्टियों ने जनविरोधी, नवउदारवादी नीतियों को बढ़-चढ़ कर लागू किया, उनके सहयोग और समर्थन से ही वे जन लोकपाल कि मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं. अनशन की समाप्ति और ‘आधी जीत’ के लिए उन्होंने उन सबका आभार भी व्यक्त किया. विचारों की इस पंचमेल खिचड़ी के भरोसे सरकारी सहयोग से कोई कानून तो बनवाया जा सकता है, लेकिन क्या इसके दम पर ‘व्यवस्था परिवर्तन’ और ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’ लड़ना संभव है?

सांगठनिक उसूल और कार्य-प्रणाली

अन्ना टीम के जनलोकपाल आन्दोलन का संचालन कई ढीले-ढाले संगठनों और व्यक्तियों के तदर्थ गठबंधन द्वारा किया गया जिसमें शुरू से आखिर तक मतभेद और कलह मौजूद रहे हैं. इसके नेतृत्व का करिश्माई और मसीहाई अंदाज ही इसकी सामर्थ्य और सीमा थी, जिसके केंद्र में अन्ना हजारे थे. इसमें कर्ता अन्ना और उनकी टीम थी, आन्दोलन में शामिल भीड़ का काम उनकी हौसला अफजाई करना, उनकी ताकत बढ़ाना था ताकि सरकार उनके साथ समझौता करने पर राजी हो जाये. मध्यम वर्ग को हमेशा ही किसी महानायक या मसीहा का इन्तजार रहता है जो अपने चमत्कारी प्रभाव से बड़ा से बड़ा बदलाव लाने में समर्थ हो. अपनी पहल पर अनुशासित और योजनाबद्ध सांगठनिक कार्रवाई से उसे एलर्जी होती है. जन लोकपाल ने इस मध्यम वर्गीय प्रवृत्ति का भरपूर लाभ उठाया.

आज का दौर सचेत रूप से इतिहास निर्माण का दौर है जहाँ समाज की हर गतिविधि संगठित शक्तियां संचालित करती हैं. राज्य खुद ही ऊपर से नीचे तक पूरी तरह सुसंगठित और वर्गीय शासन को चलाने वाले हर तरह के अश्त्र-शस्त्र से सुसज्जित है. इसका सामना करने के लिए एक केंद्रीकृत, अनुशासित और मजबूत संगठन का होना अनिवार्य है. यह किसी की व्यक्तिगत इच्छा से स्वतंत्र, एक ऐतिहासिक तथ्य है.

भीड़ के सामने इस हवाई घोषणा का कोई मतलब नहीं कि ‘हम लोग’ संप्रभु हैं और सरकार जनता की नौकर है. ‘हम लोग’ अपनी संप्रभुता का इजहार और उसकी दावेदारी संगठन और अनुशासन के माध्यम से ही करते हैं. अगर ऐसा न हो तो ‘हम लोग’ किन्हीं खास लोगों को सत्ता के गलियारे तक पहुंचाने का जरिया हो सकते हैं, चाहे मतदान से या किसी अभियान से. ‘जनतंत्र के आदर्शों का आनंदोत्सव’ और लोकतंत्र के क्रियान्वयन में जमीन-आसमान का फर्क है. विभिन्न तबकों और वर्गों के जन संगठनों में रोज-बरोज के व्यावहारिक कामों के दौरान उससे जुड़े लोगों का जनवादीकरण और लोकतंत्र का क्रियान्वयन होता है. ऐसे संगठनों में समूह की इच्छा और बहुमत की राय सर्वोपरि होती है और व्यक्ति समूह के अधीन होता है, चाहे वह कितने भी अलौकिक गुणों और विलक्षण प्रतिभा से संपन्न क्यों न हो. नेता का कर्त्तव्य आन्दोलन और संगठन के उद्देश्य और कार्यक्रम से अपनी कतारों को परिचित कराना, उनकी चेतना बढ़ाना, उनके माध्यम से जनगण को गोलबंद और संगठित करना तथा आन्दोलन को सही दिशा में संचालित करना होता है. लेकिन जनता ही वास्तविक कर्ता होती है. अन्ना कि मुहिम जिन एनजीओ के हाथों में थी उनमें इस प्रकार का कोई संगठन नहीं है. वहाँ कार्यकारी टीम और वेतनभोगी कर्मचारी होते हैं जो निश्चित अवधि और इलाके के लिए निर्धारित और वित्तपोषित, सुधारात्मक परियोजनाओं का संचालन करते हैं. ऐसे संगठन अपने दानकर्ताओं की मदद से जनता के कल्याण और भलाई के लिए काम करते हैं, उन्हें गोलबंद और संगठित नहीं करते.

इतिहास का निर्माण कोटि-कोटि जनता के सचेत प्रयासों से होता है, किसी मसीहा या महानायक के चमत्कार से नहीं. लेकिन हमारे समाज में लोकतान्त्रिक चेतना के आभाव तथा अतीत से चली आ रही नायक-पूजा और अंधश्रद्धा के गहरे प्रभाव के कारण अक्सर किसी उद्धारक के पीछे भीड़ उमड़ पड़ती है. अन्ना कि मुहिम के दौरान भी ऐसा ही हुआ. रामलीला मैदान में उपस्थित जनसमूह की चेतना बढ़ाने के बजाय उनकी भावनाओं को उकसाने और अंधभक्ति को बढ़ावा देने के लिए आपातकाल के दौरान दिए गए ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ की पैरोडी बनाकर ‘अन्ना इज इंडिया, इंडिया इज अन्ना’ का नारा दिया गया. अन्ना टीम कि मुहिम में शामिल नाना प्रकार के सुधारवादियों का ढीला-ढाला मोर्चा जन लोकपाल कानून बनवाले, वही बहुत है. इतिहास का सबक है कि बुनियादी बदलाव के लिए वर्गों और तबकों के संगठित, सचेतन और धैर्यपूर्व संघर्ष कि जरूरत होती है.

अन्ना टीम का उद्देश्य और उनकी मांग

लोकपाल बिल के लिए आंदोलन चलाने वाली टीम अन्ना का उद्देश्य भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत और स्वतंत्र कानून बनवाना, विदेशों से काले धन की वापसी तथा चुनाव प्रणाली और न्याय व्यवस्था में सुधार लाना है.

अन्ना टीम भ्रष्टाचार को देश कि सबसे बड़ी समस्या मानती है. और इस समस्या के समाधान के लिए वह एक कठोर कानून और शक्तिशाली लोकपाल के गठन को अनिवार्य मानती है. अप्रैल 2011 में अन्ना हजारे के पहले अनशन के बाद सरकार ने अन्ना टीम के 5 प्रतिनिधियों को मिला कर लोकपाल कानून की ड्राफ्टिंग कमेटी बनायी, भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाने वाले कई दूसरे एनजीओ और रामदेव जैसे लोगों को उससे अलग ही रखा गया. बाद में सरकार ने अन्ना टीम के कई सुझावों को उसमें शामिल नहीं किया. उसने एक बेहद कमजोर लोकपाल का मसौदा तैयार किया जिसमे भ्रष्टाचारी के लिए न्यूनतम 6 माह और अधिकतम 10 वर्ष कि सजा तथा भ्रष्टाचार का आरोप गलत साबित होने पर शिकायतकर्ता को दो साल की सजा का प्रावधान है. अन्ना टीम की मांग थी कि प्रधानमंत्री, न्यायपालिका और नौकरशाही को लोकपाल के दायरे में लाया जाय. साथ ही लोकपाल कानून को क्रियान्वित करने के लिए 10 लोगों की ऐसी टीम बनायी जाय जो पुलिस, जांच एजेंसी और न्यायाधीश तीनों की भूमिका निभाने के लिए अधिकृत हो और सर्वशक्तिमान हो. अन्ना टीम का मानना है कि अगर उनके मसौदे के आधार पर लोकपाल बिल बन गया तो देश में 60 प्रतिशत भ्रष्टाचार कम हो जाएगा.

दरअसल भ्रष्टाचार के प्रति अन्ना टीम का नजरिया सतही और भ्रामक है. उनकी निगाह में देश कि सारी समस्याओं के मूल में भ्रष्टाचार है जिसके खत्म होते ही सभी मुसीबतें दूर हों जाएँगी. इस तरह वे लक्षण को रोग बताते हैं और उसे जड़ से मिटाने के बजाय निमहकीमी इलाज तजबीज करते हैं तथा महंगाई, बेरोजगारी, शोषण और लूट-खसोट से लोगों का ध्यान हटाने का प्रयास करते हैं. दूसरे, वे केवल कानून का उलंघन करके कला धन कमाने को ही भ्रष्टाचार मानते हैं. पिछले 20 वर्षों से सरकार कानून में फेर-बदल कर के श्रम और सार्वजनिक संपत्ति की लूट को बेलगाम करती जा रही है, 1991 के पहले जो जो भ्रष्टाचार था उन सब को शिष्टाचार में बदलती जा रही है, उससे उन्हें कोई उज्र नहीं.

जो लोग बेलगाम लूट-खसोट से निजात पाने के लिए अन्ना टीम के समर्थन में बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे, उनकी चाहत जायज है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था के बने रहते हुए एक कानून, एक संस्था और एक सर्वसत्ता सम्पन्न लोकपाल पद का सृजन कर देने से भ्रष्टाचार पर रोक लग जायेगा? आजादी के बाद से अब तक भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए पांच दर्जन से ज्यादा कानून बने और कई जांच समितियों का गठन किया गया जिनमें से एक है केन्द्रीय सतर्कता आयोग जिसे 1998 और 2004 में कानून बनाकर पहले से ज्यादा अधिकार दे दिये गये. लेकिन कहावत है कि कानून बनते ही तोड़ने के लिए हैं. हर नये कानून के साथ भ्रष्टाचार पहले से कहीं अधिक विकराल रूप धारण करता गया. यही हाल दूसरे कानूनों का भी है.

