Monday, December 17, 2012

गाजा के बारे में ख़ामोशी – महमूद दरवेश



(अगर गद्य कवियों के लिए कसौटी है तो फिलीस्तीनी शायर महमूद दरवेश इस पर पूरी तरह खरे उतरते हैं. गाजा पर इजरायली हमले के समय 2007 में लिखी गयी उनकी  इस रचना का अंग्रेजी अनुवाद सिनान अन्तून ने की थी. हिंदी अनुवाद  उसी पर आधारित है.)

गाजा अपने रिश्तेदारों से बहुत दूर और दुश्मनों के करीब है, क्योंकि जब कभी धमाका करता है गाजा, तो यह एक टापू में तब्दील हो जाता है और कभी यह धमाका करना बंद नहीं करता. इसने दुश्मन के चेहरे को खरोंचा, उसके मंसूबों को ध्वस्त किया और वक्त के साथ उसके इत्मीनान को रोक दिया.
क्योंकि गाजा में वक्त कुछ अलग ही चीज है.
क्योंकि गाजा में गैरतरफ़दार नहीं है वक्त का मिजाज.
यह लोगों को अपने इरादे ठंडा करने पर मजबूर नहीं करता, बल्कि धमाका करने और हकीकत से टकराने की सीख देता है.
वक्त यहाँ बच्चों को बचपन से बुढापे की ओर नहीं ले जाता, बल्कि दुश्मन से पहली झड़प के साथ ही उन्हें इन्सान बना देता है.
गाजा में वक्त आराम नहीं, बल्कि तपती दोपहर की आंधी है. क्योंकि गाजा के उसूल बिलकुल अलग हैं, बिलकुल अलग.
जो दूसरे के कब्जे में हो, उसका वसूल सिर्फ यही होता है कि किस हद तक वह कब्जे का विरोध करता है. सिर्फ यही एक मुकाबला है वहाँ. गाजा इस जालिम और शानदार उसूल को जानने-समझने का आदी हो गया है. वह इसे किताबों से, उतावले स्कूली सेमिनारों से, धुआँधार प्रचार करते भोंपुओं से या गानों से नहीं सीखता. वह महज तजुर्बे और कार्रवाई से सीखता है इसे, जो इस्तहार और दिखावे के लिए नहीं किया जाता.
गाजा का गला नहीं है. इसकी सुराखें हैं जो बोलती हैं पसीने, खून और आग की जुबान. इसीलिए दुश्मन इससे मौत की हद तक नफ़रत करता है और जुर्म की हद तक डरता है. और इसीलिए इसके रिश्तेदार और दोस्त शरमाते हुए इससे प्यार करते हैं जो समय-समय पर जलन और खौफ की वजह बन जाता है, क्योंकि गाजा अपने दुश्मनों और दोस्तों, दोनों के लिए एक ही साथ जालिमाना सबक और चमकदार मिशाल है.
गाजा कोई बेहद खूबसूरत शहर नहीं है.
इसके समुद्री किनारे अरबी शहरों के किनारों से ज्यादा नीले नहीं हैं.
इसके संतरे भूमध्य सागर के पूर्वी छोर के निहायत खूबसूरत संतरों जैसे नहीं हैं.
गाजा सबसे अमीर शहर नहीं है.
यह सबसे खूबसूरत और सबसे बड़ी जगह नहीं है, मगर एक भरे-पूरे वतन की तारीख़ के बराबर है, क्योंकि दुश्मन की निगाह में यह कहीं ज्यादा बदसूरत, कंगाल, दुखी और शातिर है. क्योंकि दुश्मन के मिजाज और सकून को परेशान करने में हम सब में इसे ही सबसे ज्यादा महारत हासिल है. क्योंकि उसके लिए यह एक खौफनाक ख्वाब है. क्योंकि यह बारूदी संतरा है, बिन बचपन के बच्चे, बिन बुढ़ापा के बूढ़े और बगैर ख्वाहिश की औरतें. इन्हीं चीजों के चलते यह हम सब में सबसे खूबसूरत, पाक और अमीर है और सबसे ज्यादा प्यार के काबिल है.
