Saturday, April 25, 2009

रघुवीर सहाय की ये कविता वर्तमान दौर पर एक करारा व्यंग है -

आप की हँसी
निर्धन जनता का शोषण है
कह - कर आप हँसे
लोकतंत्र का अन्तिम क्षण है
कह - कर आप हँसे
सब के सब हैं भ्रस्टाचारी
कह - कर आप हँसे
चारो ओर बड़ी लाचारी
कह - कर आप हँसे
कितने आप सुरक्षित होंगे मै सोचने लगा
सहसा मुझे अकेला पाकर फ़िर से आप हँसे

Thursday, March 12, 2009

शील जी की कविता - मध्यम वर्ग

खाते-पीते दहशत जीते , घुटते-पिटते बीच के लोग,
वर्ण धर्म पटखनी लगाता, माहुर गाते बीच के लोग,
घर में घर की तंगी नंगी, भ्रम में भटके बीच के लोग,
लोभ-लाभ की माया लादे , झटके खाते बीच के लोग,
घना समस्याओं का जंगल, कीर्तन गाते बीच के लोग,
नीचे श्रमिक विलासी ऊपर, बीच में लटके बीच के लोग.