Tuesday, November 27, 2012

दुनिया का ‘सबसे गरीब’ राष्ट्रपति : जोसे मुजिका



जोसे मुजिका का खेत में बना मकान, उनकी पत्नी और कुत्ता (फोटो- बीबीसी)
-व्लादिमीर हर्नान्डेज



यह एक आम शिकायत है कि राजनीतिज्ञों की जीवनशैली उन लोगों से बिलकुल अलहदा होती है जो उन्हें चुनते हैं. लेकिन उरूग्वे में ऐसा नहीं है. यहाँ के राष्ट्रपति से मिलें– जो खेत में बने एक जर्जर मकान में रहते हैं और अपनी तनख्वाह का बड़ा हिस्सा दान कर देते हैं.

अपने कपड़े वे खुद ही धोकर घर के बाहर सूखाते हैं. पानी उनके अहाते में बने कुएँ से आता है, जहाँ घास-फूस फैली रहती है. सिर्फ दो पुलिस अधिकारी और एक तीन टांग वाला कुत्ता, मनुएला बाहर रखवाली करते हैं.

यह उरूग्वे के राष्ट्रपति, जोसे मुजिका का घर है जिनकी जीवनशैली दुनिया के दूसरे नेताओं से साफ तौर पर बिलकुल अलग है.

राष्ट्रपति मुजिका ने उस आरामदेह निवास को त्याग दिया जो उरूग्वे की सरकार अपने नेताओं को उपलब्ध कराती है और उन्होंने राजधानी के बाहर मोंटेवीडियो में, धूलभरी सड़क पर स्थित, अपनी पत्नी के खेत में बने घर में रहने का विकल्प चुना.

राष्ट्रपति और उनकी पत्नी जमीन पर खुद खेती करते हुए, फूल उगाते हैं.

इस सीधी-सरल जीवनशैली और इस तथ्य ने कि मुजिका अपनी मासिक तनख्वाह का 90 फीसदी, यानी लगभग 12,000 डॉलर, परोपकार के लिये दान कर देते हैं – मुजिका पर दुनिया के सबसे गरीब राष्ट्रपति होने का तमगा लगा दिया है.

बगीचे में एक पुरानी कुर्सी पर अपने प्यारे कुत्ते मनुएला को तकिये की तरह बगल में लिटाकर बैठे, वे कहते हैं, “मैंने अपना ज्यादातर जीवन इसी तरह जिया है.”

“मेरे पास जो कुछ है, उससे मैं अच्छी तरह जी सकता हूँ.”

उनकी तनख्वाह एक औसत उरूग्वेवासी की मासिक आय लगभग 775 डॉलर के बराबर है. 2010 में, उनकी घोषित वार्षिक आय– उरुग्वे में अधिकारियों के लिये इसकी घोषणा करना अनिवार्य है– 1800 डॉलर थी, जो उनकी 1887 मॉडल फ़ोल्क्सवेगन बीटल मोटर गाड़ी की कीमत है.

इस साल उन्होंने इस सम्पत्ति में अपनी पत्नी की आधी सम्पत्ति को भी शामिल कर लिया है, जिसमें जमीन, ट्रेक्टर्स और एक घर शामिल है. इसके कारण उनकी कुल सम्पत्ति बढ़कर 2,15,000 डॉलर हो गयी, जो अभी भी उप-राष्ट्रपति डनिलो एस्टोरी की घोषित सम्पति का सिर्फ दो-तिहाई, और मुजिका के पूर्ववर्ती राष्ट्रपति, तबारे वास्कुएज़ की सम्पत्ति से एक-तिहाई कम है.

2009 में निर्वाचित, मुजिका ने 1960 और 1970 के दशक उरूग्वे के टुपामारोस गुरिल्ला के सदस्य के रूप में बिताये. यह क्यूबा की क्रांति से प्रेरित एक वामपंथी सशस्त्र संगठन था. उन्हें छह बार गोली लगी और उन्होंने १४ साल जेल में बिताये. उनके कारावास का ज्यादातर समय कठोर परिस्थितियों और एकांतवास में गुजरा, जब १९८५ में उरूग्वे में जनतंत्र की बहाली हुयी और उन्हें आजाद कर दिया गया, तबतक.

मुजिका कहते है, जेल में बिताये गये उन वर्षों के दौरान ही उन्हें जीवन के प्रति अपना नजरिया गढ़ने में मदद मिली.