हम गाजा के साथ नाइंसाफी करते हैं जब हम इसकी नज्मों की तलाश करते हैं, इसलिए हमें गाजा की खूबसूरती को बिगाडना नहीं चाहिए. इसमें जो सबसे सुन्दर है वह ये कि ऐसे वक्त यह शायरी से महरूम है जब हमने कोशिश की कि दुश्मन पर शायरी के जरिये जीत हासिल करें, और इस तरह हमने खुद पर भरोसा किया और बहुत खुश थे कि दुश्मन हमें गाने दे रहा है. हमने उसे जीतने दिया, और फिर गाते-गाते जब हमारे होंठ खुश्क हो गये, तब हमने देखा कि दुश्मन ने शहरों, किलों और सड़कों की तामीर पूरी कर ली. हमने गाजा के साथ नाइंसाफी की जब हमने इसे मिथ में तब्दील कर दिया, क्योंकि हम इस बात से नफरत करेंगे जब हम पायेंगे कि यह एक छोटे से गरीब शहर के सिवा कुछ भी नहीं जो कब्ज़े की मुखालफत करता है.
हम नाइंसाफी करते हैं जब इस बात पर ताज्जुब करते हैं- वो क्या था जिसने इसे मिथ में बादल दिया? अगर हममें वकार होता तो हमने सारे शीशे चकनाचूर कर दिये होते और अगर खुद के खिलाफ बगावत करने से इनकार करते तो इस बात पर रोते और लानत भेजते. हम गाज़ा के साथ नाइंसाफी करते हैं जब इसे आसमान पर चढाते हैं, क्योंकि इसका जादुई असर हमें इंतज़ार के आखिरी छोर तक ले जायेगा और गाजा कभी हमारे हाथ नहीं आएगा. गाजा हमें आजाद नहीं करता. गाजा के पास घोड़े, हवाईजहाज और जादू की छड़ी नहीं हैं, राजधानियों में दफ्तर नहीं हैं. गाजा हमारी खूबियों से खुद को आजाद करता है और साथ ही हमारी जुबान को गजाओं से आज़ाद करता है. जब ख्वाबों में हमारी मुलाकात इसके साथ हो तो शायद यह हमें पहचान भी न पाए, क्योंकि गाजा का जन्म आग से हुआ था, जबकि हम लावारिस छोड़ दिये गये मकानों में इंतजार करते और रोते-बिलखते पैदा हुए थे.
ये सच है कि गाजा के अपने खास हालात और इसकी अपनी इंकलाबी रवायतें हैं. लेकिन इसका राज कोई गडबडझाला नहीं- कब्जे के मुखालफत की इसकी लड़ाई आमफहम है और आपस में मजबूती से जुड़ी हुई है और इसे पता है कि उसे क्या चाहिए (यह दुश्मन को अपनी सरहद के बाहर खदेड़ना चाहता है). कब्जे की मुखालफत की लड़ाई और आम अवाम के बीच का रिश्ता वैसा ही है जैसे चमड़े और हड्डी के बीच, न कि उस्ताद और शागिर्द के बीच.  गाजा में मुखालफत की लड़ाई किसी पेशे में या संस्था में नहीं बदली है.
इसे किसी का दुमछल्ला बनना काबूल नहीं और अपनी किस्मत किसी के दस्तखत या मुहर के साथ टांकना भी मंजूर नहीं.
यह इस बात की भी परवाह नहीं करता कि हम इसके नाम, तस्वीर या वाक्पटुता से वाकिफ हैं या नहीं. यह नहीं मानता कि यह मीडिया के लिए कोई मसाला है. यह कैमरे के लिए तैयारी नहीं करता और न ही अपने चेहरे पर मुस्कराहट थोपता है.
इन सब की न तो इसे ख्वाहिश है, न हमलोगों को.
इसीलिए तो सौदागरों की निगाह में गाजा एक खराब कारोबार है और इसीलिए अरबों की निगाह में एक लाजवाब नैतिक खजाना.
गाजा की खूबसूरती यह है कि हमारी आवाज इस तक नहीं पहुँचती. कोई चीज इसे टस से मस नहीं करती; कोई चीज इसकी मुट्ठी को दुश्मन के चेहरे से इधर-उधर नहीं कर पाती. हम चाँद के पूरब की ओर या मंगल की खोज हो जाने पर उसके पश्चिम की ओर फिलीस्तीनी रियासत का ढाँचा खड़ा नहीं करेंगे. गाजा नामंजूरी के लिए हरदम तैयार है....भूख और नामंजूरी, प्यास और नामंजूरी, बेदखली और नामंजूरी, अत्याचार और नामंजूरी, घेराबंदी और नामंजूरी, मौत और नामंजूरी.
