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Friday, November 15, 2013

अगर तुम मुझे भूल जाओ - पाब्लो नेरुदा


कवि का दायित्व -पाब्लो नेरुदा

(नेरुदा की यह प्रेम कविता अपने प्यारे वतन चिल के लिए है जिससे वे बेपनाह मुहब्बत करते थे, फिर भी उन्हें राजनीतिक कारणों से देश निकाला हुआ था. प्रेम कविता के रूप में भी यह उदात्त भावों से परिपूर्ण है.)

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मैं चाहता हूँ तुम्हें बताना

एक बात.

 
जानती हो कैसा लगता है

जब मैं देखता हूँ

मणिमय चाँद की ओर,

मेरी खिड़की पर धीमे कदमों से आती

शरद की लाल टहनियों की ओर,

अगर मैं स्पर्श करता हूँ

आग के आसपास

या लट्ठे की झुर्रीदार देह पर,

हर चीज ले जाती है मुझे तेरी ओर,

मानो हर वो चीज जो मौजूद है यहाँ,

गंध, रोशनी, धातु,

छोटी नावें हैं

जो तैरती हुई

जा रही हैं मेरे लिए प्रतीक्षारत

तुम्हारे द्वीपों की ओर.

 
खैर, अब,

अगर तुम धीरे-धीरे छोड़ दो मुझे चाहना

मैं छोड़ दूँगा तुम्हें चाहना धीरे-धीरे.


अगर अचानक

तुम मुझे भूल जाओ

तो मेरी राह मत देखना,

कि मैं तो पहले ही भुला दिया रहूँगा तुम्हें.

 
अगर तुम मानती हो इसे उत्कट अभिलाषा और पागलपन

लहराते झंडों की हवा

जो गुजरती है मेरी जिन्दगी से होकर,

और फैसला करती हो तुम

मुझे छोड़ने का सागर किनारे

दिल के पास जहाँ मेरी जड़ें हैं,

याद रहे

की उस दिन,

उस पहर,

उठाउँगा मैं अपनी बाहें

और हमारी जड़ें प्रयाण करेंगी
किसी दूसरे देश की तलाश में.

 
लेकिन

अगर हर दिन

हर घंटे,

तुम्हे लगता है कि तुम मेरी तक़दीर हो

बेरहम मिठास के साथ,

अगर हर दिन एक फूल

आरोहित हो तुम्हारे होठों पर मेरी चाहत में,

आह मेरी प्यारी, आह मेरी अपनी,

मुझमें भी तो धधकते हैं ये सभी आग,

कुछ भी भूला या बुझा नहीं है मेरे भीतर,
मेरा प्यार पलता है तुम्हारे प्यार पर, प्रिया,

और जब तक इसे जियोगी तुम रहेगा तुम्हारी बाँहों में

मेरी बाँहों को त्यागे बिना.  

(अनुवाद- दिगम्बर)

Monday, October 7, 2013

लू शुन की दो गद्य कविताएँ

(विश्व साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर लू शुन ने सृजानात्मक लेखन की तुलना में ज़नोन्मुख लेखकों की नयी पीढ़ी तैयार करने और सांस्कृतिक आन्दोलन खड़ा करने की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को अधिक महत्त्व दिया. पिछड़े हुए चीनी समाज के लिए यह ऐतिहासिक दायित्व स्वतंत्र लेखन से कहीं अधिक महत्व रखता था. इस कलम के सिपाही ने साहित्यिक लेख, व्यंग्य, लघु कथाएँ, कहानियाँ, समीक्षात्मक लेख और ऐतिहासिक उपन्यास के साथ-साथ गद्य कवितायेँ भी लिखीं. उनकी गद्य कविताओं का संकलन ‘वाइल्ड ग्रास’ नाम से प्रकाशित हुआ है. 1924 से 1926 के बीच लिखी गयी इन गद्य कविताओं साम्राज्यवाद और उत्तरी युद्ध सरदारों के खिलाफ प्रतिरोध और दमन की अभिव्यन्ज़ना सांकेतिक और अमूर्त शैली में की गयी है. इसका कारण शायद यह रहा हो कि उस समय साहित्य को कठोर सेंसर से गुज़ारना होता था.

इन गद्य कविताओं में ऊपर-ऊपर देखने पर निराशा और भयावहता की झलक मिल सकती है, लेकिन इन प्रतीकात्मक कविताओं के विविध रंग हैं. इनमें स्वप्न का सृज़न है जिनमें दु:स्वप्न भी शामिल हैं. यहाँ कुत्ते से वार्तालाप है, कीड़ों कि भिनभिनाहट है और इंसानों की नज़र से खुद को छिपाने की कोशिश करता आकाश है. समाज के ढोंग-पाखंड, निष्क्रियता, हताशा और ठहराव पर विक्षुब्ध टिप्पणी है जो मुखर नहीं है.