“मुझे ‘सबसे गरीब राष्ट्रपति’ कहा जाता है, परन्तु मैं गरीब महसूस नहीं करता. गरीब लोग वे हैं जो सिर्फ एक महंगी जीवनशैली को बनाये रखने के लिये काम करते हैं, और हमेशा पहले से ज्यादा हासिल करना चाहते हैं,” वह कहते हैं.

उनका मानना है कि “यह आज़ादी का मामला है. अगर आपके पास बहुत ज्यादा सम्पति नहीं है, तब आपको उसे बनाये रखने के लिये एक गुलाम की तरह सारी उम्र काम करने की जरुरत नहीं है और इस तरह आपके पास अपने लिये ज्यादा वक्त होता है.”

“मैं एक पागल और सनकी बूढ़ा आदमी लग सकता हूँ. लेकिन यह एक अपनी मर्जी से चुना गया विकल्प है.”

उरूग्वे के इस नेता ने इस साल जून में सम्पन्न, रियो+२० सम्मेलन में दिये गये अपने व्याख्यान में भी इसी तरह की बात रखी- “हम पूरी दोपहरी टिकाऊ विकास के बारे में बातें करते रहे. आम आदमी को गरीबी से उबारने के बारे में बातें करते रहे.

“लेकिन हम क्या सोच रहे हैं? क्या हम अमीर देशों के विकास और उपभोग के माडल को अपनाना चाहते हैं? अब मैं आपसे पूछता हूँ- इस ग्रह का क्या होगा अगर अमेरिकी महाद्वीप के हर मूलनिवासियों के घर में उसी अनुपात में कारें होंगी जितनी जर्मनी वालों के पास हैं? तब हमारे पास कितनी आक्सीजन शेष बचेगी?

“क्या इस ग्रह के पास इतने पर्याप्त संसाधन है कि सात या आठ अरब लोग उसी स्तर पर उपभोग और फिजूलखर्ची कर सकें, जैसा कि आज हम अमीर समाजों में देखते हैं? यह अत्याधिक-उपभोग का स्तर है जो हमारे ग्रह को हानि पहुँचा रहा है.”

मुजिका दुनिया के ज्यादातर नेताओं में “उपभोग के सहारे विकास हासिल करने के प्रति अंधा जूनून होने,” का इल्जाम लगाते हैं, “मानो इसका उल्टा हो, तो दुनिया का अन्त हो जायेगा.”

मुजिका अपने पूर्ववर्तियों की तरह एक विशाल आधिकारिक निवास में रह सकते थे. लेकिन शाकाहारी मुजिका और दूसरे नेताओं के बीच का अंतर भले ही कितना ज्यादा हो, वह अपने राजनैतिक जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव के मामले में उनसे ज्यादा सुरक्षित नहीं हैं.

इस संबंध में उरूग्वे के एक मतदान सर्वेक्षक इग्नासियो जुआस्नाबर कहते हैं- “क्योंकि जिस तरह वह रहते हैं उसकी वजह से बहुत से लोग राष्ट्रपति मुजिका से सहानुभूति रखते हैं. लेकिन इससे उनकी इस बात के लिए आलोचना रुक नहीं जाती कि उनकी सरकार कैसा काम कर रही है.” उरूग्वे के विपक्षी दल कहते हैं कि देश की हालिया आर्थिक सम्रद्धि के बावजूद स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में सार्वजनिक सेवाओं में बेहतर बदलाव नहीं आया है. शायद यही कारण है कि 2009 में चुनाव के बाद से पहली बार मुजिका की लोकप्रियता 50 फीसदी से भी नीचे गिर गयी है.

इस साल दो विवादित कार्यवाहियों के चलते उन्हें काफी आलोचना का सामना करना पड़ा. उरूग्वे की कांग्रेस ने हाल ही में एक बिल पास किया, जिसमे १२ हफ़्तों तक के भ्रूण का गर्भपात कराना क़ानूनी रूप से वैध बना दिया गया है. अपने पूर्ववर्तियों के विपरीत, मुजिको ने इसे वीटो नहीं किया.

ऐसा करने बजाय, उन्होंने अपनी पत्नी के मकान पर ही रुके रहने का विकल्प चुना.

वह भांग के उपभोग को क़ानूनी वैधता दिलाने की बहस का भी समर्थन कर रहे हैं, एक ऐसा बिल जो राष्ट्र को इसके व्यापार पर एकाधिकार भी दिला देगा.

“भांग का उपभोग सबसे ज्यादा चिंता की बात नहीं है, नशीली दवाओं का व्यापार वास्तविक समस्या है,” वह कहते हैं.