क्या कठोर कानून के बावजूद दहेज उत्पीडन आज भी जारी नहीं है? क्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध कानून बना दिए जाने से भ्रूण हत्या बंद हो गयी? क्या बाल श्रम कानून बनने से बच्चों से काम लेने पर लगाम लगी? क्या दलित उत्पीडन के खिलाफ कानून बन जाने से दलितों का उत्पीडन समाप्त हुआ? सच तो यह है कि जब भी किसी समस्या के प्रति लोगों का आक्रोश और असंतोष बढ़ता है तो सरकार खुद ही उसके लिए कानून बना कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है. भ्रष्टाचार के मामले में भी वह यही कर रही है. क्या अन्ना टीम अपने इस कानूनवादी, सुधारवादी मांग के जरिये सरकार के इसी पुराने, आजमाए हुए पैंतरे में सहयोगी भूमिका नहीं निभा रही है? कहावत है ‘प्रभुता पाई काहि मद नाहीं.’ अंग्रेजी कहावत है कि ‘पावर करप्ट्स एंड एब्सलूट पावर करप्ट्स एब्सलूटली’. सर्वाधिकार संपन्न लोकपाल भी भ्रष्ट नहीं होगा इसकी क्या गारंटी है?

मजेदार बात यह है कि अन्ना टीम ने पूंजीपतियों, व्यापारियों, सटोरियों, काला बाजारियों, एनजीओ चलाने वालों, धार्मिक संस्थाओं और मीडिया को अपने लोकपाल की गिरफ्त से बाहर रखा है. ए. राजा आज बिना लोकपाल के भी जेल में हैं, जबकि 1,75,000 करोड़ डकार जाने वाले मोबाइल कंपनियों के मालिक देशी-विदेशी पूंजीपतियों का लोकपाल कानून भी कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा. पिछले दिनों नीरा राडिया कांड ने पूंजीपति और मीडिया के अपवित्र गठबंधन को सामने ला दिया था. लेकिन प्रधानमंत्री से लेकर राज्य के छोटे कर्मचारियों तक को लोकपाल के दायरे में लाने पर बजिद अन्ना टीम ने अपने जन लोकपाल से उन्हें बेलाग रखा.

क्या अन्ना टीम की मांग पूरी हो गयी! अनशन समाप्ति के बाद के विजयोल्लास और मीडिया के अन्धाधुंध प्रचार से तो ऐसा ही जान पड़ता है, लेकिन हकीकत कुछ और है.

रामलीला मैदान के मंच से अन्ना ने घोषणा की थी कि सरकार लोकपाल का अपना मसौदा वापस ले और उसकी जगह जन लोकपाल बिल संसद में पेश करे. कानून बनाने के लिए अन्ना टीम ने सरकार को 30 अगस्त तक का समय दिया था और उदघोष किया था कि कानून बनने तक अन्ना का अनशन और आंदोलन जारी रहेगा.

लगातार वार्तालापों का जोर चला और अंततः अन्ना टीम ने प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को जन लोकपाल के दायरे में लाने सहित कई मांगों को छोड़ते हुए केवल कम महत्व वाले तीन मुद्दों पर संसद में प्रस्ताव पेश करने की शर्त रखी – 1. राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति, 2. सिटिजन चार्टर के जरिये सरकारी दफ्तरों में हर काम के लिए निश्चित समय का निर्धारण और 3. राज्य के सभी कर्मचारियों को लोकपाल के अधीन लाना. सरकार ने न तो संसद में कोई प्रस्ताव पास किया और न ही कानून बनाने के लिए कोई समय सीमा तय की. केवल संसद की भावना व्यक्त करते हुए कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने एक संयुक्त वक्तव्य दिया. अन्ना टीम ने सम्मानपूर्वक पीछे हटने के लिए उसी वक्तव्य को आधार बना कर आंदोलन वापस ले लिया और इसे ‘आधी जीत’ बताते हुए अपनी पीठ थपथपा ली.

जन लोकपाल आंदोलन ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि वैचारिक उहापोह और सांगठनिक अफरातफरी के बल पर मामूली सुधारवादी और सतही मांगों को पूरा करवाना भी सम्भव नहीं.

आंदोलन के नेतृत्व की संरचना

अन्ना टीम की भ्रष्टाचार मुहिम के साथ ही सिविल सोसाइटी (भद्रलोक समाज) एक बहुचर्चित शब्द हो गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- भद्र, शिष्ट, सुसभ्य, परिष्कृत, नगरवासी. जाहिर है कि 70 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और शहरों की आधी गरीब आबादी इस श्रेणी में नहीं आती. जन लोकपाल आन्दोलन का नेतृत्व और उनके समर्थक इसी ‘सिविल सोसायटी’ के लोग हैं. सिविल सोसाइटी या भद्रलोक की अवधारणा कोई नयी नहीं है. प्राचीन रोमन साम्राज्य में गुलामों को मनुष्य की श्रेणी में नहीं माना जाता था. गुलामों के मालिक अभिजात वर्ग के अलावा स्वतंत्र नागरिकों का समूह इसी श्रेणी में आता था जो अपनी सामाजिक हैसियत और पक्षधरता में कुलीन वर्ग के करीब था. आधुनिक युग में यह सभ्य, सुसंस्कृत और खुशहाल भद्रलोक पूंजीपति वर्ग और पूंजीवादी व्यवस्था का परम हितैषी है.

विश्व बैंक की परिभाषा के अनुसार ‘‘सिविल सोसाइटी पद का सम्बन्ध गैर-सरकारी संगठन और बिना मुनाफे वाले संगठनों के व्यापक विन्यास से है जो अपने सदस्यों तथा दूसरों के हितों एवं मूल्यों को नैतिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक, धार्मिक या लोकोपकारी विचारों के आधार पर अभिव्यक्त करने वाले के रूप में सार्वजानिक जीवन में अपनी उपस्थिती दर्ज करा चुके हैं. इस तरह सिविल सोसाइटी संगठन, संगठनों के एक व्यापक विन्यास को दिखाते हैं- सामुदायिक समूह, गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ), श्रमिक संघ, मूल निवासी समूह, दानकर्ता संगठन, धार्मिक संगठन, पेशेवर लोगों के ट्रस्ट.’’

विश्व बैंक सिविल सोसाइटी शब्द का प्रयोग एनजीओ के स्थान पर करता है जिन्हें अपनी योजनाओं में शामिल करने के लिए वह 70 के दशक से ही प्रयासरत रहा है और 1990 के बाद उसने इस प्रयास को तेज किया है. उसका मानना है कि वैश्वीकरण की प्रक्रिया तथा लोकतान्त्रिक शासन, संचार माध्यम और आर्थिक एकीकरण के विस्तृत होने की सहायता से पिछले दशक में विश्व स्तर पर सिविल सोसाइटी के आकार, कार्य क्षेत्र और क्षमता में नाटकीय विस्तार हुआ है. अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की वार्षिकी के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ की संख्या 1990 में 6000 से बढ़कर 2006 में 50,000 हो गयी. सिविल सोसाइटी संगठन आज वैश्विक विकास सहायता कार्यक्रमों में महत्त्वपूर्ण खिलाड़ी हो चुके हैं. ओईसीडी का अनुमान है कि 2006 में इन संगठनों ने 15 अरब डॉलर की सहायता उपलब्ध करने में सहयोग किया. विश्व बैंक के मुताबिक इन संगठनों ने दुनिया भर में अपने विभिन्न हिमायती अभियानों (एडवोकेसी कैम्पेन) के दौरान हजारों समर्थकों को गोलबंद किया. ‘वैश्विक सिविल सोसाइटी की अनुगूँज’ की ताजा अभिव्यक्ति विश्व सामाजिक मंच (डब्लूएसएफ) है जिसका वार्षिक आयोजन 2001 से विभिन्न महाद्वीपों में किया जा रहा है और जिसने वैश्विक विकास के मुद्दों पर विचार विमर्श के लिए अपने हजारों कार्यकर्ताओं को एक साथ ला खड़ा किया. दूसरा उदाहरण ‘गरीबी के खिलाफ कार्रवाई का वैश्विक आह्वान’ (जीसीएपी) के तहत गरीब देशों की कर्ज माफ़ी और ज्यादा बड़ी सहायता की हिमायत करने के लिए चलाया गया अभियान है I 2008 में दुनिया भर के शहरों में आयोजित कार्यक्रमों में 1.6 करोड़ नागरिकों ने भाग लिया.’’ भ्रष्टाचार के खिलाफ विश्वव्यापी अभियान भी विश्व बैंक की कार्यसूची में शामिल है.

1990 में बर्लिन की दीवार गिराए जाने और रूसी खेमे के विघटन के साथ विश्व शक्ति संतुलन में भरी बदलाव आया. अमेरिका के नेतृत्व में ‘वाशिंगटन आम सहमति’ के आधार पर पूरी दुनिया में नवउदारवादी, नग्न पूंजीवादी विश्व साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था को सुदृढ बनाने का अभियान शुरू हुआ. पूरी दुनिया में पूंजीवादी शोषण के सम्बन्ध कायम किये गए. पूंजी की निर्मम लूट और मुनाफाखोरी के रास्ते से सारे अवरोध हटा दिए गए. पूंजीवाद के इस नए बर्बर दौर को एक मात्र विकल्प बताने और न्यायसंगत ठहराने के लिए विचारों की आंधी चलाई गयी, मीडिया द्वारा लोगों के मन-मस्तिष्क को पूंजीवाद के अनुरूप ढालने का चौतरफा और अधाधुंध प्रयास शुरू हुआ.

इस अंधी लूट-खसोट का विनाशकारी प्रभाव होना तय था. इन चौतरफा दुष्परिणामों पर पर्दा डालने के लिए साम्राज्यवादी समूह ने तरह-तरह के उपाय किये. साथ ही, सिविल सोसाइटी’ और एनजीओ को भरपूर भौतिक मदद देकर खड़ा किया. नवउदारवादी पूंजीवाद अपने अन्तर्निहित कारणों से जो नयी-नयी सामाजिक बीमारियां उत्पन्न करता है. उनके खिलाफ आन्दोलन चलाकर उनमें कुछ हद तक सुधार लाने का काम इन संगठनों को सौंपा गया. गरीबी, पर्यावरण विनाश, कर्ज संकट, तानाशाही और भुखमरी से लेकर वैश्वीकरण के घातक परिणामों तक, तरह-तरह के मुद्दों पर एनजीओ ने दुनिया भर में हिमायत अभियान (एड्वोकेसी कम्पेन) चलाये, जिनका उपरोक्त उद्धरण में विश्व बैंक ने जिक्र किया है.