‘वाइल्ड ग्रास’ की भूमिका में लू शुन ने लिखा है- “धरती के भीतर तीव्र वेग से जो अग्नि-मंथन हो रहा है, उस का लावा जब सतह पर आएगा, तो वह सभी जंगली घासों और गहराई से धंसे विष-वृक्षों को जला कर खाक कर देगा, ताकि सडान्ध पैदा करनेवाली कोई चीज़ न रह जाय.”)

lu shun

भिखमँगे

मैं एक पुरानी-धुरानी, ऊँची दिवार के बगल से गुजर रहा हूँ, बारीक धूल में पैर घिसटते हुए. कई दूसरे लोग भी अकेले टहल रहे हैं. हवा का एक झोंका आया और दीवार के ऊपर से झांकते ऊँचे-ऊँचे पेड़ों की डालियाँ, जिनके पत्ते अभी झड़े नहीं हैं, मेरे सिर के ऊपर हिल रही हैं.
हवा का एक झोंका आया और हर जगह धूल ही धूल.
एक बच्चा मुझ से भीख माँग रहा हैं. वह दूसरे लोगों की तरह ही धारीदार कपड़े पहने हुए है और देखने से दुखी भी नहीं लगता , फिर भी वह रास्ता रोक कर मेरे आगे सिर झुकाता हैं और मेरे पीछे-पीछे चलता हुआ रिरियाता है.
मैं उसकी आवाज, उसके तौर-तरीके को नापसंद करता हूँ. उसमें उदासी का ना होना मेरे अन्दर घृणा पैदा करता है, जैसे यह कोई चाल हो. जिस तरह वह मेरा पीछा करते हुए रिरिया रहा है, उससे मेरे मन में जुगुप्सा पैदा हो रही है.
मैं चलता रहा. कई दूसरे लोग भी अकेले टहल रहे हैं. हवा का एक झोंका आया और हर जगह धूल ही धूल.
एक बच्चा मुझसे भीख माँग रहा है. वह दूसरे लोगों की तरह ही धारीदार कपडे पहने हुए है और देखने से दुखी नही लगता, लेकिन वह गूँगा है. वह गूँगे की तरह मेरी ओर हाथ फैलाता है.
मैं उसके गूँगेपन के इस दिखावे को नापसंद करता हूँ. हो सकता है कि वह गूँगा न हो, यह केवल भीख माँगने का उसका जरिया हो सकता है.
मैं उसे भीख नहीं देता. मुझे भीख देने की इचछा नहीं है. मैं भीख देने वालों से परे हूँ. उसके लिए मेरे मन में जुगुप्सा, संदेह और घृणा है.
मैं एक ढही हुई मिटटी की दीवार के बगल से गुजर रहा हूँ. बीच की जगह में टूटी हुई ईंटों की ढेर लगी है और दीवार के आगे कुछ नहीं है. हवा का एक झौंका आया आता है, मेरे धारीदार चोंगे के भीतर पतझड़ की सिहरन भर जाती है, और हर जगह धूल ही धूल है.
मुझे उत्सुकता होती है कि भीख माँगने के लिए मुझे क्या तरीका अपनाना चाहिए. मुझे कैसी आवाज में बोलना चाहिए? अगर मैं गूँगा होने का दिखावा करूँ तो मुझे गूँगापन कैसे प्रदर्शित करना चाहिए? ___
कई दूसरे लोग अकेले टहल रहे है .
मुझे भीख नहीं मिलेगी, भीख देने की इच्छा तक हासिल नहीं होगी. जो लोग खुद को भीख देने वालों से परे मानते हैं उनकी जुगुप्सा, संदेह और घृणा ही मिलेगी मुझे.
मैं निष्क्रियता और चुप्पी धारण किये भीख मागूँगा ...
अंततः मुझे शून्यता हासिल होगी.
हवा का एक झोंका आता है और हर जगह धूल ही धूल. कई दूसरे लोग अकेले टहल रहे हैं.
धूल, धूल ...
..................
धूल ...

लेखन-काल 24 सितम्बर, 1924

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परछाईं का अवकाश ग्रहण

जब आप एक ऐसे समय तक सोते हैं जब आप को समय का अता-पता ही न चले, तब आपकी परछाईं इन शब्दों में अवकाश लेने आयेगी –
“कोई चीज है जिसके मैं स्वर्ग से नफरत करती हूँ, मैं वहाँ जाना नहीं चाहती. कोई चीज है जिसके चलते मैं नरक से नफरत करती हूँ, मैं वहाँ जाना नहीं चाहती. कोई चीज है आपके भविष्य की सुनहरी दुनिया में जिससे मैं नफरत करती हूँ, मैं वहाँ नहीं जाना चाहती.
“हालाँकि यह आप ही हो, जिससे मैं नफरत करती हूँ.”
“दोस्त, अब और तुम्हारा अनुसरण नहीं करूँगी, मैं रुकना नहीं चाहती.
“मैं नहीं चाहती!
“ओह, नहीं! मैं नहीं चाहती. इससे तो कहीं अच्छा है कि मैं शून्य में भटकूँ.
मैं तो केवल एक परछाईं हूँ. मैं तुम्हें त्याग दूँगी और अन्धेरे में डूब जाऊँगी. फिर वह अन्धेरा हमें निगल लेगा, और रोशनी भी मुझे गायब कर देगी.
“लेकिन मैं रोशनी और छाया के बीच भटकना नहीं चाहती, इससे तो कहीं अच्छा कि मैं अन्धेरे में डूब जाऊं.
“फिर भी अब तक मैं रोशनी और छाया के बीच ही मँडरा रही हूँ, अनिश्चय में कि अभी साँझ हुई या भोर. मैं तो बस अपने धूसर-भूरे हाथ उठा सकती हूँ जैसे शराब की एक प्याली खत्म करनी हो. जिस समय मुझे समय का अता-पता नहीं रह जाएगा, तब मैं दूर तक अकेली ही चली जाऊँगी.
“हाय! अगर अभी साँझ हुई है, तो काली रात मुझे पक्के तौर पर घेर लेगी या मैं दिन के उजाले में लुप्त कर दी जाऊँगी अगर अभी भोर हुई है.
“दोस्त, समय अभी हाथ में है.
“मैं शून्यता में भटकने के लिए अन्धेरे में प्रवेश करने जा रही हूँ .
“अभी भी आप हमसे कोई उपहार की उम्मीद रखते हैं. मेरे पास देने के लिए है ही क्या? अगर आप जिद करेंगे तो आपको वही अन्धेरा और शून्यता हासिल होगी. लेकिन मैं चाहूँगी कि केवल अन्धेरा ही मिले जो आपके दिन के उजाले में गायब हो सके. मैं चाहूँगी कि यह केवल शून्यता हो, जो आपके हृदय को कभी भी काबू में नहीं रखेगी.
“मैं यही चाहती हूँ, दोस्त –
“दूर, बहुत दूर, एक ऐसे अन्धेरे में जाना जिससे न केवल तुम्हें, बल्कि दूसरी परछाइयों को भी निकाल बाहर किया जाय. वहाँ सिर्फ मैं रहूँगी अन्धेरे में डूबी हुई. वह दुनिया पूरी तरह मेरी होगी.”