फिर भी, उन्हें अपनी लोकप्रियता की रेटिंग को लेकर ज्यादा चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है – उरूग्वे के कानून के मुताबिक वह 2014 में फिर से चुनाव नहीं लड़ सकते. और चूँकि वे 77 साल के हैं, इसलिए शायद वे उससे पहले ही रिटायर हो जायेंगे.

जब वह रिटायर होंगे, तब वह राष्ट्र से मिलने वाली पेंशन के अधिकारी होंगे– और दूसरे पूर्व राष्ट्रपतियों के विपरीत, उन्हें आय में होने वाली कमी का अभ्यस्त होने में ज्यादा परेशानी नहीं होगी.


टुपामारोस गुरिल्ला

· प्रारम्भ में गरीब गन्ना कामगारों और विद्यार्थियों को मिलाकर इस वामपंथी गुरिल्ला दल का गठन किया गया.

· इंका राजा टुपाक अमारू के नाम पर इसका नामकरण किया गया.

· राजनैति़क अपहरण इनकी मुख्य रणनीति थी– 1971 में ब्रिटेन के राजदूत जिओफ्री जैक्सन को आठ महीने तक कैद में रखा.

· 1973 में राष्ट्रपति जुआन मारिया बोरडाबेरी के तख्तापलट के बाद इसे कुचल दिया गया.

· मुजिका जेल जाने वाले कई विद्रोहियों में से एक थे, उन्होंने ने 14 साल सलाखों के पीछे बिताये – जब तक 1985 में संवैधानिक सरकार की वापसी हुयी.

· उन्होंने टुपामारोस को एक क़ानूनी राजनैतिक पार्टी में रूपांतरित करने में मुख्य भूमिका निभायी, जो फ्रंटे अम्प्लियो (व्यापक मोर्चे) गठबंधन में शामिल हो गया.


(बीबीसी न्यूज से साभार. अनुवाद- दिनेश पोसवाल)

नायपॉल को क्यों सम्मानित किया जा रहा है?


(लैंडमार्क लिटरेचर लाइव के मुम्बई साहित्य उत्सव में गिरीश कर्नाड को नाटककार के रूप में अपने जीवन की उपलब्धियों पर विचार रखने के लिए आमंत्रित किया था, लेकिन उन्होंने वहाँ नायपॉल के व्यक्तित्व और कृतित्व का खुलासा करना जरूरी समझा, जिन्हें लाइफटाइम अचिवमेन्ट अवार्ड दिये जाने के अवसर पर वह कार्यक्रम आयोजित था. आयोजकों को भले ही यह नागवार गुजरा हो, लेकिन उनके इस भाषण ने नायपॉल के विचारों और उनको पुरस्कृत-प्रतिष्ठित किये जाने की पूरी परिघटना को समझने का एक सही परिप्रेक्ष दिया है. प्रस्तुत है उस भाषण का सम्पादित अंश.)

लैंडमार्क लिटरेचर लाइव ने मुम्बई साहित्य उत्सव में सर बिदिया नायपॉल को इस वर्ष का लाइफटाइम अचिवमेन्ट अवार्ड प्रदान किया. नेशनल सेन्टर फॉर परफोर्मिंग आर्ट्स में 31 अक्टूबर को आयोजित पुरष्कार समारोह में किसी ने शर्म के मारे इस बात की चर्चा नहीं की कि नायपॉल न तो भारतीय हैं और न ही उन्होंने कभी ऐसा दावा ही किया है. किसी ने इस पर कोई सवाल नहीं उठाया और उपन्यास लेखिका शशि देशपाण्डे ने भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद द्वारा आयोजित नीमराना उत्सव के बारे में जो कुछ कह था, वाह इस आयोजन पर भी सटीक बैठता है- “यह एक नोबेल पुरष्कार विजेता का जश्न था, जिसे भारत बड़ी उम्मीद और चापलूसी भरे अंदाज में भारतीय मानता है.”