इस पूरी परिघटना का सार है-- राजनीतिक आन्दोलन की जगह सामाजिक आन्दोलन, वर्गों और तबकों के संगठनों की जगह एनजीओ के सामाजिक अभियान और सुधारवादी-कानूनवादी-वर्गेतर संगठन, आम तौर पर हर तरह की राजनीति का विरोध, पूंजीवाद का विकल्प प्रस्तुत करने की जगह उससे पल-प्रतिपल पैदा होने वाली समस्याओं को लेकर मुद्देवार, स्थानीय और तात्कालिक आन्दोलन. जुझारू संघर्ष की जगह जनहित याचिका, मोमबत्ती जुलूस, मानव श्रृंखला, भूख हड़ताल और गांधीगिरी जैसे नये ढंग के आन्दोलन, लोगों की व्यापक गोलबंदी और दीर्घकालिक निर्णायक लड़ाई की जगह भद्रजनों, मीडिया, एनजीओ कर्मियों द्वारा प्रतीकात्मक आन्दोलन, यानी रोग को मिटाने की जगह लक्षण को दबाना.

साम्राज्यवादी समूह ने रूस और पूर्वी यूरोप में राजकीय पूंजीवाद की जगह नग्न पूंजीवादी व्यवस्था की स्थापना के लिए गुलाबी, बैंगनी, नारंगी और चमेली क्रांतियों में सहयोग करने के लिए ‘नागरिक समाज और एनजीओ को एक रणनीति के रूप में सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया था. इसके लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और फंडिंग एजेंसियों के जरिये उन्हें भरपूर धन मुहैया कराया गया था. अब तो यह नवउदारवाद का आजमाया हुआ राजनीतिक उपकरण बन गया है.

1990 के बाद दुनिया भर में एनजीओ परिघटना और उनकी संख्या में तेजी से विकास हुआ है. साम्राज्यवादी देशों में तो इसे अर्थव्यवस्था के तीसरे क्षेत्र के रूप में स्थापित किया गया है. सरकार द्वारा सामाजिक सेवाओं का निजीकरण करके उनसे हाँथ खीचने के बाद, जब निजी पूंजीपतियों ने शिक्षा-चिकित्सा जैसी सरकारी सेवाओं को मुनाफे का धंधा बनाकर गरीब जनता को उनसे वंचित किया तो अभावग्रस्त लोगों के लिए एनजीओ को मानवतावादी चेहरे के साथ मैदान में उतारा गया. इस परिघटना को आगे बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने नागरिक समाज के लिए एक पैनल का गठन किया. विश्व बैंक ने भी इस दिशा में कई परियोजनाएं शुरू की और हर देश में एनजीओ और नागरिक समाज का भरपूर सहयोग लिया.

भारत में 1991 में नवउदारवादी नीतियां लागू होने के बाद एनजीओ का तेजी से विस्तार हुआ है. मजदूर आन्दोलन की कमजोरी और बिखराव ने एनजीओ के लिए अनुकूल अवसर प्रदान किया. वामपंथ के खिलाफ पूंजीवादी मीडिया के विश्वव्यापी अधाधुंध प्रचार से उन्हें वैचारिक आधार मिला जिसने हर तरह के प्रतिगामी मूल्यों का महिमामंडन किया और मुक्त बाजारवाद को एक मात्र विकल्प के रूप में स्थापित किया. आज भारत में 15 लाख नागरिक समाज संगठन या एनजीओ हैं जिनमें 1.9 करोड़ स्वयंसेवकों को रोजगार मिला हुआ है. ये संगठन पूंजीवादी व्यवस्था के पैरोकार और सहयोगी हैं और उसी के दायरे में काम करते हैं. इनका काम पूंजीवाद को दीर्घायु बनाने के लिए उसकी बुराइयों से लड़ना है. भ्रष्टाचार भी पूंजीवाद की ऐसी ही एक अन्तर्निहित बुराई है जिसके खिलाफ टीम अन्ना ने मुहिम छेड़ी है.

पूंजीवादी लोकतंत्र के मौजूदा दौर में जब संसद और विधान सभाओं में नीतिगत मुद्दों पर पक्ष-विपक्ष जैसा कोई बंटवारा रह नहीं गया है और नवउदारवादी नीतियों के चलते जनता का आक्रोश सभी हदें पर करता जा रहा है, तब नागरिक समाज संगठनों को सुरक्षा कवच के रूप में सामने लाया जा रहा है. जन भागीदारी, समावेशी विकास, जनता की जागरूकता, सरकार की जवाबदेही, विकास में सहभागिता, प्रशासनिक सुधार जैसे मनभावन नारों का निहितार्थ यही है. पूंजीवादी लोकतंत्र को कारगार बनाने और जनाक्रोश को नियंत्रित रखने के लिए नागरिक समाज के आन्दोलन और प्रतिपक्ष की छद्म रचना जरुरी है. नागरिक समाज के कुछ अभिजात लोग किसी मुद्दे पर इकठ्ठा होते हैं और किसी लोकतांतिक प्रक्रिया के बिना ही वे राजनीतिक शक्ति सम्पन्न, स्वयंभू जन प्रतिनिधि और जनता की आवाज बन जाते हैं. साम्राज्यवादी संस्थाएं उन्हें पुरुस्कृत करके जल पुरुष, थल पुरुष या नभ पुरुष बनाती हैं, अंतर्राष्ट्रीय फंडिंग एजेंसियां उनका खर्चा उठाती हैं, मीडिया उनके लिए सहमति गढ़ता है, उन्हें स्थापित करता है और सरकार उन्हें स्वीकार कर लेती है. यह जन आंदोलनों के भावी तूफानों से बचने की तमाम तैयारियों में से एक है.

विश्व बैंक के एक अधिकारी ने पिछले दिनों अपने एक साक्षात्कार में नागरिक संगठनों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा था कि मंदी का सामना कर रही वर्त्तमान विश्व अर्थव्यवस्था और अरब देशों में उथल-पुथल को देखते हुए विभिन्न देशों में ऐसे सगठनों को अपनी ओर आकर्षित करना जरुरी है. विश्व बैंक ने इसके लिए एक मुक्कमिल योजना तैयार की है जिसमें विभिन्न स्तरों पर संपर्क, सम्मलेन, शिक्षण-प्रशिक्षण और वित्तपोषण सब शामिल है. भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान भी विश्व बैंक की एक परियोजना है जिसमें हेरिटेज फाउन्डेशन, फोर्ड फाउन्डेशन, ट्रांसपिरेन्सी इंटरनेशनल सहित कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं और फंडिंग एजेंसियां सहयोगी भूमिका निभा रही हैं. कैसी विडंबना है कि तीसरी दुनिया के शासकों के साथ मिली-भगत करके उन्हें भ्रष्ट बनाने के लिए जिम्मेदार अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी संस्थाएं ही भद्रलोक को साथ लेकर भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ रही हैं. कुछ साल पहले विश्व बैंक से इस्तीफा देने वाले उसके एक उच्च अधिकारी डेविसन एल. बुधु ने एक किताब लिखी थी- एनफ इज एनफ जिसमें उसने विश्व बैंक द्वारा दुनिया भर में भ्रष्टाचार फ़ैलाने वाले अभियानों का कच्चा चिट्ठा खोला था. उसका कहना था कि हमारे हाथ से इतने अपराध हुए हैं कि उनके खून के धब्बे सात समुन्दर के पानी से भी नहीं धुल पाएंगे.

अन्ना टीम में शामिल सभी भद्रलोक किसी न किसी एनजीओ का संचालन करते हैं. वे इस नवउदारवादी पूँजीवादी व्यवस्था के समर्थक हैं तथा उसे कारगर और बेहतर बनाने के लिए उसकी बुराइयों को दूर करना चाहते हैं. जनता से पूरी तरह कटा हुआ यह भद्रलोक यदि चाहे भी तो किसी सही जनान्दोलन का नेतृत्व करने, राज्य का दमन झेलने और कष्ट सहने में असमर्थ है. कानून-व्यवस्था के दायरे में रहकर यह प्रतीकात्मक, प्रायोजित आन्दोलन या जनहित याचिका दायर कर सकता है. इससे आगे जाना इस समूह के लिए सम्भव नहीं है.

भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के अनुयायी कौन और क्यों?

अन्ना टीम की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में शहरी मध्यम वर्ग ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. इस आन्दोलन का समर्थक और जनाधार यही वर्ग था. समाज का मुखर तबका होने के कारण यह किसी मुद्दे पर राय बनाने में आम तौर पर सबसे प्रभावी भूमिका निभाता है. मीडियाकर्मी जब भी किसी विचार पर मत संग्रह करते हैं या पैनल डिसकशन आयोजित करते हैं तो वे ‘सिविल सोसाइटी’ यानी मध्यम वर्ग की ही राय लेते हैं, जैसे- एनजीओ चलाने वाले, पत्रकार, खिलाड़ी, अभिनेता, विभिन्न पेशों से जुड़े लोग, प्रतिष्ठित संस्थानों के छात्र, बुद्धिजीवी, मानवाधिकार कार्यकर्ता और अन्य लोग. मध्यम वर्ग के अधिकांश लोग सक्रिय राजनीति से दूर रहना ही पसंद करते हैं. ‘नो पोलिटिक्स प्लीज’, ‘विचार और जूते दरवाजे पर उतार कर आयें’ और ‘पोलिटिक्स इज लास्ट रिफ्यूज ऑफ स्काउनड्रेल्स’ उनके प्रिय नारे हैं. इसीलिए अन्ना के मीडिया प्रेरित आन्दोलन में मध्यम वर्ग की भारी पैमाने पर हिस्सेदारी ने बहुतेरे लोगों को चकित, भ्रमित और भाव विह्वल किया. इसे अभूतपूर्व और ऐतिहासिक महत्व की घटना बताया गया जो काफी हद तक सही भी है. इस मुहिम में मध्यम वर्ग की अति सक्रियता को पिछले बीस वर्षों के दौरान उसके आकार, सामाजिक, आर्थिक स्थिति और चारित्रिक बदलाव से अलग करके नहीं समझा जा सकता है.