लेखन-काल 24 सित. 1924

(अनुवाद – दिगम्बर)

Tuesday, August 20, 2013

एदुआर्दो गालेआनो की कविता -- दुनिया भर में डर

eduardo 1
जो लोग काम पर लगे हैं वे भयभीत हैं
कि उनकी नौकरी छूट जायेगी
जो काम पर नहीं लगे वे भयभीत हैं
कि उनको कभी काम नहीं मिलेगा
जिन्हें चिंता नहीं है भूख की
वे भयभीत हैं खाने को लेकर
लोकतंत्र भयभीत है याद दिलाये जाने से और
भाषा भयभीत है बोले जाने को लेकर
आम नागरिक डरते हैं सेना से,
सेना डरती है हथियारों की कमी से
हथियार डरते हैं कि युद्धों की कमी है
यह भय का समय है
स्त्रियाँ डरती हैं हिंसक पुरुषों से और पुरुष
डरते हैं निर्भय स्त्रियों से
चोरों का डर, पुलिस का डर
डर बिना ताले के दरवाज़ों का,
घड़ियों के बिना समय का
बिना टेलीविज़न बच्चों का, डर
नींद की गोली के बिना रात का और दिन
जगने वाली गोली के बिना
भीड़ का भय, एकांत का भय
भय कि क्या था पहले और क्या हो सकता है
मरने का भय, जीने का भय.

Friday, August 9, 2013

रॉक डाल्टन की कविता -- बेहतर प्यार के लिए

roque_dalton

रॉक डाल्टन (1935-1975) अल साल्वाडोर के क्रांतिकारी कवि रॉक डाल्टन ने अपनी छोटी सी जिंदगी कला और क्रांति के सिद्धांत को आत्मसात करने और उसे ज़मीन पर उतारने मे बिताई. उनका पूरा जीवन जलावतनी, गिरफ्तारी, यातना, छापामार लड़ाई और इन सब के साथ-साथ लेखन में बीता. उनकी त्रासद मौत अल साल्वाडोर के ही एक प्रतिद्वंद्वी छापामार समूह के हाथों हुई. उनकी पंक्ति- "कविता, रोटी की तरह सबके लिए है" लातिन अमरीका मे काफ़ी लोकप्रिय है. यह कविता मन्थली रिव्यू, दिसंबर 1985 में प्रकाशित हुई थी.)

हर कोई मानता है कि लिंग
एक श्रेणी विभाजन है प्रेमियों की दुनिया में-
इसी से फूटती हैं शाखाएँ कोमलता और क्रूरता की.

हर कोई मानता है कि लिंग
एक आर्थिक श्रेणी विभाजन है-
उदाहरण के लिए आप वेश्यावृत्ति को ही लें,
या फैशन को,
या अख़बार के परिशिष्ट को
जो पुरुष के लिए अलग है, औरत के लिए अलग.

मुसीबत तो तब शुरू होती है
जब कोई औरत कहती है
कि लिंग एक राजानीती श्रेणी विभाजन है.

क्योंकि ज्यों ही कोई औरत कहती है
की लिंग एक राजनीतिक श्रेणी विभाजन है
तो वह जैसी है, वैसी औरत होने पर लगा सकती है विराम
और अपने आप की खातिर एक औरत होने की कर सकती है शुरुआत,
औरत को एक ऐसी औरत मे ढालने की
जिसका आधार उसके भीतर की मानवता हो
उसका लिंग नहीं.

वह जान सकती है कि नीबू की महक वाला जादुई इत्र
और उसकी त्वचा को कामनीयता से सहलाने वाला साबुन
वही कंपनी बनाती है, जहाँ बनता है नापाम बम,
कि घर के सभी ज़रूरी काम
परिवार के एक ही सामाजिक समुदाय की ज़िम्मेदारी हैं,
की लिंग की भिन्नता
प्रणय के अंतरंग क्षणों मे तभी परवान चढ़ती है
जब परदा उठ जाता है उन सारे रहस्यों से
जो मजबूर करते हैं मुखौटा पहनने पर और पैदा करते हैं आपसी मनमुटाव.

(अनुवाद- दिगम्बर)

Tuesday, July 2, 2013

नाजिम हिकमत की कविता- डॉन क्विग्जोट

don qvigjot 2

अमर नौजवानों के शूरवीर
पचास की उम्र में पाया कि उसका दिमाग है
उसके दिल में
और जुलाई की एक सुबह निकल पड़ा
सही, सुन्दर और जायज चीजों पर कब्ज़ा करने.

