Saturday, July 21, 2012

हिग्स बोसोन की खोज के बारे में कैसे समझाया जाय?

हिग्स मॉडल की व्याख्या करते प्रोफ़ेसर पिटर हिग्स - इस तरह नहीं समझाना है 

जिसे देखो वही ‘गौड पार्टिकिल’ के बारे में बतिया रहा है- लेकिन कोई आप से पूछ ले कि इसको खोल के समझाइये, तो? यह इस पर निर्भर है कि वह भौतिकी का शुरुआती छात्र है या कोई धार्मिक कट्टरपंथी. चाहें तो मेरे तजुर्बे को आजमा के देखें.
सर्न लैब में हिग्स बोसोन की संभावित खोज जाहिरा तौर पार इस ब्रह्माण्ड के बारे में हमारी समझदारी को बढ़ानेवाली है, लेकिन एक आम आदमी को, किसी बच्चे को या किसी बेवकूफ को हिग्स बोसोन के बारे में किस तरह समझाया जाय? काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आप किससे बात कर रहे हैं और वे क्या सुनना पसंद करते हैं. तो आजमाइए इस आसान नुस्खे को, जिसमें कुछ चुनिन्दा ब्योरे भी दिए गए हैं-
जिस शख्स पर आप अपना रोब जमाना चाहते हैं-
“हिग्स बोसोन आँखों से नहीं दिखनेवाला एक मूलभूत कण है जिसे पहली बार 1962 में इस बात की स्वीकृति मिली कि यह एक ऐसी क्रियाविधि का संभावित उपउत्पाद है जिसके जरिये एक कल्पित, सर्वब्यापी क्वांटम क्षेत्र- तथाकथित हिग्स क्षेत्र, प्राथमिक कणों को भार प्रदान करता है. और ठोस तरीके से कहा जाय तो कण भौतिकी के आदर्श मॉडल में, हिग्स बोसोन का अस्तित्व इस बात की व्याख्या करता है कि प्रकृति में विद्युत-दुर्बल समरूपता का स्वतः विखंडन कैसे होता है.”

परेशानहाल माँ-बाप के लिए जिन्हें नींद न आती हो-
अगर मान लें कि पदार्थ के घटक अंश चिपचिपे चहरेवाले बच्चे हैं, तो हिग्स क्षेत्र किसी विशाल शौपिंग मॉल में बच्चों के खेलनेवाली जगह में बना गेंद का गड्ढा है. प्लास्टिक का हरएक रंगीन गेंद एक हिग्स बोसोन है- ये सारे मिलकर उस फिसलन के लिए रूकावट का काम करते हैं जो आप के बच्चे, यानी इलेक्ट्रोन को ब्रह्माण्ड की उस तलहटी में गिर जाने से रोकते हैं, जहाँ ढेर सारे सांप और चमड़ी में चुभनेवाली सुइयाँ हैं.

अंग्रेजी पढने वाले इंटर के छात्रों के लिए-
“हिग्स बोसोन (सही उच्चारण “बोट्सवेन”) एक प्रकार का उप-परमाणविक विराम चिन्ह है जिसका वजन अमूमन अर्ध-विराम और अल्प-विराम के बीच का होता है. इसके बिना ब्रह्माण्ड एक अर्थहीन बडबडाहट बन कर रह जायेगा- अगर आपने पढ़ी हो तो कुछ-कुछ दा विन्सी कोड जैसा.”
     
एक किशोर के लिए जो भौतिकी की शुरुआती कक्षा में पढता हो-
“नहीं, मुझे पता है कि यह परमाणु नहीं है. मैंने कब कहा था कि यह परमाणु है. बिलकुल, मेरा अभिप्राय कण से है. हाँ, मुझे पता है कि विद्युतचुम्बकत्व क्या होता है, बहुत बहुत धन्यवाद- एकीकृत बल, आइंस्टीन, बक बक बक, बेहिसाब भार, इत्यादि इत्यादि, क्वार्क, हिग्स बोसोन, अब बस. बहुत समय हो गया, और मैं थक भी गया. चैनल बदलो, कोई अच्छा सीरियल देखते हैं.”

टैक्स घटाओ आन्दोलन के सदस्यों के लिए-
“यह खोज एक विराट, अभूतपूर्व, लगभग असीम बर्बादी है पैसे की.”