1991 में नवउदारवादी आर्थिक नीति लागू होने के बाद से ही आर्थिक विमर्श में मध्यम वर्ग को काफी महत्व दिया जाने लगा था. विदेशी निवेशकों को रिझाने के लिए सरकार और मीडिया ने मध्यम वर्ग की संख्या को बढ़ा-चढ़ा कर बताना शुरू किया था. सही संख्या का पता लगाने के लिए कई देशी-विदेशी संस्थाओं ने सर्वेक्षण किये और एक ही साथ 5 करोड़ से लेकर 30 करोड़ तक के आँकडे सामने आये. इन प्रयासों के पीछे क्रय-शक्ति और उपभोग-क्षमता का पता लगाना था ताकि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने माल और सेवाओं के उपभोक्ताओं का सही-सही अंदाजा लगा सकें. यह काफी कठिन काम था क्योंकि उस दौरान सीमित आमदनी के चलते मध्यम वर्ग के जीवन स्तर और उपभोग पैटर्न में काफी भिन्नता थी.I 25 साल पहले वास्तविक जीवन में और फिल्मों में भी ठेठ मध्यम वर्गीय चरित्र (अमोल पालेकर या संजीव कुमार) का जीवनस्तर आज की तुलना में भला क्या था? कितने मध्यम वर्गीय परिवार वाशिंग मशीन, माइक्रोवेव ओवन, कार और होली डे पैकेज का उपभोग करते थे? लेकिन आज स्थिति भिन्न है. मध्यम वर्ग की संख्या में वृद्धि और उनकी खुशहाली के लिए शासक वर्ग अपनी पीठ थपथपाते हैं और इसे अपनी नीतियों की सफलता का प्रमाण बताते हैं तो यह ठीक ही है. विजय सुपर स्कूटर से लेकर नए मॉडल की गाड़ियों तक, पलस्तर झड़ते किराये के मकान से आलीशान अपार्टमेंट के मालिकाने तक तथा सरकारी स्कूलों-अस्पतालों से संपन्न पांच सितारा स्कूलों-अस्पतालों तक की यात्रा जितनी तेजी से पूरी हुई, उसके बारे में 1990 से पहले किसी ने कल्पना भी नहीं की थी.

बाजार अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाने के लिए थोड़ी संख्या वाले पहले से मौजूद मध्यम वर्ग की तादाद और आमदनी बढ़ाना जरूरी था. साथ ही अगर शासकों ने अपनी नीतियों के समर्थक और सहयोगी तथा अपने जनाधार का विस्तार नहीं किया होता तो समाज का मुखर तबका होने के नाते मध्यम वर्ग इन नीतियों के खिलाफ निरंतर जारी जनांदोलनों को तेज करने में भूमिका निभाता रहता. मध्यम वर्ग के विभिन्न हिस्सों ने ‘90 के दशक के पूर्वार्ध में नयी आर्थिक नीतियों का प्रबल विरोध किया था, जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी विभागों के कर्मचारी, व्यापारी, शिक्षक, छात्र तथा पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और पेशेवरों का एक हिस्सा शामिल था. आज मध्यम वर्ग में विरोध का वह स्वर कहीं दूर-दूर तक सुनाई नहीं पड़ता है. उसकी जगह अब वहाँ से शाइनिंग इंडिया, अतुल्य भारत, मेरा भारत महान, ‘आई लव माई इंडिया, जय हो’ की अनुगूँज आ रही है.

पिछले बीस वर्षों के दौरान देश कि कुल आय का बंटवारा इस तरह पुनर्गठित किया गया कि शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम के बीच, वास्तविक उत्पादन और उस पर निर्भर सेवा क्षेत्र के बीच की तथा गाँव और शहर के बीच खाई लगातार चौड़ी होती गयी. पांचवें और छठे वेतन आयोग ने केंद्र, राज्य और सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत लोगों के वेतन भत्तों में भारी वृद्धि की तथा न्यूनतम तथा अधिकतम वेतनमान में भारी अंतर पैदा किया. निजी क्षेत्र के प्रबंधकों और मानसिक श्रम करने वालों के वेतन में तो काफी तेजी से वृद्धि हुई, लेकिन वहाँ प्रत्यक्ष उत्पादन और शारीरिक श्रम करने वालों की न्यूनतम मजदूरी भी तय नहीं है. इन सभी उपायों से ऊँची आय और क्रय-शक्ति वाला माध्यम वर्ग का एक छोटा तबका पैदा हुआ जबकि बड़ी संख्या में लोगों को बाजार से बहिष्कृत कर दिया गया. यह यात्रा उतनी ही विकृतिपूर्ण और असंगत रही है जितनी वास्तविक उत्पादन वाले कृषि और उद्योग की कीमत पर सेवा क्षेत्र का असमान्य और गैर अनुपातिक विस्तार. निश्चय ही यह सहज स्वाभाविक प्रक्रिया में नहीं बल्कि सरकार के सचेत प्रयास और उदारीकरण-निजीकरण की उन्हीं नीतियों के चलते घटित हुआ है जिनके कारण देश की बहुसंख्य मेहनतकश जनता आज तबाही की चपेट में आकर कराह रही है.

उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के चलते सेवा क्षेत्र- आईटी, कम्युनिकेशन, इलेक्ट्रोनिक मीडिया, रियल इस्टेट, फाइनांस, शेयर बाजार, बीपीओ, केपीओ तथा निजी अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों में रोजगार के नए अवसर पैदा हुए जिससे आबादी के एक छोटे से हिस्से की आय में काफी वृद्धि हुई. देश की अर्थव्यवस्था में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की घुसपैठ से भी शहरों में खास तरह के रोजगार और मध्यम वर्ग कि एक नयी जमात तैयार हुई. इस तरह निजीकरण, बाजारवादी अर्थव्यवस्था और नवउदारवादी नीतियों के परिणामस्वरूप मध्यम वर्ग की आमदनी और तादाद में इजाफा हुआ. इसका ऊपरी हिस्सा आम तौर पर इन नीतियों का प्रबल समर्थक है और आर्थिक नवउपनिवेशवादी मौजूदा ढांचे का सामाजिक अवलंब है.

भारत में नवउदारवादी नीतियों के प्रस्तोता और प्रवर्तक पूंजीपति वर्ग और उसके राजनीतिक नुमाइंदे थे लेकिन उच्च मध्यम वर्ग भी शुरू से ही इसका प्रबल समर्थक था. इस वर्ग का सपना था कि वैश्वीकरण-उदारीकरण भारत को विकसित देशों कि क़तार में ला खड़ा करेगा, भारत को महाशक्ति बना देगा, यहाँ की हर चीज विश्वस्तरीय हो जायेगी और भारत स्वर्ग बन जायेगा. भारत को महाशक्ति बनाने में यह वर्ग कैसे अपना योगदान कर सकता है, इसकी झलक स्वदेश और रंग दे बसंती जैसी फिल्मों में दिखाई गयी है. लेकिन उच्च मध्यम वर्ग जब वर्तमान यथार्थ पर निगाह डालता है तो उसे नवउदारवादी सपना साकार होते नहीं दीखता. उन नीतियों का अन्धभक्त होने के कारण वह उनमें कोई कमी नहीं देखता. उसे लगता है कि सारी बुराई भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों, यानी सरकार में है जो अपना काम ठीक से नहीं करती. मुस्लिम तुष्टिकरण’, आरक्षण, गरीबों के लिए सस्ता अनाज, रोजगार गारंटी जैसी नीतियों को वह नेताओं की वोट बैंक की राजनीति और नवउदारवादी/बाजारवादी नीतियों के रास्ते का रोड़ा मानकर आलोचना करता है. भ्रष्टाचार को भी वह ऐसी ही बाधा मानता है जो कुछ भ्रष्ट और स्वार्थी नेताओं द्वारा खड़ी की गयी है. उसका मानना है कि भ्रष्टाचार ही सारी समस्याओं की जड़ है जिसे दूर करना कोई मुश्किल काम नहीं है. इसका एक ही सरल उपाय है कि कठोर कानून बनाओ. उधर सरकार की मज़बूरी यह है कि उसे वोट लेने के लिए कुछ लोक-लुभावन कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं व्यवस्था को चलाने और चुनाव जीतने के लिए भ्रष्टाचार को बनाए रखना होता है जबकि भद्रलोक के सामने ऐसी कोई मज़बूरी नहीं.

अन्ना टीम के आन्दोलन का आधार यही उच्च मध्यम वर्ग है. ऊपर से देखने पर ऐसा लग सकता है कि सरकार के खिलाफ आवाज उठाकर यह उसी थाली में छेद कर रहा है जिसमें खाता है. लेकिन वास्तव में यह मुहिम शासक वर्गों के विरुद्ध नहीं बल्कि भ्रष्टाचार मिटा कर नवउदारवादी बाजार अर्थव्यवस्था को दीर्घायु बनाने के लिए है. अन्ना आन्दोलन ने यह साबित कर दिया है कि सरकार और भद्रलोक के बीच का टकराव मित्रवत है. यह आन्दोलन सरकार की नीतियों के खिलाफ नहीं, मूल ढांचे के खिलाफ नहीं. भद्रलोक इस भ्रष्टतंत्र को समाप्त करने की बातें नहीं करता, बल्कि भ्रष्टाचार मुक्त करके उसे और बेहतर बनाने में मदद करना चाहता है. वह इस सड़ते, बदबू फैलाते लोकतंत्र की सफाई करना चाहता है ताकि देशी-विदेशी पूंजीपति कारगर तरीके अपना कर लूटतंत्र जारी रखें और भद्रलोक के स्वर्ग का वैभव बढ़ाते रहें.

अन्ना आंदोलन और मुख्यधारा की मीडिया

अन्ना टीम के जनलोकपाल आन्दोलन में मीडिया की भूमिका को लेकर भी काफी सवाल उठे. इसमें संदेह नहीं कि दिन-रात सीधा प्रसारण के लिए अपने क्रेन और क्रू के साथ अगर टीवी चैनल सक्रिय नहीं होते, तो इस आन्दोलन में स्वतःस्फूर्त तरीके से इतने लोग शामिल नहीं होते. जन आंदोलनों के प्रति मीडिया के परंपरागत रवैये को देखते हुए यह सक्रियता भले ही अचम्भे में डालने वाली लगती हो लेकिन आन्दोलन के चरित्र और मीडिया की प्राथमिकता पर गौर करें तो उसकी भूमिका अस्वाभाविक नहीं लगेगी.