उसके सामने थी पागल और मगरूर दानवों की एक दुनिया,
वह अपने मरियल, लेकिन बहादुर रोसिनान्ते पर सवार.
मैं जानता हूँ किसी चीज की ख्वाहिश का मतलब,
लेकिन अगर तुम्हारे दिल का वजन सिर्फ एक पौंड सोलह औंस है,
तो मेरे डॉन, इन बेहूदी पवनचक्कियों से लड़ना,
कोई समझदारी की बात नहीं.

मगर तुम ठीक कह रहे हो, यकीनन दुल्सीनिया तुम्हारी औरत है,
इस दुनिया में सबसे खूबसूरत,
मुझे यकीन है कि तुम यह बात
गली के दुकानदारों के मुँह पर कहोगे चीखते हुए,
लेकिन वे तुम्हें गिराएँगे घोड़े से खींच कर
और बुरी तरह पीटेंगे.
मगर तुम, हमारे अभागे अजेय शूरवीर,
दमकते रहोगे अपने भारी-भरकम लोहे की टोप में
और दुल्सीनिया और भी खूबसूरत हो जायेगी.

(अंग्रेजी से अनुवाद- दिगम्बर)

Thursday, June 27, 2013

व्लादिमीर मायकोवस्की की कविता- तुम

maykovasky
तुम, जो व्याभिचार के कीचड़ में लगातार लोट रहे हो,
गरम गुसलखाने और आरामदायक शौचालय के मालिक!
तुम्हारी मजाल कि अपनी चुन्धियायी आँखों से पढ़ो
अखबार में छपी सेंट जोर्ज पदक दिये जाने जैसी खबर!

तुमको परवाह भी है, उन बेशुमार मामूली लोगों की
जिन्हें चिंता है कि वे कैसे पूरी करते रहे तुम्हारी हवश,
कि शायद अभी-अभी लेफ्टिनेंट पेत्रोव की दोनों टांगें
उड़ गयीं हैं बम के धमाके से?

कल्पना करो कि अगर वह, जिसे बलि देने के लिये लाया गया,
अपने खून से लतपथ टांगे लिये आये और अचानक देख ले,
कि वोदका और सोडा-वाटर गटकते अपने पियक्कड थोबड़े से
गुनगुना रहे हो तुम सेवेरियाती का कामुक गीत!

औरतों की देह, मुर्ग-मुसल्लम और मोटर गाड़ियों के पीछे पागल
तुम्हारे जैसे अय्याश लोगों के लिये, मैं अपनी जान दे दूँ?
इससे लाख दर्जे अच्छा है कि मास्को के भटियारखाने में जाकर
वहाँ रंडियों को शरबत पिलाने के काम में लग जाऊं.

(अनुवाद- दिगम्बर)

Tuesday, May 14, 2013

रसूल हमजातोव की कविता

rasul hamjatov

मेरी मातृभाषा

हमारी नींदों में आते हैं

अजीबोगरीब ख़यालात-

कल रात मैंने ख्वाब में देखा

कि मरा पड़ा हूँ

एक गहरे खड्ड के किनारे

सीने में धंसी है एक गोली.

 

हहराती-शोर मचाती

बह रही है कोई नदी पास में.

मदद के लिये कर रहा हूँ

वेवजह इंतजार.

पड़ा हुआ हूँ धुल भरी धरती पर

धूल में मिलनेवाला हूँ शायद.

 

किसी को क्या पता

कि मैं मर रहा हूँ यहाँ पड़े-पड़े

कोई हमदर्द नहीं आसपास.

आकाश में मंडरा रहे हैं चील

और शर्मीली हिरने भर रही हैं कुलांचे.

 

कोई नहीं जो मातम मनाये

मेरी बेवक्त मौत पर कोई नहीं रोवनहार

न माँ, न बीवी, न साथी-संगाती

न गाँव-जवार के लोग-बाग.

 

पर ज्योंही मरने को तैयार हुआ

बेखबर और गुमनाम

कि कानों में पड़ी जानी-पहचानी आवाज

मेरी मातृभाषा, अवार भाषा में बतियाते

गुजर रहे थे दो लोग.

 

एक गहरे खड्ड में पड़ा

खत्म हो रहा हूँ मैं नाचीज

और वे मस्ती में बतियाए जा रहे हैं

किसी हसन की मक्कारी या

किसी अली की साजिश के किस्से.

 

जैसे ही मेरे कानों घुली

अवार भाषा की खुशनुमा बातचीत,

मेरी जान आ गयी वापस.

और महसूस हुआ जैसे

किसी हकीम, किसी वैद्य के पास

नहीं है कोई इलाज,

संजीवनी है तो बस अवार भाषा.

 

दूसरी कोई भाषा अपने खास अंदाज में

कर सकती है किसी दूसरे का उपचार,

लेकिन मैं ठहरा अवार.

अगर कल को मिट जाना

नियति है मेरी भाषा की,

तो मैं आज ही मर जाना चाहूँगा.

 

क्या फर्क पड़ता है अगर

नहीं गूँजती बड़ी महफ़िलों में,

पर मेरे लिये अपनी अवार भाषा

माँ के दूध के साथ हासिल अवार ही

सबसे महान है इस धरती पर!

 

आनेवाली नस्लें

सिर्फ तर्जुमा में पढ़ेंगी महमूद की शायरी?

क्या मैं आखिरी आदमी हूँ

अवार भाषा में लिखने

और समझे जाने लायक?

 

मैं प्यार करता हूँ जिन्दगी से

और पूरी दुनिया से

निहारता हूँ टकटकी लगाये

उसका सुन्दर सुहाना रूप.