हो सकता है कि दुश्मन गाजा पर जीत हासिल कर ले (तूफानी समुन्दर एक छोटी सी टापू पर जीत हासिल कर सकता है... वे इसके सारे दरख्तों को काट कर गिरा सकते हैं).
वे इसकी हड्डियां तोड़ सकते हैं.
वे इसके बच्चों और औरतों के भीतर टैंक घुसा सकते हैं. वे इसे समन्दर, रेत या लहू में डुबो सकते हैं.
लेकिन यह झूठ को नहीं दुहरायेगा और हमलावरों के आगे “हाँ” नहीं कहेगा.
यह लगातार धमाका करता रहेगा.
यह मौत नहीं, न ही यह ख़ुदकुशी है. यह गाजा का अपना खास अंदाज है इस बात के ऐलान का कि उसे जीने का हक है. यह लगातार धमाका करता रहेगा.

Tuesday, December 4, 2012

धरती : एक वर्जित ग्रह



-जोर्ज मोनबियट
मानवता के सबसे बड़े संकट के साथ-साथ एक ऐसी विचारधारा का भी उदय हुआ, जो उस संकट के समाधान को असंभव बना देती है. 1980 के दशक के उत्तरार्ध में, जब यह साफ़ हो गया कि मानव निर्मित जलवायु परिवर्तन ने इस जानदार ग्रह और इसके निवासियों को खतरे में डाल दिया है, उसी समय दुनिया एक अतिवादी राजनीतिक सिद्धांत की गिरफ्त में आ गयी, जिसके जड़सूत्र ऐसे किसी भी हस्तक्षेप का निषेध करते हैं जो इस संकट से निजात पाने के लिए जरूरी हैं.
नवउदारवाद, जो बाजार-कट्टरपन्थ या मुक्त-बाजार अर्थव्यवस्था के नाम से भी जाना जाता है, इसका अभिप्राय बाजार को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना है. इसका जोर इस बात पर है कि राज्य को बाजार की हिफाजत करने, निजी सम्पत्ति की रक्षा करने और व्यापार के रास्ते की बाधाएँ हटाने के अलावा और कुछ नहीं करना चाहिए. व्यवहार में यह चीज देखने को नहीं मिलती. नवउदारवादी सिद्धांतकार जिसे सिकुड़ना कहते हैं, वह लोकतंत्र के सिकुड़ने जैसा दिखता है- नागरिक जिन साधनों से अभिजात वर्ग की सत्ता पर अंकुश रख सकते हैं, उन्हें कम करते  जाना. जिसे वे “बाजार” कहते हैं, वह वास्तव में बहुराष्ट्रीय निगमों और चरम-धनवानों का स्वार्थ ही दिखाई देता है. लगता है, जैसे नवउदारवाद केवल अल्पतन्त्र को उचित ठहराने का साधन मात्र हो.
इस सिद्धांत को पहलेपहल 1973 में चिली पर आजमाया गया था. शिकागो विश्वविद्यालय के एक पुराने विद्यार्थी ने जो मिल्टन फ्रीडमैन के अतिवादी नुस्खों में दीक्षित हुए थे, सीआइए के पैसे से जेनरल पिनोचे के साथ मिल कर वहाँ इस सिद्धांत को जबरन लागू करवाया, जिसको किसी लोकतान्त्रिक देश में थोपना असंभव होता. इसका नतीजा एक ऐसी आर्थिक तबाही के रूप में सामने आया जिसमें धनी वर्ग, जिसने चिली के उद्योगों के निजीकरण के बाद उनका मालिकाना हथिया लिया था और वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया था, लगातार समृद्ध होता गया.
इस पंथ को मारग्रेट थैचर और रोनाल्ड रीगन ने अपना लिया. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोश और विश्व बैंक ने इसे गरीब देशों पर जबरदस्ती थोपा. जब 1988 में जेम्स हानसेन ने अमरीकी सीनेट में पहली बार धरती के तापमान में भावी बढ़ोतरी के बारे में अपना विस्तृत माडल प्रस्तुत किया, तब इस सिद्धांत को पूरी दुनिया में लागू करवाया जा रहा था.