उनके दो उपन्यासों में भारत से सम्बंधित घटनाएँ हैं और उनमें काफी गहराई है. इसके अलावा नायपॉल ने भारत के बारे में तीन किताबें लिखीं हैं, जो शानदार तरीके से लिखी गयी हैं- निश्चय ही वे हमारी पीढ़ी के महान अंग्रेजी लेखकों में से एक हैं. आधुनिकता की और भारत की यात्रा की निरन्तर खोज के रूप में इन कृतियों का स्वागत हुआ है, लेकिन उनकी पहली ही किताब द उंडेड सिविलाइजेशन से ही जो चीज किसी को भी खटकती है, वह है भारतीय मुसलमानों के प्रति उनका उन्मादपूर्ण विद्वेष. शीर्षक में जिस “जख्म” का उल्लेख है, वह बाबर के हमले द्वारा भारत को दिया गया जख्म है. तभी से, नायपॉल ने यह बताने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं दिया कि उन्होंने भारत को पाँच सौ सालों तक क्षत-विक्षत किया, दूसरी तमाम बुराइयों के अलावा उन्होंने यहाँ गरीबी पैदा की और यहाँ की गौरवशाली संस्कृति को नष्ट किया.   
     
इन किताबों के बारे में एक बात जो एकदम खटकती है वह यह कि भारतीय संगीत के बारे में इन में से किसी भी किताब में एक भी शब्द नहीं है. और मेरा मानना है कि अगर संगीत पर ध्यान नहीं देते तो आप भारत को समझ ही नहीं सकते. संगीत भारतीय अस्मिता को परिभाषित करने वाला कला रूप है. आधुनिक भारतीय संस्कृति की समग्र खोज करते हुए इस विषय पर नायपॉल की चुप्पी मेरे लिए इस बात का सबूत है कि वे सुर बधिर हैं- जिसकी बजह से वे हिंदू-मुस्लिम सृजनशीलताओं के उस जटिल अन्तरगुम्फन के प्रति असंवेदनशील हो गये हैं जो भक्ति और सूफी आन्दोलनों का प्रतिफल है, जिसने हमें असाधारण विरासत सौंपी है जो हर भारतीय परिवार के दिल में जिन्दा है.

हालाँकि इस कमी के बावजूद, नायपॉल ने विलियम जोन्स जैसे 18वीं और 19वीं सदी के ब्रिटिश संगीतशास्त्रियों से भारी मात्रा में भारतीय संस्कृति के सिद्धांत उधार लिए हैं. ये विद्वान कई दूसरी प्राचीन सभ्यताओं से भी परिचित थे, जैसे- मिस्र, यूनान और रोम. लेकिन वे इस बात से चकित थे कि इन सभ्यताओं के साथ ही इनकी संगीत परंपरा पूरी तरह विलुप्त हो गयी, जबकि भारतीय संगीत परंपरा जीवित और फलती-फूलती रही. उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि एक समय का यह विशुद्ध और प्राचीन संगीत लंबे इतिहास के दौरान किसी खास मोड़ पर भ्रष्ट और विकृत कर दिया गया- और इस खलनायक को उन्होंने हमलावर मुसलमानों के रूप में ढूँढ निकाला. इस तरह उनकी राय में, किसी समय एक प्राचीन भारतीय संगीत की संस्कृति रही थी, जिसके साथ मुसलमानों ने छेड़खानी की.
   
भारतीय संस्कृति के अपने विश्लेषण में नायपॉल ने सीधे-सीधे इसी तर्क-रेखा को उधार लेकर उसे पुनर्बहाल किया है- अपनी मौलिक धरना के रूप में. और ऐसा उन्होंने कोई पहली बार नहीं किया है.

नायपॉल ने आर.के. नारायण पर आरोप लगाया कि वे विजयनगर के खण्डहरों से जिस तबाही और मौत का संकेत मिलता है, उसके प्रति उदासीन हैं, जो उनकी निगाह में हिंदू संस्कृति का एक गढ़ था और जिसे लूटेरे मुसलमानों ने तबाह कर दिया. लेकिन विजयनगर के इतिहास की यह व्याख्या, उन्हें सन 1900 में प्रकाशित रॉबर्ट सेवेल की किताब ऐ फॉरगोटन एम्पायर से पका-पकाया मिल गया. नायपॉल, हमेशा की तरह अपने औपनिवेशिक स्रोतों के प्रति नतमस्तक, किसी सिद्धांत को सीधे-सीधे उधार लेते हैं और उसे पूरी तरह अपना बताते हुए दुहराने लगते हैं. पिछली सदी से ही उस स्थल पर कार्यरत इतिहासकारों  और पुरातत्ववेत्ताओं ने यह साबित किया है कि परिस्थितियां कहीं ज्यादा जटिल थीं और दिखाया है कि इस टकराव में धर्म की नाममात्र की भी किसी भूमिका का उनके लिए कोई मायने नहीं.