अपने एक अध्ययन में पत्रकार विपुल मुदगल (सीएसडीएस) ने सर्वाधिक प्रसार वाले अंग्रेजी और हिंदी के तीन-तीन अख़बारों के 48 अंकों का विश्लेषण किया. इन अख़बारों ने अपने सम्पादकीय पन्ने का केवल 2 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों में रहने वाली दो तिहाई जनता की समस्यों पर खर्च किया. इन अख़बारों में छपने वाली 100 से 200 सामग्री में से औसतन तीन सामग्री ग्रामीण मुद्दों पर थी. इनमें भी अधिकांश सामग्री अपराध, हिंसा और दुर्घटनाओं से सम्बंधित थी. समाचारों के चुनाव के मामलों में हिंदी और अंग्रेजी अख़बारों के चरित्र में कोई खास फर्क नहीं पाया था, जबकि हिंदी अख़बारों के अधिकांश पाठक ग्रामीण क्षेत्र के लोग होते हैं.

इन अख़बारों का झुकाव उपभोक्ता केंद्रित होता है और उनकी निगाह ऊपर उठते पढ़े-लिखे शहरी उपभोक्ताओं पर होती है जिनकी दुनिया में गरीबी और पिछड़ेपन के लिए कोई जगह नहीं होती. इस मामले में टीवी चैनलों का रिकॉर्ड तो और भी खराब है. वहाँ तो सब कुछ नवधनाड्य उपभोक्ता वर्ग के लोगों के मनोरंजन के लिए है.

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है. नवउदारवादी दौर में लोकतंत्र के अन्य स्तंभों की तरह मीडिया भी बुरी तरह भ्रष्टाचार में लिप्त है. नीरा राडिया प्रकरण ने पूंजीपति, नेता और मीडिया के अपवित्र गठबंधन को उजागर किया. इसके पहले नोट के बदले समाचार लिखने का मामला देश भर में चर्चा का विषय बना था. पहले भी सरकार और पूंजीपतियों से प्राप्त होने वाले विज्ञापन और सुविधाओं से मीडिया का चरित्र प्रभावित होता था. लेकिन मौजूदा दौर में देशी-विदेशी पूंजीपतियों द्वारा भारी पूंजी निवेश ने मीडिया को विराट पूंजी प्रतिष्ठानों में बदल दिया. इसकी प्राथमिकता पूंजीवाद की हिफाजत करना और साथ ही अपनी पूंजी का विस्तार करना रह गया है. स्वतंत्र और ‘निष्पक्ष’ होने का मुखौटा भी अब नहीं रहा. उसने अपने आप को जनता से पूरी तरह काट लिया है. ख्यातिलब्ध पत्रकार पी. साईनाथ ने इग्नू में एक व्याख्यान देते हुए मीडिया के इस बदले चरित्र को सारगर्भित रूप में प्रस्तुत किया – ‘‘“आज अख़बारों में कोई श्रमिक संवाददाता नहीं है, आवास और प्राथमिक शिक्षा का कोई संवाददाता नहीं है. इस देश की 70 प्रतिशत आबादी से हम साफ़ कह रहे हैं कि हमें उनसे कोई लेना-देना नहीं है.’’ उनका कहना था कि ““ निजी सुलहनामों के खंडहर पर जरखरीद खबरें उठ खड़ी हुई हैं. निजी सुलहनामों ने मीडिया कंपनियों को अपनी कंपनियों में शेयर दिए थे जो 2008-09 के शेयर बाजार के डूबने के साथ ही रद्दी में बदल गए. जरखरीद ख़बरों ने इन भ्रष्ट कंपनियों और राजनेताओं को विधानसभा और आम चुनावों के दौरान इस लायक बनाया कि वे मीडिया के साथ बेनामी लेन-देन कर सकें.’’

मीडिया के चरित्र पर इस संक्षिप्त चर्चा की पृष्ठभूमि में यह समझना कठिन नहीं कि अन्ना के जन लोकपाल आन्दोलन के दौरान मीडिया ने इतनी सक्रियता क्यों दिखाई और क्यों सातों दिन चौबीस घंटे हर छोटी-छोटी बातों का भी ग्राफिक चित्रण करती रही. यह अकारण नहीं कि प्रधानमंत्री को जन लोकपाल बिल के दायरे में लाने के लिए बजिद टीम अन्ना मीडिया को उससे अछूता रखने का हामी है. मीडिया के मालिकों, पत्रकारों, विज्ञापन दाताओं और लक्षित दर्शकों-पाठकों तथा अन्ना आंदोलन के नेताओं-समर्थकों के बीच अद्भुत वैचारिक और वर्गीय एकरूपता है. दलित, पिछड़े, आदिवासी और मुस्लिम संगठनों का यह आरोप बिलकुल सही है कि भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के नेतृत्व पर सवर्ण हिंदू मानसिकता के लोग हावी हैं. मीडिया पर भी इसी तबके का वर्चस्व है जो काफी हद तक मीडिया की प्राथमिकता और पक्षधरता तय करता है. अन्ना आन्दोलन के समानांतर उसी समय दिल्ली में दलित, पिछडों, अल्पसंख्यकों की एक रैली हुई थी जिसे मीडिया ने तरजीह नहीं दी. इससे पहले आरक्षण विरोधी आन्दोलन के समर्थन में भी मीडिया ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था. दिल्ली में मजदूरों-किसानों और अन्य मेहनतकश तबकों की रैलियों और प्रदर्शनों के प्रति मीडिया का रुख या तो अनदेखी करने का या उसे बदनाम करने का ही रहा है. इसी वर्ष फरवरी में देश की 9 प्रमुख ट्रेड यूनियनों की रैली के प्रति मीडिया ने ऐसा ही रवैया अपनाया. उसने आन्दोलन को अपेक्षित स्थान नहीं दिया और कहीं चर्चा भी की तो इस रूप में कि इसके चलते दिल्ली में यातायात को कितना व्यवधान पहुंचा और दिल्लीवासियों को कितनी परेशानी झेलनी पड़ी.

मीडिया का मुख्य उद्देश्य अब भव्य आयोजनों की दिलचस्प और ब्योरेवार रिपोर्टिंग करके लोगों को रिझाना और अपनी टीआरपी बढ़ाना ही रह गया है. अन्ना आन्दोलन की रिपोर्टिंग के साथ भी ऐसा ही हुआ. मीडिया ने रोचक और चटपटे ब्योरे, उत्सुकता और सनसनी जगाने वाले तथ्यों तथा उत्सव, उमंग और छिछली भावुकता वाले दृश्यों को खूब बढ़-चढ़ कर प्रस्तुत किया. लेकिन भ्रष्टाचार के मुद्दे को गंभीरता से सामने लाने, उसके कारणों का विश्लेषण करने, लोकपाल बिल के अलग-अलग मसौदों की तुलनात्मक रूप से व्याख्या करने, लोकपाल के लाभ-हानि पर विभिन्न पक्षों की राय बताने, कुल मिलाकर दर्शकों-पाठकों को शिक्षित करने की जहमत मोल नहीं ली. इसके बजाय किसने अपने नवजात बच्चे का नाम अन्ना रखा, कौन नंगे पैर चलकर अन्ना के चरण छूने पहुंचा, किसने कितने आकर्षक गोदने-टैटू रचाए, लोगों में कितना उमंग था, जैसी बातों पर ही ध्यान केंद्रित किया, बीच-बीच में उच्च मध्यवर्गीय वस्तुओं और सेवाओं का विज्ञापन भी चलता रहा.

आन्दोलन को तेज करने और उसका टेम्पो ऊँचा रखने और अन्ना को शोहरत दिलाने में मीडिया की भूमिका असंधिग्ध है. अप्रैल में आन्दोलन की घोषणा करने से पहले अन्ना के नाम के साथ गूगल सर्च में अन्ना कोर्निकोवा का सन्दर्भ आता था और अन्ना हजारे के नाम पर केवल चार या पांच परिणाम दिखते थे, जबकि प्रधानमंत्री द्वारा ड्राफ्टिंग कमिटी में उन्हें शामिल किये जाने के बाद उनके हजारों संदर्भ आने लगे. 28 अगस्त को एनडीटीवी ने घोषणा की कि यह संख्या 2 करोड़ 90 लाख से भी ज्यादा हो गयी है और भारत के वेब जगत में उनकी लोकप्रियता लेडी गागा से तो कम, लेकिन प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से अधिक है.

अन्ना हजारे और उनकी लोकपाल मुहिम की छवि बनाने के अलावा मीडिया ने 13 दिनों के इस आन्दोलन के दौरान यह प्रयोग भी सफलतापूर्वक आजमाया कि शासक वर्गों द्वारा किस हद तक मीडिया का इस्तेमाल किया जा सकता है. नोम चोम्श्की ने तो मीडिया द्वारा सहमति गढ़े जाने का ही विश्लेषण किया था. आज मीडिया उससे आगे बढ़कर ‘असहमति गढ़ने’ में भी सफल रहा है. यानि वह मन चाहे मुद्दे गढ़ सकता है और उन्हें लोगों के मष्तिस्क में रोप कर उन्हें उद्वेलित कर सकता है तथा उस उद्वेलित समूह को मनचाहे तरीके से नियंत्रित और संचालित कर सकता है. इस घटना चक्र के दौरान इसे आजमाया जा चुका है. निश्चय ही यह अन्य सभी बातों से कहीं अधिक गम्भीर और विचारणीय मामला है.

भद्रलोक समाज और एनजीओ के आर्थिक स्रोत

अन्ना के जन लोकपाल का नेतृत्व करने वाले सिविल सोसायटी के लोग किसी न किसी एनजीओ से जुड़े हुए हैं. आम तौर पर गैर-सरकारी संगठनों का काम ग़रीबों की सहायता, जिन जिम्मेदारियों से सरकार ने हाथ खींच लिया है उन कल्याणकारी कार्यक्रमों का संचालन और सरकारी योजनाओं को लागू करवाने में मदद करना होता है. लेकिन आज राजनीतिक गतिविधियों में भी वे बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगे हैं. विश्व सामाजिक मंच के माध्यम से वैश्वीकरण और विश्व व्यापार संगठन का विरोध इसका एक प्रमुख उदाहरण है. अन्ना का आंदोलन भी इसी श्रेणी में आता है.