मोटर गाड़ी की पिछली सीट पार बैठे एक बच्चे के लिए-
“यह एक कण है जिसे कुछ वैज्ञानिक ढूँढ रहे थे. क्योंकि उन्हें पता था कि इसके बिना ब्रह्माण्ड संभव नहीं होगा. क्योंकि इसके बिना, ब्रह्माण्ड के दूसरे कणों भर ही नहीं होगा. क्योंकि तब वे सभी कण फोटोन की तरह ही प्रकाश के वेग से चलते रहेंगे. क्योंकि मैंने कहा नहीं कि वे चलते रहेंगे, और अगर तुमने फिर पूछा कि ‘क्यों?’ तो हमलोग इन बातों के चक्कर में उस मिठाई की दुकान से फिर आगे निकल जायेंगे.”

धार्मिक कट्टरपंथियों के लिए-
“हिग्स बोसोन कुछ नहीं होता.”

(नोट- लेखक अगर भारत के हालात से वाकिफ होते तो इस में यहाँ के अखबारवालों, टीवी चैनलवालों, भारतीय संस्कृति के स्वघोषित रक्षकों, अतीत-व्याकुल – वेद-व्याकुल जनों के लिए भी कुछ  नुस्खे जरूर सुझाते.) 



(गार्जियन में प्रकाशित रचना का आभार सहित अनुवाद.)

Friday, July 20, 2012

देश में बच्चों के कुपोषण और मौत की भयावह तस्वीर

हाल ही में हंगर एंड मालन्युट्रिशननाम से एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है जिसमें बताया गया है कि हर साल लगभग १६ लाख बच्चे जन्म के कुछ ही समय बाद मर जाते हैं. दो साल से कम उम्र के पचास फीसदी बच्चे कुपोषित हैं.

छह राज्यों के बच्चों का सर्वे करके नन्दी फाउंडेशन द्वारा तैयार की गयी इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में छह वर्ष से कम आयु के 42 प्रतिशत बच्चों का वजन सामान्य से कम होता है और 50 प्रतिशत बच्चे गंभीर बीमारियों का शिकार होते हैं. समस्या की गंभीरता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत के आठ राज्यों में जितने बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, उतने अफ्रीका और सहारा उपमहाद्वीप के ग़रीब से ग़रीब देशों में भी नहीं हैं.

देश के संपन्न राज्यों में से एक, महाराष्ट्र में जनवरी 2012 में दस लाख 67 हजार 659 बच्चे कुपोषित थे और मई 2012 तक इनमें से 24 हजार 365 बच्चों की मौत हो गयी थी.

रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के नंदूरबार जिले में पिछले साल 49 हजार, नासिक में एक लाख, मेलघाट में चालीस हजार, औरंगाबाद में 53 हजार, पुणे जैसे सम्पन्न शहर में 61 हजार और मराठवाड़ा में 24 हजार बच्चे कुपोषण के शिकार हुए.

मुंबई के अस्पतालों में हर रोज 100 से ज्यादा कुपोषण के शिकार बच्चे भर्ती हो रहे हैं, जिनमें से 40 फीसदी की मौत हो जाती है. सिर्फ मुंबई में ही साल भर में 48 हजार बच्चे कुपोषण का शिकार हुए हैं.

समूचे महाराष्ट्र की स्थिति यह है कि जनवरी 2012 में दस लाख 67 हजार 659 बच्चे कुपोषण का शिकार थे और मई 2012 तक इनमें से 24 हजार 365 बच्चों की मौत हो गयी थी.



भूख और कुपोषण संबंधी एक रिपोर्ट जारी करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले साल कुपोषण की समस्या को देश के लिए शर्मनाक बताया था. घडियाली आँसू बहाए जाने के एक साल बाद जारी इस रिपोर्ट के आँकड़े, दिनों दिन बदतर होते हालात की ओर इशारा करते हैं.



इन दिल दहला देने वाली सच्चाइयों का हमारे देश के निर्मम शासकों पर कोई असर नहीं होता. विकास के जिस अमानुषिक रास्ते पर वे देश को घसीट रहे हैं, उसमें यहाँ की हालात सोमालिया से भी बदतर होना तय है. इसी भयावह सम्भावना की एक झलक इस रिपोर्ट में दिखती है.