लेकिन सबसे प्यारी, सबसे न्यारी

हमारी सोवियत भुमि

जिसका गुणगान किया मैंने

अपनी अवार भाषा में.

 

पूरब से पश्चिम तक विस्तृत

मेहनतकशों के इस आजाद देश पर

जान लुटाता हूँ मैं.

पर ख्वाहिश यही है मन में

कि मेरी कब्र बने उस जगह

जहाँ के लोग बोलते हों अवार.

 

और जमा हों वहाँ अवार लोग

बतियाएं आपस में मिलजुल

अवार भाषा में चर्चा करें

कि यहाँ लेटा है हमारा अपना कवि

रसूल, हमारे अपने कवि का बेटा और वारिस.

(अनुवाद- दिगम्बर)

Sunday, May 12, 2013

राय जाहिर करने के बारे में

 

–लू शुन


lu shun


मैनें सपना देखा


कि मैं प्राथमिक विद्यालय की एक कक्षा में था । एक लेख लिखने की तैयारी कर रहा था और मैंने शिक्षक से पूछा कि कोई राय जाहिर करनी हो तो कैसे करें ।

“यह तो कठिन काम है ।” अपने चश्में के बाहर से मेरी ओर निहारते हुए उन्होंने कहा, “मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ–
“एक परिवार में जब बेटा पैदा हुआ, तो पूरे घराने में खुशी की लहर दौड़ गयी । जब वह बच्चा एक महीने का हो गया, तो वे लोग उसे मेहमानों को दिखाने के लिए बाहर ले आये । जाहिर है कि उन्हें उन लोगों से शुभकामनाओं की उम्मीद थी ।
“एक ने कहा– ‘यह बच्चा धनवान होगा ।’ उसे लोगों ने हृदय से धन्यवाद दिया ।
“एक ने कहा– ‘यह बच्चा बड़ा होकर अफसर बनेगा ।’ उसे भी जवाब में लोगों की प्रशंसा मिली ।
“एक ने कहा– ‘यह बच्चा मर जायेगा ।’ उसके बाद पूरे परिवार ने मिल कर उसकी कस के धुनाई की ।
“बच्चा मरेगा, यह तो अवश्यंभावी है, जबकि वह धनवान होगा या अफसर बनेगा, ऐसा कहना झूठ भी हो सकता है । फिर भी झूठ की प्रशंसा की जाती है, जबकि अपरिहार्य सम्भावना के बारे में दिये गये वक्तव्य पर मार पिटाई होती है । तुम–––”
“मैं झूठी बात नहीं कहना चाहता श्रीमान, और पिटना भी नहीं चाहता । तो मुझे क्या कहना चाहिए ?”
“ऐसी स्थिति में कहो– ‘आ हाहा! जरा इस बच्चे को तो देखो! मेरी तरफ से इसे––– आ हाहा! मेरा मतलब आहाहा! हे, हे! हे, हे, हे, हे।

Thursday, February 7, 2013

व्यंग्य









-ओत्तो रेने कास्तिलो 

हिटलर ने कहा था 1935 में कि
“नाजी जर्मनी
हजार सालों तक कायम रहेगा

ठीक दस साल बाद 
क्या कहा था हिटलर ने
बर्लिन के खंडहरों तले?

कुछ ही साल बाद
डलेस महोदय ने
एक विराट ट्रेक्टर की तरह घड़घड़ाते हुए
कहा “यह दशक देखेगा
साम्यवादी गुलामी का अंत.”

कुछ ही वर्षों बाद
यूरी गगारिन ने क्या किया  
जब अमरीका के विस्तीर्ण सागर और 
विस्तृत भूभाग के ऊपर असीम आकाश से
उसने मानवता को बधाई सन्देश दिया?


टॉमस मान सही थे
जब उन्होंने कहा कि
“साम्यवाद-विरोध
बीसवीं सदी की
सबसे मजाकिया तरकीब है.”

फिर भी
उनके स्वार्थ
उनका मुनाफा 
जारी है धूमधाम से
जारी है कत्लोगारत
आज भी.

Tuesday, February 5, 2013

एक अन्याय की रपट


(पिछले दिनों इलाहाबाद शहर को सुन्दर बनाने के लिए जब वहाँ ठेला-खोमचा और पटरी पर सामान बेचनेवाले मेहनतकश लोगों के उजाड़े जाने की खबर साथी उत्पला शुक्ला ने दी थी, तभी ग्वाटेमाला के क्रन्तिकारी कवि ओत्तो रेने कास्तिलो की यह कविता याद आयी थी और इसे अंग्रेजी में साथियों को पढ़वाया भी था. बेदखली और विस्थापन हमारे यहाँ रोजमर्रे की घटना हो गयी है. हृदयहीन शासक-प्रशासक देश भर में ग़रीबों की रोजी-रोटी छीन रहे हैं  और उन्हें दर-दर की ठोकर खाने पर मजबूर कर रहे हैं. इस कविता में दामियाना मुर्सिया को इसलिए सड़क पर फेंक दिया गया, क्योंकि उसने घर का किराया नहीं चुकाया. लेकिन हमारे महान लोकतंत्र में तो बिना किसी वजह के, केवल शासकों की सनक और शौक के चलते किसी को, कहीं से भी,कभी भी उजाड़ दिया जाता है और उसे विकास का नाम दे दिया जाता है.) 