राजनीतिक और आंदोलनात्मक कार्रवाइयों में लगे किसी भी संगठन के लिए आर्थिक स्रोत का सवाल एक नीतिगत सवाल है. हमारे समाज में अलग-अलग वर्गों की पार्टियाँ और संगठन हैं. जो संगठन जिनके लिए काम करते हैं, उनसे आर्थिक सहयोग लेते हैं. किसी संगठन के मददगार उसे आर्थिक सहयोग तभी देती हैं जब उसके उद्देश्य और कार्यक्रम उसके हित में हों. यदि ऐसा न हो तो वे उल्टे उसका हर तरह से विरोध करेंगे. संगठन भी अपने आर्थिक सहयोगियों के प्रति जवाबदेह होते हैं. कहावत है जिसका खायेंगे, उसका गायेंगे. चुनाव लड़ने वाली पार्टियाँ पूंजीपतियों से चन्दा लेती हैं और उनके लिए काम करती हैं. यह एक खुली सच्चाई है. इसी तरह ट्रेड यूनियन अपने सदस्यों और समर्थकों से चंदा लेते हैं. सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक संगठन भी अपने उदेश्यों से सहमति रखने वाले समर्थकों के आर्थिक सहयोग से संचालित होते हैं. संगठनों के सहयोगी उसकी गतिविधियों पर नजर रखते हैं और यदि संतुष्ट न हों तो वे संगठन को सहयोग देना बंद कर देते हैं. यही बात एनजीओ पर भी लागू होती है. पैसा देने वाली संस्थाओं के स्वार्थ और गैर-सरकारी संगठनों के उद्देश्य और कार्यक्रम में मेल होना जरूरी है. विश्व बैंक, फोर्ड फाउंडेशन (जिसके अमरीकी गुप्तचर संस्था सीआईए से सम्बन्ध जगजाहिर हैं) या औक्सफेम जैसी संस्थाएं जिन संगठनों को पैसा देती हैं उन्हें अपनी ओर से कार्यक्रम भी देती हैं, जैसे- विश्व बैंक द्वारा दुनिया भर में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की योजना. यही नहीं, वे उन संगठनों की पारदर्शिता और जवाबदेही का भी लेखा-जोखा लेती हैं.

वर्ग विभाजित समाज में वर्गेतर बातें करना, सबके हित कि बात करना केवल लोगों को बेवकूफ बनाने का जरिया है. हर वर्ग अपने हितों को सर्वोपरि रखता है. यहाँ तक कि तटस्थता और सर्वजन हिताय की आड़ में राज्य भी कुछ वर्गों की कीमत पर किन्हीं दूसरे वर्गों के स्वार्थों की पूर्ति करता है और इस पर पर्दा डालने के लिए उसके कर्ताधर्ता झूठ का अम्बार खड़ा करते रहते हैं.

अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल और अरुणा रॉय आदि ने सूचना के अधिकार की लड़ाई लड़ी. सिविल सोसायटी के शीर्षस्थ लोगों ने ‘अहिंसक’ प्रयासों से कानून बनवाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली. लेकिन वर्ग समाज में शक्तिशाली, सम्पत्तिवान लोग अपना नुकसान होने पर हिंसा का सहारा लेना बंद नहीं करेंगे. अब तक सूचना अधिकार से जुड़े दो दर्जन एनजीओ कार्यकर्ताओं कि हत्या हो चुकी है. 16 अगस्त को अन्ना मुहिम के पहले ही दिन भोपाल में सूचना अधिकार और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जुड़ी एक महिला कार्यकर्त्ता सेहला मसूद की दिन दहाड़े हत्या हुई. अन्ना टीम के अहिंसक आंदोलन के शोर-सराबे में जघन्य हिंसा की यह घटना गुम हो गयी. सच तो यह है कि इस कानून से सबसे अधिक लाभ देशी-विदेशी पूँजीपतियों को हुआ है जो घर बैठे इन्टरनेट के जरिये सही समय पर वे सभी सरकारी सूचनायें प्राप्त कर लेते हैं, जिनके लिए पहले उन्हें महीनों चक्कर काटना पड़ता था. लेकिन ऐसी धारणा फैलायी जाती है, जैसे कि सूचना अधिकार कानून आम जनता की भलाई के लिए है, ताकि वर्ग-भेद पर पर्दा पड़ा रहे. क्या लोकपाल कानून इस वर्ग-भेद से ऊपर काम कर पायेगा? आर्थिक-सामाजिक विषमता के रहते क्या यह सम्भव है?

एनजीओ परिघटना का उद्भव सहज स्वाभाविक रूप से या खुद ब खुद नहीं हुआ है. इसके तार साम्राज्यवाद से जुड़े हैं. साम्राज्यवादी संस्थाएं सचेत रूप से इन्हें बढ़ावा दे रही हैं. विश्व बैंक की विकास रिपोर्ट 2000-2001 में बताया गया है कि 1999 में विश्व बैंक द्वारा स्वीकृत योजनाओं में से 70 प्रतिशत एनजीओ और सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों की भागीदारी से पूरी हुई. इनमें से केवल एक प्रोजेक्ट 4500 करोड़ रुपये का था जो नौ देशों में एनजीओ और सिविल सोसायटी के मार्फ़त लागू करवाया गया. यह कोई खैरात नहीं है, क्योंकि इस नवउदारवादी दौर में साम्राज्यवादी संस्थाएं और विदेशी फंडिंग एजेन्सियां जितना धन खर्च कर रही, बहुराष्ट्रीय हैं कम्पनियां उससे कई गुना अधिक लूट रही हैं.

निजीकरण के चलते सरकार ने जिन सामाजिक सेवाओं की जिम्मेदारी त्याग दी, उन्हें पूरा करने के लिए एनजीओ अब निजी ठेकेदारों की भूमिका में उतर आये हैं. इसके चलते सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती है और जनता का सारा ध्यान एनजीओ पर टिक जाता है, वह भी अपने अधिकार के रूप में नहीं, बल्कि दानी की कृपा-दृष्टि पाने के लिए. जो जनता का अधिकार है वह उसे दान में आधा-अधूरा दिया जाता है.

एनजीओ के जरिये 2000-2001 में 970 करोड़ रूपये का विदेशी फंड सार्वजानिक सेवाओं की मद में खर्च किया गया जो सरकार की जिम्मेदारी है साथ ही निजी पूंजीपति अब इन सेवाओं का व्यापार करके भरपूर मुनाफा कमा रहे हैं. विश्व बैंक और मुद्रा कोष के इशारे पर ही सरकार ने सार्वजनिक सेवाओं की मद में बजट कटौती की थी, जिसके कारण गरीबी, भुखमरी और महामारी तेजी से बढ़ी. 1985-90 में राज्य और केंद्र सरकार द्वारा ग्रामीण विकास पर सकल घरेलू उत्पाद का 14.5 प्रतिशत खर्च किया गया था जो 2000-2001 में घटकर 5.9 प्रतिशत रह गया. यदि सरकार पहले के बराबर खर्च करती तो यह राशि वर्तमान बजट से 2,30,000 करोड़ रूपए अधिक होती, जबकि एनजीओ के मार्फत इसका हजारवां हिस्सा खर्च करके सरकार निश्चिन्त है. समझना कठिन नहीं कि एनजीओ वास्तव में किसकी सेवा करते हैं.

एनजीओ का कार्यक्षेत्र अब केवल लोक कल्याण कार्यक्रम तक ही सीमित नहीं है. वे स्थानीय और राष्ट्रीय राजनीति में भी एक खास तरह का हस्तक्षेप करते हैं जिसका मकसद जाहिरा तौर पर अपने दानदाताओं के स्वार्थों की पूर्ति करना होता है. इसके लिए वे स्थानीय लोगों के बीच से अपने कर्मचारियों की भर्ती करते हैं. हालाँकि उन्हें अपेक्षतया बहुत कम वेतन दिया जाता है लेकिन बेरोजगारी की हालत को देखते हुए यह भी उनके लिए बड़ी चीज होती है. उनके एहसान से दबे ऐसे ही लोग स्थानीय स्तर पर उनका राजनीतिक प्रभाव ज़माने में मदद करते हैं और जलसे-जुलूसों में भीड़ जुटाते हैं.

जिन मुद्दों पर रेडिकल बदलाव के लिए जुझारू आन्दोलन होने की सम्भावना होती है, व्यवस्थापोषक एनजीओ उन पर सुधारवादी, समझौतावादी और नरमपंथी मुहिम छेड़ देते हैं. यथास्थितिवादी राजनीतिक पार्टियाँ और मीडिया उनके इस काम में भरपूर मदद करते हैं. विश्व बैंक ने एनजीओ को बढ़ावा देने के पीछे अपना राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट करते हुए विकास रिपोर्ट 2000-2001 में कहा था कि “औपचारिक या अनौपचारिक तरीकों से सभी राजनीतिक विरोधियों को एक ही मंच पर लाकर तथा उनकी ऊर्जा को राजनीतिक प्रक्रियाओं की ओर मोड़कर सामाजिक तनाव और बंटवारों को काफी शांत किया जा सकता है, बजाय इसके कि उस आक्रोश का शमन करने के लिए टकराव को ही एकमात्र रास्ता मान लिया जाय. यही कारण है कि जन आंदोलनों के इलाकों में ही एनजीओ का फैलाव ज्यादा है.

पारम्परिक जनसंगठन और जनआंदोलन अपने खुद के आर्थिक स्रोतों के ऊपर निर्भर होते हैं और उनके नेता और कार्यकर्ता आम जनता के बीच से आने वाले जनसामान्य होते हैं, जो जनता के प्रति सीधे जवाबदेह होते हैं. जनता के साथ उनका सम्बन्ध पानी और मछली की तरह होता है. ऐसे कार्यकर्ताओं की जगह एनजीओ के जिन विशेषज्ञों और प्रशिक्षित (सोशल वर्क और मैनेजमेंट की डिग्री लिए) स्वयंसेवकों को उतारा गया है वे अपने अधिकारियों और दानदाताओं के द्वारा ऊपर से नियंत्रित होते हैं. उनके लिए जनता की सहमति या असहमति कोई मायने नहीं रखती. वे मुलाजिम की तरह काम करते हैं और उनका किसी भी समय तबादला हो सकता है. उनके आर्थिक स्रोत भी जनता से नहीं बल्कि बाहर से आते हैं और वे अपने दान दाताओं के प्रति ही जवाबदेह होते हैं. जनता के साथ उनका सम्बन्ध पानी और मछली की तरह नहीं, बल्कि कल्याण करने के लिए आये हुए महापुरुष जैसा होता है.

उनकी परनिर्भरता का आलम यह है कि जिस दिन सरकारी-गैर-सरकारी, देशी-विदेशी फंडिंग बंद हो जाए उसी दिन सारे एनजीओ ध्वस्त हो जायेंगे.