जैसा कि हमने 2007 और 2008 में देखा (जब नवउदारवादी सरकारों को बाध्य किया जा रहा था कि वे बैंकों को उबारने से सम्बंधित अपनी नीति को त्यागें), तब किसी तरह के संकट का सामना करने की इतनी खराब परिस्थिति इससे पहले शायद ही कभी रही हो. जब कोई विकल्प न रह जाय तबतक, संकट चाहे जितना ही तीक्ष्ण हो और उसके परिणाम चाहे जितने भी गम्भीर क्यों न हों, आत्म-घृणाशील राजसत्ता दखल नहीं देगा. लेकिन नवउदारवाद सभी तरह की मुसीबतों से अभिजात वर्ग की हिफाजत करता है.
विश्व बैंक, अंतरार्ष्ट्रीय ऊर्जा एजेन्सी और प्राइसवाटरहाउसकूपर जैसे हरित अतिवादियों ने इस शताब्दी के लिए चार डिग्री, पांच डिग्री और छः डिग्री ग्लोबल वार्मिंग का जो पूर्वानुमान लगाया है, उसके चलते होनेवाले पर्यावरण विनाश से बचने का मतलब होगा- तेल, गैस और कोयला उद्योग से सीधे टक्कर लेना. इसका मतलब है उद्योगों पर इस बात के लिए दबाव डालना कि वे अपने अस्सी फीसदी से भी अधिक खनिज तेल भंडार का त्याग करें, जिसे जलाए जाने से होने वाला नुकसान हमारे बर्दास्त से बाहर है. इसका मतलब है नए तेल भंडारों का पता लगाने और उन्हें विकसित करने कि कार्रवाइयों को रद्द करना, क्योंकि जब हम पहले वाले भण्डार का ही इस्तेमाल नहीं कर सकते, तो नया खोजने से क्या फायदा? और इसका मतलब होगा ऐसे किसी भी नए संरचनागत ढाँचे के निर्माण (जैसे- हवाई अड्डे) पर रोक लगाना, जिसे बिना तेल के चलाना ही सम्भव न हो.
लेकिन आत्म-घृणाशील राजसत्ता कोई कार्रवाई कर ही नहीं सकती. जिन स्वार्थों से लोकतंत्र को बचना चाहिए, उनकी गिरफ्त में होने के चलते वे केवल बीच सड़क पर बैठे, कान खोदते और मूँछ ऐंठते रहेंगे, जबकि धड़धड़ करता ट्रक उनकी ओर आता जायेगा. टकराहट वर्जित है, कार्रवाई करना प्राणघातक पाप है. आप चाहें तो कुछ पैसे वैकल्पिक ऊर्जा पर बिखेर सकते हैं, लेकिन पुराने कानूनों की जगह कोई नया कानून नहीं बना सकते.
बराक ओबामा वे उस नीति को आगे बढ़ाते हैं जिसे वे “सबसे श्रेष्ठ” बताते हैं- हवा, सौर, तेल और गैस को प्रोत्साहन देना. ब्रिटिश जलवायु परिवर्तन सचिव, एड डेवी पिछले हफ्ते सामान्य सदन में ऊर्जा बिल पेश करते हैं, जिसका उद्देश्य ऊर्जा आपूर्ति को कार्बन रहित बनाना है. उसी बहस के दौरान वे वादा करते हैं कि वे उत्तरी सागर और दूसरे विदेशी तेल कुओं में तेल और गैस के उत्पादन की “क्षमता को बढ़ाएंगे.”
लोर्ड स्टर्न ने जलवायु परिवर्तन को परिभाषित करते हुए कह था कि यह “यह बाजार व्यवस्था की ऐसी विराटतम और व्यापक दायरे वाली असफलता है, जो पहले कभी देखने में नहीं आई थी.” जून में बेमतलब का पृथ्वी सम्मेलन, दोहा में आजकल जिस पर बहस हो रही है वे बोदे उपाय, ऊर्जा बिल और ब्रिटेन में पिछले हफ्ते जारी बीजली की माँग घटाने से सम्बंधित परचा (बेहतर होता कि ये सारे उपाय समस्या की गंभीरता के मद्देनजर इतने गये-गुजरे न होते), ये सब कुछ बाजार कट्टरपंथ की विराटतम और व्यापकतम असफलता को बेनकाब करते हैं- यह हमारे अस्तित्व से जुड़ी इस समस्या को हल करने में इस व्यवस्था की अक्षमता को दर्शाता है.