एक अन्याय की रपट - ओत्तो रेने कास्तिलो 

“गार्सिया की बिधवा, 77 वर्षीय श्रीमती दामिआना मुर्सिया के घरेलू सामान पिछ्ले कुछ दिनों से खुले में पड़े-पड़े बारिश में भींग रहे हैं, जिन्हें तीसरे और चौथे अंचल के बीच, गाली नं. 15 “सी” स्थित उनके छोटे-से घर के बाहर फेंक दिया गया था.” (रेडियो अखबार “डायरियो मिनुतो” पहला संस्करण, बुधवार, 10 जून, 1964.)

शायद आप यकीन न करें,
लेकिन यहाँ,
मेरी आँखों के आगे,
एक बूढी औरत,
गार्सिया की बिधवा, दामियाना मुर्सिया,
77 साल की जर्जर काया,
बारिश में भींगती,
अपने टूटे-फूटे, पुराने, दागदार,
फर्नीचरों के बगल में खड़ी,
अपनी झुकी पीठ पर
सह रही है
आपकी और मेरी इस व्यवस्था के
सभी दानवी अन्याय.

गरीब होने के चलते,
धनिकों के न्यायाधीशों ने
आदेश दिया बेदखली का.
अब तक शायद आपने
इस शब्द को समझा नहीं.
कितनी महान दुनिया में
जी रहे हैं आप!
जहाँ धीरे-धीरे करके
अत्यंत पीड़ादायक शब्द
अपनी क्रूरता खोते जा रहे हैं.
और उनकी जगह हर रोज,
भोर की तरह,
उग आते हैं नए-नए शब्द
आदमी के प्रति
प्रेम और नरमी से भरपूर.

बेदखली,
कैसे किया जाय इसका बयान?
आप जानते हैं,
जब आप किराया नहीं चुका सकते
तो आ धमकते हैं धनिकों के अधिकारी
और फेंक देते हैं आपके सामान
बाहर गली में.
और ख्वाबों में खोये-खोये अचानक
आपके सर से छत छिन जाती है.
यही मतलब है इस शब्द का
बेदखली- अकेलापन
खुले आकाश के नीचे,
आँखे आँकती हैं, मुसीबत.

ये आजाद दुनिया है, वे कहते हैं.
कैसी किस्मत कि तुम
अब तक नहीं जान पाए
इन स्वाधीनताओं को!

गार्सिया की बिधवा दमियाना मुर्सिया
आप को मालूम है,
बहुत छोटी है,
और ठण्ड से बुरी तरह काँपती हुई.

उसका अकेलापन कितना महान है!

आप यकीन नहीं करेंगे,
कितना सताते हैं ये अन्याय.

हमारे लिए तो रोजमर्रे की बात हैं  
अजूबा तो तब हो कि कोई करुणा
और गरीबी से घृणा की बात करे.
और फिर भी हमेशा से ज्यादा
प्यार करता हूँ मैं आपकी दुनिया को,
इसे जानता-समझता हूँ,
महिमा मण्डित करता हूँ
इसके विश्वव्यापी गौरव को.

और खुद से पूछता हूँ मैं-
क्यों हमारे बूढ़े लोग
इस हद तक कष्ट सहते है,
जबकि बुढ़ापा सबके लिए
आता है एक दिन?
लेकिन सबसे बुरी चीज है
आदत.
आदमी खो देता है अपनी मानवता,
परवाह नहीं उसे
दूसरों की असह्य वेदना की.
और वह खाता है
वह हँसता है
और वह हर बात भुला देता है.

मैं नहीं चाहता इन चीजों को
अपने देश की खातिर.
मैं नहीं चाहता इन चीजों को
किसी के लिए भी.
मैं नहीं चाहता इन चीजों को
दुनिया में किसी के लिए भी.
और मैं कहता हूँ
दर्द का मारा
कि सम्हालना चाहिए
एक अमिट आभा.  

यह आज़ाद दुनिया है, वे कहते हैं.

मेरी तरफ देखो.
और कहो अपने साथियों से
कि मेरी हँसी
मेरे चेहरे के बीचोंबीच
विकृत रूप ले चुकी है.

कहो उनसे मैं उनकी इस दुनिया को प्यार करता हूँ.
उन्हें खूबसूरत बनाना चाहिए इसको.
और मैं बेहद खुश हूँ
कि वे जान ही नहीं पाए अबतक
कि अन्याय
कितना गहरा और तकलीफदेह है.

(अनुवाद- दिगम्बर) 

Monday, February 4, 2013

अराजनीतिक बुद्धिजीवी


-ओत्तो रेने कास्तिलो 
(ग्वाटेमाला के क्रन्तिकारी कवि, जन्म 1934 – मृत्यु 1967 )

















एक दिन
हमारे देश के
अराजनीतिक बुद्धिजीवियों से
पूछताछ करेंगे
हमारे सबसे सीधे-सादे लोग.

उनसे पूछा जायेगा
कि उन्होंने क्या किया
जब उनका राष्ट्र
मरता रहा धीरे-धीरे,
सुलगता धीमी आँच में,
निर्बल और अकेला.

कोई भी उनसे नहीं पूछेगा
उनकी पोशाक के बारे में,
दोपहर में खाकर
सुस्ताने के बारे में,
कोई नहीं जानना चाहेगा
“शून्य के विचार” के साथ
उनके बंजर मुकाबलों के बारे में.

परवाह नहीं करेगा कोई भी
उनकी महँगी ऊँची पढ़ाई की.
नहीं पूछा जायेगा उनसे
यूनानी मिथकों के बारे में.
या उस आत्म-घृणा के बारे में
जो उत्पन्न होती है उस समय
जब उन्हीं में से कोई
शुरू करता है
कायरों की मौत मरना.