मजदूर आंदोलन में ठहराव, बिखराव और भटकावों के कारण जनता के जुझारू जनसंगठनों की परम्परा और निरंतरता बाधित हुई है. इससे एनजीओ के लिए खुला मैदान मिल गया. अब कई एनजीओ आदीवासियों, दलितों, महिलाओं और खेत मजदूरों का संगठन, मानवाधिकार संगठन और सांस्कृतिक संगठन चलाते हैं, सबसे पहले आगे बढ़कर वे ही किसी राजनीतिक सामाजिक मुद्दे को भी उठाते हैं. देश की राजनीतिक पार्टियाँ भी इसी संस्कृति में ढल चुकी है. उनका नेतृत्व जनता से पूरी तरह कटा हुआ है और वे जनता के ऊपर सवारी गाँठने वाले लाटसाहब में बदल गए हैं. पक्ष-विपक्ष की राजनीतिक पार्टियों में जनता का कोई प्रतिनिधित्व या हिस्सेदारी नहीं है. इसीलिए उनके नेतागण एनजीओ के साथ सांठ-गांठ करते हैं और उन्हें बढ़ावा देते हैं. इस विकट स्थिति से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है, मेहनतकश वर्गों और तबकों की चेतना बढ़ाना और सही उसूलों पर आधारित उनके अपने संगठन बनाना, जिनकी गहरी जड़ें अपने लोगों के बीच हों और उन्हीं से वे जीवनी शक्ति ग्रहण करते हों.

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Sunday, August 28, 2011

दस दिन का अनशन - हरीशंकर परसाई


- हरीशंकर परसाई

10जनवरी

आज मैंने बन्नू से कहा, " देख बन्नू, दौर ऐसा आ गया है की संसद, क़ानून, संविधान, न्यायालय सब बेकार हो गए हैं. बड़ी-बड़ी मांगें अनशन और आत्मदाह की धमकी से पूरी हो रही हैं. २० साल का प्रजातंत्र ऐसा पक गया है कि एक आदमी के मर जाने या भूखा रह जाने की धमकी से ५० करोड़ आदमियों के भाग्य का फैसला हो रहा है. इस वक़्त तू भी उस औरत के लिए अनशन कर डाल."

बन्नू सोचने लगा. वह राधिका बाबू की बीवी सावित्री के पीछे सालों से पड़ा है. भगाने की कोशिश में एक बार पिट भी चुका है. तलाक दिलवाकर उसे घर में डाल नहीं सकता, क्योंकि सावित्री बन्नू से नफरत करती है.

सोचकर बोला, " मगर इसके लिए अनशन हो भी सकता है? "

मैंने कहा, " इस वक़्त हर बात के लिए हो सकता है. अभी बाबा सनकीदास ने अनशन करके क़ानून बनवा दिया है कि हर आदमी जटा रखेगा और उसे कभी धोएगा नहीं. तमाम सिरों से दुर्गन्ध निकल रही है. तेरी मांग तो बहुत छोटी है- सिर्फ एक औरत के लिए."

सुरेन्द्र वहां बैठा था. बोला, " यार कैसी बात करते हो! किसी की बीवी को हड़पने के लिए अनशन होगा? हमें कुछ शर्म तो आनी चाहिए. लोग हँसेंगे."

मैंने कहा, " अरे यार, शर्म तो बड़े-बड़े अनशनिया साधु-संतों को नहीं आई. हम तो मामूली आदमी हैं. जहाँ तक हंसने का सवाल है, गोरक्षा आन्दोलन पर सारी दुनिया के लोग इतना हंस चुके हैं क उनका पेट दुखने लगा है. अब कम-से-कम दस सालों तक कोई आदमी हंस नहीं सकता. जो हंसेगा वो पेट के दर्द से मर जाएगा."

बन्नू ने कहा," सफलता मिल जायेगी?"

मैंने कहा," यह तो 'इशू' बनाने पर है. अच्छा बन गया तो औरत मिल जाएगी. चल, हम 'एक्सपर्ट' के पास चलकर सलाह लेते हैं. बाबा सनकीदास विशेषज्ञ हैं. उनकी अच्छी 'प्रैक्टिस' चल रही है. उनके निर्देशन में इस वक़्त चार आदमी अनशन कर रहे हैं."

हम बाबा सनकीदास के पास गए. पूरा मामला सुनकर उन्होंने कहा," ठीक है. मैं इस मामले को हाथ में ले सकता हूँ. जैसा कहूँ वैसा करते जाना. तू आत्मदाह की धमकी दे सकता है?"

बन्नू कांप गया. बोला," मुझे डर लगता है."

"जलना नहीं है रे. सिर्फ धमकी देना है."

"मुझे तो उसके नाम से भी डर लगता है."

बाबा ने कहा," अच्छा तो फिर अनशन कर डाल. 'इशू' हम बनायेंगे."

बन्नू फिर डरा. बोला," मर तो नहीं जाऊँगा."

बाबा ने कहा," चतुर खिलाड़ी नहीं मरते. वे एक आँख मेडिकल रिपोर्ट पर और दूसरी मध्यस्थ पर रखते हैं. तुम चिंता मत करो. तुम्हें बचा लेंगे और वह औरत भी दिला देंगे."

11 जनवरी

आज बन्नू आमरण अनशन पर बैठ गया. तम्बू में धुप-दीप जल रहे हैं. एक पार्टी भजन गा रही है - 'सबको

सन्मति दे भगवान्!'. पहले ही दिन पवित्र वातावरण बन गया है. बाबा सनकीदास इस कला के बड़े उस्ताद हैं. उन्होंने बन्नू के नाम से जो वक्तव्य छपा कर बंटवाया है, वो बड़ा ज़ोरदार है. उसमें बन्नू ने कहा है कि 'मेरी आत्मा से पुकार उठ रही है कि मैं अधूरी हूँ. मेरा दूसरा खंड सावित्री में है. दोनों आत्म-खण्डों को मिलाकर एक करो या मुझे भी शरीर से मुक्त करो. मैं आत्म-खण्डों को मिलाने के लिए आमरण अनशन पर बैठा हूँ. मेरी मांग है कि सावित्री मुझे मिले. यदि नहीं मिलती तो मैं अनशन से इस आत्म-खंड को अपनी नश्वर देह से मुक्त कर दूंगा. मैं सत्य पर हूँ, इसलिए निडर हूँ. सत्य की जय हो!'

सावित्री गुस्से से भरी हुई आई थी. बाबा सनकीदास से कहा," यह हरामजादा मेरे लिए अनशन पर बैठा है ना?"

बाबा बोले," देवी, उसे अपशब्द मत कहो. वह पवित्र अनशन पर बैठा है. पहले हरामजादा रहा होगा. अब नहीं रहा. वह अनशन कर रहा है."

सावित्री ने कहा," मगर मुझे तो पूछा होता. मैं तो इस पर थूकती हूँ."

बाबा ने शान्ति से कहा," देवी, तू तो 'इशू' है. 'इशू' से थोड़े ही पूछा जाता है. गोरक्षा आन्दोलन वालों ने गाय से कहाँ पूछा था कि तेरी रक्षा के लिए आन्दोलन करें या नहीं. देवी, तू जा. मेरी सलाह है कि अब तुम या तुम्हारा पति यहाँ न आएं. एक-दो दिन में जनमत बन जाएगा और तब तुम्हारे अपशब्द जनता बर्दाश्त नहीं करेगी."

वह बड़बड़ाती हुई चली गई.

बन्नू उदास हो गया. बाबा ने समझाया," चिंता मत करो. जीत तुम्हारी होगी. अंत में सत्य की ही जीत होती है."

13 जनवरी

बन्नू भूख का बड़ा कच्चा है. आज तीसरे ही दिन कराहने लगा. बन्नू पूछता है, " जयप्रकाश नारायण आये?"

मैंने कहा," वे पांचवें या छठे दिन आते हैं. उनका नियम है. उन्हें सूचना दे दी है."

वह पूछता है," विनोबा ने क्या कहा है इस विषय में?"

बाबा बोले," उन्होंने साधन और साध्य की मीमांसा की है, पर थोड़ा तोड़कर उनकी बात को अपने पक्ष में उपयोग किया जा सकता है."

बन्नू ने आँखें बंद कर लीं. बोला,"भैया, जयप्रकाश बाबू को जल्दी बुलाओ."

आज पत्रकार भी आये थे. बड़ी दिमाग-पच्ची करते रहे.

पूछने लगे," उपवास का हेतु कैसा है? क्या वह सार्वजनिक हित में है? "

बाबा ने कहा," हेतु अब नहीं देखा जाता. अब तो इसके प्राण बचाने की समस्या है. अनशन पर बैठना इतना बड़ा आत्म-बलिदान है कि हेतु भी पवित्र हो जाता है."

मैंने कहा," और सार्वजनिक हित इससे होगा. कितने ही लोग दूसरे की बीवी छीनना चाहते हैं, मगर तरकीब उन्हें नहीं मालूम. अनशन अगर सफल हो गया, तो जनता का मार्गदर्शन करेगा."

14 जनवरी

बन्नू और कमज़ोर हो गया है. वह अनशन तोड़ने की धमकी हम लोगों को देने लगा है. इससे हम लोगों का मुंह काला हो जायेगा. बाबा सनकीदास ने उसे बहुत समझाया.

आज बाबा ने एक और कमाल कर दिया. किसी स्वामी रसानंद का वक्तव्य अख़बारों में छपवाया है. स्वामीजी ने कहा है कि मुझे तपस्या के कारण भूत और भविष्य दिखता है. मैंने पता लगाया है क बन्नू पूर्वजन्म में ऋषि था और सावित्री ऋषि की धर्मपत्नी. बन्नू का नाम उस जन्म में ऋषि वनमानुस था. उसने तीन हज़ार वर्षों के बाद अब फिर नरदेह धारण की है. सावित्री का इससे जन्म-जन्मान्तर का सम्बन्ध है. यह घोर अधर्म है कि एक ऋषि की पत्नी को राधिका प्रसाद-जैसा साधारण आदमी अपने घर में रखे. समस्त धर्मप्राण जनता से मेरा आग्रह है कि इस अधर्म को न होने दें.