हजार वर्षों की विरासत में मिला मौजूदा कार्बन उत्सर्जन ही मानव सभ्यता से मिलतीजुलती किसी भी चीज को चकनाचूर कर देने के लिए काफी है. जटिल समाजों ने समय-समय पर साम्राज्यों के उत्थान-पतन, प्लेग, युद्ध और अकालों को  झेल लिया. वे छः डिग्री जलवायु परिवर्तन को नहीं झेलपाएंगे जिसे शहस्राब्दी तक जारी रहना है. 150 वर्षों के विस्फोटक उपभोग की एवज में, जिसके ज्यातर हिस्से का मानवता की भलाई से कोई लेना-देना नहीं रहा, हम प्राकृतिक विश्व और उस पर निर्भर मानवीय व्यवस्था को खंड-खंड बिखेर रहे हैं.
दोहा जलवायु शिखर (या तलहटी) वार्ता तथा नए उपायों के बारे ब्रिटिश सरकार की चीख-पुकार से यह थाह लग जाता है कि मौजूदा राजनीतिक कार्रवाइयों की कितनी सीमाएं हैं. आप आगे बढ़े नहीं कि सत्ता के साथ आपकी प्रतिज्ञा भंग हुई, दोनों तरह की प्रतिज्ञाएं- चाहे वह परदे के पीछे की गयी हो या नवउदारवादी पंथ द्वारा उसे मान्यता मिली हो.       
नवउदारवाद इस समस्या की जड़ नहीं है – अक्सर इस विचारधारा का इस्तेमाल बेलगाम अभिजात वर्ग द्वारा दुनिया के पैमाने पर सत्ता, सार्वजनिक सम्पत्तियों और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा ज़माने को उचित ठहराने के लिए किया जाता है. लेकिन इस समस्या का तब तक समाधान नहीं किया जा सकता जब तक एक प्रभावशाली राजनितिक विकल्प के जरिये इस सिद्धांत को चुनौती नहीं दी जाती.     
दूसरे शब्दों में जलवायु परिवर्तन- और वे तमाम संकट जो मानव तथा प्रकृति को अपने शिकंजे में जकड़े हुए हैं- उनके खिलाफ संघर्ष में तब तक  जीत हासिक नहीं  की जा सकती है जब तक एक  व्यापक राजनीतिक संघर्ष न छेडा जाय, धनिक तंत्र के खिलाफ व्यापक जनता कि जनवादी गोलबंदी न की जाय. मेरा मानना है कि इसकी शुरुआत उस वित्तीय व्यवस्था के खिलाफ सुधार अभियान के जरिये होनी चाहिए जिसके माध्यम से बहुराष्ट्रीय निगम और धनाढ्य वर्ग राजनीतिक फैसलों और नेताओं की खरीद-फरोख्त करते हैं. अगले कुछ हफ़्तों के भीतर ही हमारे साथियों में से कुछ लोग ब्रिटेन में एक याचिका दायर करके इस मुहीम की शुरुआत करेंगे. मुझे यकीन है कि आप उस पर जरुर हस्ताक्षर करेंगे.          
लेकिन यह तो एक विनम्र शुरुआत भर होगी. निश्चय ही हमें एक नयी राजनीति की रूपरेखा तैयार करनी होगी- जो जन हस्तक्षेप को न्यायसंगत मानती हो, जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों  द्वारा बाजार को मुक्त कराने के घिनौने मकसद से कहीं ज्यादा महान उद्देश्य अन्तर्निहित हो, जो मुठी-भर उद्योगों को को खास तरजीह देकर उन्हें बचने के बजाय, आम जनता और इस सजीव संसार के अस्तित्व को ज्यादा अहमियत देती हो. दूसरे शब्दों में, एक ऐसी राजनीति जो हमारी अपनी हो, न कि मुट्ठी भर चरम अमीर तबके के लिए.
(4 दिसम्बर को गार्जियन में प्रकाशित लेख का आभार सहित प्रस्तुति. अनुवाद – दिगम्बर)
इस लेख में दिये गये पाद-टिप्पणियों का अनुवाद नहीं किया गया है. जिन पाठकों की रूचि हो, वे कृपया मूल अंग्रेजी पाठ देख लें, जिसका लिंक नीचे दिया गया है.