कुछ भी नहीं पूछा जायेगा 
उनके बेहूदे तर्कों के बारे में,
जो सफ़ेद झूठ के साये में
पनपते हैं.

उस दिन
सीधे-सादे लोग आयेंगे.
जिनके लिए कोई जगह नहीं थी
अराजनीतिक बुद्धिजीवियों की
किताबों और कविताओं में,
लेकिन रोज पहुँचाते रहे जो
उनके लिए ब्रेड और दूध,
तोर्तिला और अण्डे,
वे जिन्होंने उनके कपडे सिले,
वे जिन्होंने उनकी गाड़ी चलाई,
जिन लोगों ने देख-भाल की
उनके कुत्तों और बागवानी की
और खटते रहे उनकी खातिर,
और वे लोग पूछेंगे-
“क्या किया तुमने जब गरीब लोग
दुःख भोग रहे थे, 
जब उनकी कोमलता
और जीवन जल रहा था
भीतर-भीतर?”   

मेरे मधुर देश के
अराजनीतिक बुद्धिजीवीयो,
तुम कोई जवाब नहीं दे पाओगे.
चुप्पी का गिद्ध
तुम्हारी आँतों को चबायेगा,
तुम्हारी अपनी दुर्गति
कचोटेगी तुम्हारी आत्मा.
और लाज के मारे
मौन रह जाओगे तुम. 

(अनुवाद- दिगम्बर)

Monday, December 17, 2012

गाजा के बारे में ख़ामोशी – महमूद दरवेश



(अगर गद्य कवियों के लिए कसौटी है तो फिलीस्तीनी शायर महमूद दरवेश इस पर पूरी तरह खरे उतरते हैं. गाजा पर इजरायली हमले के समय 2007 में लिखी गयी उनकी  इस रचना का अंग्रेजी अनुवाद सिनान अन्तून ने की थी. हिंदी अनुवाद  उसी पर आधारित है.)