इस वक्तव्य का अच्छा असर हुआ. कुछ लोग 'धर्म की जय हो!' नारे लगाते पाए गए. एक भीड़ राधिका बाबू के घर के सामने नारे लगा रही थी----

"राधिका प्रसाद-- पापी है! पापी का नाश हो! धर्म की जय हो."

स्वामीजी ने मंदिरों में बन्नू की प्राण-रक्षा के लिए प्रार्थना का आयोजन करा दिया है.

15 जनवरी

रात को राधिका बाबू के घर पर पत्थर फेंके गए.

जनमत बन गया है.

स्त्री-पुरुषों के मुख से यह वाक्य हमारे एजेंटों ने सुने---

"बेचारे को पांच दिन हो गए. भूखा पड़ा है."

"धन्य है इस निष्ठां को."

"मगर उस कठकरेजी का कलेजा नहीं पिघला."

"उसका मरद भी कैसा बेशरम है."

"सुना है पिछले जन्म में कोई ऋषि था."

"स्वामी रसानंद का वक्तव्य नहीं पढ़ा!"

"बड़ा पाप है ऋषि की धर्मपत्नी को घर में डाले रखना."

आज ग्यारह सौभाग्यवतियों ने बन्नू को तिलक किया और आरती उतारी.

बन्नू बहुत खुश हुआ. सौभाग्यवतियों को देख कर उसका जी उछलने लगता है.

अखबार अनशन के समाचारों से भरे हैं.

आज एक भीड़ हमने प्रधानमन्त्री के बंगले पर हस्तक्षेप की मांग करने और बन्नू के प्राण बचाने की अपील करने भेजी थी. प्रधानमन्त्री ने मिलने से इनकार कर दिया.

देखते हैं कब तक नहीं मिलते.

शाम को जयप्रकाश नारायण आ गए. नाराज़ थे. कहने लगे," किस-किस के प्राण बचाऊं मैं? मेरा क्या यही धंधा है? रोज़ कोई अनशन पर बैठ जाता है और चिल्लाता है प्राण बचाओ. प्राण बचाना है तो खाना क्यों नहीं लेता? प्राण बचाने के लिए मध्यस्थ की कहाँ ज़रुरत है? यह भी कोई बात है! दूसरे की बीवी छीनने के लिए अनशन के पवित्र अस्त्र का उपयोग किया जाने लगा है."

हमने समझाया," यह 'इशू' ज़रा दूसरे किस्म है. आत्मा से पुकार उठी थी."

वे शांत हुए. बोले," अगर आत्मा की बात है तो मैं इसमें हाथ डालूँगा."

मैंने कहा," फिर कोटि-कोटि धर्मप्राण जनता की भावना इसके साथ जुड़ गई है."

जयप्रकाश बाबू मध्यस्थता करने को राज़ी हो गए. वे सावित्री और उसके पति से मिलकर फिर प्रधानमन्त्री से मिलेंगे.

बन्नू बड़े दीनभाव जयप्रकाश बाबू की तरफ देख रहा था.

बाद में हमने उससे कहा," अबे साले, इस तरह दीनता से मत देखा कर. तेरी कमज़ोरी ताड़ लेगा तो कोई भी नेता तुझे मुसम्मी का रस पिला देगा. देखता नहीं है, कितने ही नेता झोलों में मुसम्मी रखे तम्बू के आस-पास घूम रहे हैं."

16 जनवरी

जयप्रकाश बाबू की 'मिशन' फेल हो गई. कोई मानने को तैयार नहीं है. प्रधानमन्त्री ने कहा," हमारी बन्नू के साथ सहानुभूति है, पर हम कुछ नहीं कर सकते. उससे उपवास तुडवाओ, तब शान्ति से वार्ता द्वारा समस्या का हल ढूँढा जाएगा."

हम निराश हुए. बाबा सनकीदास निराश नहीं हुए. उन्होंने कहा," पहले सब मांग को नामंज़ूर करते हैं. यही प्रथा है. अब आन्दोलन तीव्र करो. अखबारों में छपवाओ क बन्नू की पेशाब में काफी 'एसीटोन' आने लगा है. उसकी हालत चिंताजनक है. वक्तव्य छपवाओ कि हर कीमत पर बन्नू के प्राण बचाए जाएँ. सरकार बैठी-बैठी क्या देख रही है? उसे तुरंत कोई कदम उठाना चाहिए जिससे बन्नू के बहुमूल्य प्राण बचाए जा सकें."

बाबा अद्भुत आदमी हैं. कितनी तरकीबें उनके दिमाग में हैं. कहते हैं, "अब आन्दोलन में जातिवाद का पुट देने का मौका आ गया है. बन्नू ब्राम्हण है और राधिकाप्रसाद कायस्थ. ब्राम्हणों को भड़काओ और इधर कायस्थों को. ब्राम्हण-सभा का मंत्री आगामी चुनाव में खड़ा होगा. उससे कहो कि यही मौका है ब्राम्हणों के वोट इकट्ठे ले लेने का."

आज राधिका बाबू की तरफ से प्रस्ताव आया था कि बन्नू सावित्री से राखी बंधवा ले.

हमने नामंजूर कर दिया.

17 जनवरी

आज के अखबारों में ये शीर्षक हैं---

"बन्नू के प्राण बचाओ!

बन्नू की हालत चिंताजनक!'

मंदिरों में प्राण-रक्षा के लिए प्रार्थना!"

एक अख़बार में हमने विज्ञापन रेट पर यह भी छपवा लिया---

"कोटि-कोटि धर्म-प्राण जनता की मांग---!

बन्नू की प्राण-रक्षा की जाए!

बन्नू की मृत्यु के भयंकर परिणाम होंगे !"

ब्राम्हण-सभा के मंत्री का वक्तव्य छप गया. उन्होंने ब्राम्हण जाति की इज्ज़त का मामला इसे बना लिया था. सीधी कार्यवाही की धमकी दी थी.

हमने चार गुंडों को कायस्थों के घरों पर पत्थर फेंकने के लिए तय कर किया है.

इससे निपटकर वही लोग ब्राम्हणों के घर पर पत्थर फेंकेंगे.

पैसे बन्नू ने पेशगी दे दिए हैं.

बाबा का कहना है क कल या परसों तक कर्फ्य लगवा दिया जाना चाहिए. दफा 144 तो लग ही जाये. इससे 'केस' मज़बूत होगा.

18 जनवरी

रात को ब्राम्हणों और कायस्थों के घरों पर पत्थर फिंक गए.

सुबह ब्राम्हणों और कायस्थों के दो दलों में जमकर पथराव हुआ.

शहर में दफा 144 लग गयी.

सनसनी फैली हुई है.

हमारा प्रतिनिधि मंडल प्रधानमन्त्री से मिला था. उन्होंने कहा," इसमें कानूनी अडचनें हैं. विवाह-क़ानून में संशोधन करना पड़ेगा."

हमने कहा," तो संशोधन कर दीजिये. अध्यादेश जारी करवा दीजिये. अगर बन्नू मर गया तो सारे देश में आग लग जायेगी."

वे कहने लगे," पहले अनशन तुडवाओ ? "

हमने कहा," सरकार सैद्धांतिक रूप से मांग को स्वीकार कर ले और एक कमिटी बिठा दे, जो रास्ता बताये कि वह औरत इसे कैसे मिल सकती है."

सरकार अभी स्थिति को देख रही है. बन्नू को और कष्ट भोगना होगा.

मामला जहाँ का तहाँ रहा. वार्ता में 'डेडलॉक' आ गया है.

छुटपुट झगड़े हो रहे हैं.

रात को हमने पुलिस चौकी पर पत्थर फिंकवा दिए. इसका अच्छा असर हुआ.

'प्राण बचाओ'---की मांग आज और बढ़ गयी.

19 जनवरी

बन्नू बहुत कमज़ोर हो गया है. घबड़ाता है. कहीं मर न जाए.

बकने लगा है कि हम लोगों ने उसे फंसा दिया है. कहीं वक्तव्य दे दिया तो हम लोग 'एक्सपोज़' हो जायेंगे.

कुछ जल्दी ही करना पड़ेगा. हमने उससे कहा कि अब अगर वह यों ही अनशन तोड़ देगा तो जनता उसे मार डालेगी.

प्रतिनिधि मंडल फिर मिलने जाएगा.

20 जनवरी

'डेडलॉक '

सिर्फ एक बस जलाई जा सकी.

बन्नू अब संभल नहीं रहा है.

उसकी तरफ से हम ही कह रहे हैं कि "वह मर जाएगा, पर झुकेगा नहीं!"

सरकार भी घबराई मालूम होती है.

साधुसंघ ने आज मांग का समर्थन कर दिया.

ब्राम्हण समाज ने अल्टीमेटम दे दिया. १० ब्राम्हण आत्मदाह करेंगे.

सावित्री ने आत्महत्या की कोशिश की थी, पर बचा ली गयी.

बन्नू के दर्शन के लिए लाइन लगी रही है.

राष्ट्रसंघ के महामंत्री को आज तार कर दिया गया.

जगह-जगह- प्रार्थना-सभाएं होती रहीं.

डॉ. लोहिया ने कहा है कि जब तक यह सरकार है, तब तक न्यायोचित मांगें पूरी नहीं होंगी. बन्नू को चाहिए कि वह सावित्री के बदले इस सरकार को ही भगा ले जाए.

21 जनवरी

बन्नू की मांग सिद्धांततः स्वीकार कर ली गयी.

व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाने के लिए एक कमेटी बना दी गई है.

भजन र प्रार्थना के बीच बाबा सनकीदास ने बन्नू को रस पिलाया. नेताओं की मुसम्मियाँ झोलों में ही सूख गईं. बाबा ने कहा कि जनतंत्र में जनभावना का आदर होना चाहिए. इस प्रश्न के साथ कोटि-कोटि जनों की भावनाएं जुड़ी हुई थीं. अच्छा ही हुआ जो शान्ति से समस्या सुलझ गई, वर्ना हिंसक क्रान्ति हो जाती.

ब्राम्हणसभा के विधानसभाई उमीदवार ने बन्नू से अपना प्रचार कराने के लिए सौदा कर लिया है. काफी बड़ी रकम दी है. बन्नू की कीमत बढ़ गयी.

चरण छूते हुए नर-नारियों से बन्नू कहता है," सब ईश्वर की इच्छा से हुआ. मैं तो उसका माध्यम हूँ."

नारे लग रहे हैं -- सत्य की जय! धर्म की जय!