गाजा अपने रिश्तेदारों से बहुत दूर और दुश्मनों के करीब है, क्योंकि जब कभी धमाका करता है गाजा, तो यह एक टापू में तब्दील हो जाता है और कभी यह धमाका करना बंद नहीं करता. इसने दुश्मन के चेहरे को खरोंचा, उसके मंसूबों को ध्वस्त किया और वक्त के साथ उसके इत्मीनान को रोक दिया.
क्योंकि गाजा में वक्त कुछ अलग ही चीज है.
क्योंकि गाजा में गैरतरफ़दार नहीं है वक्त का मिजाज.
यह लोगों को अपने इरादे ठंडा करने पर मजबूर नहीं करता, बल्कि धमाका करने और हकीकत से टकराने की सीख देता है.
वक्त यहाँ बच्चों को बचपन से बुढापे की ओर नहीं ले जाता, बल्कि दुश्मन से पहली झड़प के साथ ही उन्हें इन्सान बना देता है.
गाजा में वक्त आराम नहीं, बल्कि तपती दोपहर की आंधी है. क्योंकि गाजा के उसूल बिलकुल अलग हैं, बिलकुल अलग.
जो दूसरे के कब्जे में हो, उसका वसूल सिर्फ यही होता है कि किस हद तक वह कब्जे का विरोध करता है. सिर्फ यही एक मुकाबला है वहाँ. गाजा इस जालिम और शानदार उसूल को जानने-समझने का आदी हो गया है. वह इसे किताबों से, उतावले स्कूली सेमिनारों से, धुआँधार प्रचार करते भोंपुओं से या गानों से नहीं सीखता. वह महज तजुर्बे और कार्रवाई से सीखता है इसे, जो इस्तहार और दिखावे के लिए नहीं किया जाता.
गाजा का गला नहीं है. इसकी सुराखें हैं जो बोलती हैं पसीने, खून और आग की जुबान. इसीलिए दुश्मन इससे मौत की हद तक नफ़रत करता है और जुर्म की हद तक डरता है. और इसीलिए इसके रिश्तेदार और दोस्त शरमाते हुए इससे प्यार करते हैं जो समय-समय पर जलन और खौफ की वजह बन जाता है, क्योंकि गाजा अपने दुश्मनों और दोस्तों, दोनों के लिए एक ही साथ जालिमाना सबक और चमकदार मिशाल है.
गाजा कोई बेहद खूबसूरत शहर नहीं है.
इसके समुद्री किनारे अरबी शहरों के किनारों से ज्यादा नीले नहीं हैं.
इसके संतरे भूमध्य सागर के पूर्वी छोर के निहायत खूबसूरत संतरों जैसे नहीं हैं.
गाजा सबसे अमीर शहर नहीं है.
यह सबसे खूबसूरत और सबसे बड़ी जगह नहीं है, मगर एक भरे-पूरे वतन की तारीख़ के बराबर है, क्योंकि दुश्मन की निगाह में यह कहीं ज्यादा बदसूरत, कंगाल, दुखी और शातिर है. क्योंकि दुश्मन के मिजाज और सकून को परेशान करने में हम सब में इसे ही सबसे ज्यादा महारत हासिल है. क्योंकि उसके लिए यह एक खौफनाक ख्वाब है. क्योंकि यह बारूदी संतरा है, बिन बचपन के बच्चे, बिन बुढ़ापा के बूढ़े और बगैर ख्वाहिश की औरतें. इन्हीं चीजों के चलते यह हम सब में सबसे खूबसूरत, पाक और अमीर है और सबसे ज्यादा प्यार के काबिल है.
हम गाजा के साथ नाइंसाफी करते हैं जब हम इसकी नज्मों की तलाश करते हैं, इसलिए हमें गाजा की खूबसूरती को बिगाडना नहीं चाहिए. इसमें जो सबसे सुन्दर है वह ये कि ऐसे वक्त यह शायरी से महरूम है जब हमने कोशिश की कि दुश्मन पर शायरी के जरिये जीत हासिल करें, और इस तरह हमने खुद पर भरोसा किया और बहुत खुश थे कि दुश्मन हमें गाने दे रहा है. हमने उसे जीतने दिया, और फिर गाते-गाते जब हमारे होंठ खुश्क हो गये, तब हमने देखा कि दुश्मन ने शहरों, किलों और सड़कों की तामीर पूरी कर ली. हमने गाजा के साथ नाइंसाफी की जब हमने इसे मिथ में तब्दील कर दिया, क्योंकि हम इस बात से नफरत करेंगे जब हम पायेंगे कि यह एक छोटे से गरीब शहर के सिवा कुछ भी नहीं जो कब्ज़े की मुखालफत करता है.
हम नाइंसाफी करते हैं जब इस बात पर ताज्जुब करते हैं- वो क्या था जिसने इसे मिथ में बादल दिया? अगर हममें वकार होता तो हमने सारे शीशे चकनाचूर कर दिये होते और अगर खुद के खिलाफ बगावत करने से इनकार करते तो इस बात पर रोते और लानत भेजते. हम गाज़ा के साथ नाइंसाफी करते हैं जब इसे आसमान पर चढाते हैं, क्योंकि इसका जादुई असर हमें इंतज़ार के आखिरी छोर तक ले जायेगा और गाजा कभी हमारे हाथ नहीं आएगा. गाजा हमें आजाद नहीं करता. गाजा के पास घोड़े, हवाईजहाज और जादू की छड़ी नहीं हैं, राजधानियों में दफ्तर नहीं हैं. गाजा हमारी खूबियों से खुद को आजाद करता है और साथ ही हमारी जुबान को गजाओं से आज़ाद करता है. जब ख्वाबों में हमारी मुलाकात इसके साथ हो तो शायद यह हमें पहचान भी न पाए, क्योंकि गाजा का जन्म आग से हुआ था, जबकि हम लावारिस छोड़ दिये गये मकानों में इंतजार करते और रोते-बिलखते पैदा हुए थे.
ये सच है कि गाजा के अपने खास हालात और इसकी अपनी इंकलाबी रवायतें हैं. लेकिन इसका राज कोई गडबडझाला नहीं- कब्जे के मुखालफत की इसकी लड़ाई आमफहम है और आपस में मजबूती से जुड़ी हुई है और इसे पता है कि उसे क्या चाहिए (यह दुश्मन को अपनी सरहद के बाहर खदेड़ना चाहता है). कब्जे की मुखालफत की लड़ाई और आम अवाम के बीच का रिश्ता वैसा ही है जैसे चमड़े और हड्डी के बीच, न कि उस्ताद और शागिर्द के बीच.  गाजा में मुखालफत की लड़ाई किसी पेशे में या संस्था में नहीं बदली है.
इसे किसी का दुमछल्ला बनना काबूल नहीं और अपनी किस्मत किसी के दस्तखत या मुहर के साथ टांकना भी मंजूर नहीं.
यह इस बात की भी परवाह नहीं करता कि हम इसके नाम, तस्वीर या वाक्पटुता से वाकिफ हैं या नहीं. यह नहीं मानता कि यह मीडिया के लिए कोई मसाला है. यह कैमरे के लिए तैयारी नहीं करता और न ही अपने चेहरे पर मुस्कराहट थोपता है.
इन सब की न तो इसे ख्वाहिश है, न हमलोगों को.
इसीलिए तो सौदागरों की निगाह में गाजा एक खराब कारोबार है और इसीलिए अरबों की निगाह में एक लाजवाब नैतिक खजाना.
गाजा की खूबसूरती यह है कि हमारी आवाज इस तक नहीं पहुँचती. कोई चीज इसे टस से मस नहीं करती; कोई चीज इसकी मुट्ठी को दुश्मन के चेहरे से इधर-उधर नहीं कर पाती. हम चाँद के पूरब की ओर या मंगल की खोज हो जाने पर उसके पश्चिम की ओर फिलीस्तीनी रियासत का ढाँचा खड़ा नहीं करेंगे. गाजा नामंजूरी के लिए हरदम तैयार है....भूख और नामंजूरी, प्यास और नामंजूरी, बेदखली और नामंजूरी, अत्याचार और नामंजूरी, घेराबंदी और नामंजूरी, मौत और नामंजूरी.
हो सकता है कि दुश्मन गाजा पर जीत हासिल कर ले (तूफानी समुन्दर एक छोटी सी टापू पर जीत हासिल कर सकता है... वे इसके सारे दरख्तों को काट कर गिरा सकते हैं).
वे इसकी हड्डियां तोड़ सकते हैं.
वे इसके बच्चों और औरतों के भीतर टैंक घुसा सकते हैं. वे इसे समन्दर, रेत या लहू में डुबो सकते हैं.
लेकिन यह झूठ को नहीं दुहरायेगा और हमलावरों के आगे “हाँ” नहीं कहेगा.
यह लगातार धमाका करता रहेगा.
यह मौत नहीं, न ही यह ख़ुदकुशी है. यह गाजा का अपना खास अंदाज है इस बात के ऐलान का कि उसे जीने का हक है. यह लगातार धमाका करता रहेगा.