ताज के बारे में, जो भारत में सबसे प्यारा स्मारक है, नायपॉल लिखते हैं- “ताज इतना फालतू, इतना पतनशील और अंततः इतना क्रूरतापूर्ण है कि वहाँ देर तक ठहरना पीड़ादायी है. यह एक फिजूलखर्ची है जो जनता के खून का बयान करता है.” इतिहासकार रोमिला थापर के इस तर्क को कि मुग़ल काल हिंदू और मुस्लिम शैली के मिश्रण की समृद्ध प्रफुल्लता को दर्शाता है, वे यह कहते हुए नकार देते हैं कि उनका यह निर्णय मार्क्सवादी पूर्वाग्रह की देन है और कहते हैं- “सही सच्चाई यह है कि हमलावर अपनी कार्रवाइयों को कैसे देखते थे. वे जीत रहे थे. वे गुलाम बना रहे थे.” नायपॉल के लिए भारतीय मुसलमान हमेशा हमलावर बने रहते हैं, हमेशा निंदनीय और निरादर के लायक हैं, क्योंकि उनमें से कुछ के पूर्वज हमलावर थे. यह एक ऐसी रीति है जिसे अमरीका पर आजमाया जय तो इसके कुछ विस्मयकारी नतीजे सामने आयेंगे. 
            
जहाँ तक नायपॉल के आधुनिक भारत की पत्रकारों जैसी खोज की बात है, यह मुख्यतः नाना प्रकार के भारतीय लोगों के साक्षात्कार की एक पूरी श्रृंखला की शैली में है. मानना पड़ेगा कि यह बहुत ही अच्छी तरह लिखी गयी है और वे जिन लोगों से मिलते हैं और जहाँ-जहाँ जाते हैं, उनका बहुत ही तीक्ष्ण और सटीक चित्र खींचते हैं. जो चीज कुछ ही देर बाद झुंझलाहट पैदा करती है, वह यह कि बिना किसी अपवाद के वे जिस भी व्यक्ति से बात करते हैं, वह ऐसा लगता है कि वे जो भी सवाल करते हैं, उसका वह उसी विवेकशीलता और रमणीयता से जवाब देता है, जो खुद उन्हीं की शैली है. यहाँ तक कि काम पढ़े-लिखे लोग भी उनके प्रश्नों का निस्संकोच उत्तर देने की व्याधि से ग्रस्त होते हैं.

वे जिन वार्तालापों को रिकार्ड करते हैं, वे कितने विश्वसनीय होते हैं? अपने एक मशहूर निबंध में नायपॉल ने नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ डिजाइन, अहमदाबाद की यात्रा का वर्णन किया है जहाँ वे उस संस्थान के निदेशक, अपने मित्र, अशोक चटर्जी के साथ ठहरे थे. हालही में एक इमेल में श्री चटर्जी ने कहा कि वह लेख “एक ऐसी कथानक है, जैसा हो सकता था, लेकिन वह नहीं है जो (नायपॉल ने) वहाँ वास्तव में देखा था. यथार्थ के टुकड़े, चुनिन्दा और विशुद्ध कल्पना के कोलाज में एक साथ सजाये गये.” चटर्जी की नायपॉल के साथ मित्रता का अचानक अंत हो गया, जब चटर्जी ने नायपॉल से कह कि उनकी किताब, ऐ उंडेड सिविलाइजेशन  को गल्प की श्रेणी में रखा जाना चाहिए.

एक ताजा किताब में नायपॉल ने जो 19वीं सदी के अंत में सूरीनाम जा कर बसनेवाले मुंसी रहमान खान की आत्मकथा का परीक्षण किया है और गांधी के साथ उनका विरोधाभास चिन्हित किया है. इतिहासकार संजय सुब्रमण्यम ने उस निबंध की समीक्षा की और उनको यह पता लगाने में ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़ा कि नायपॉल ने महज उसके मूल पाठ का तीसरी भाषा में किया गया अनुवाद ही पढ़ पाये. “यह वैसे ही है, जैसे गोरखपुर का कोई पाठक नायपॉल को मैथिली भाषा में पढे और वह भी तब जबकि उसका अनुवाद जापानी भाषा से किया गया हो.” लेकिन यह चीज नायपॉल को रहमान खान की शैली और उनके भाषा सम्बंधी प्रयोग पर नरनायक टिप्पणी करने से नहीं रोकती.  
  
निश्चय ही यह सवाल है कि लाइफटाइम अचीवमेन्ट अवार्ड देकर पुरस्कार देनेवालों द्वारा क्या सन्देश दिया जा रहा है. एक पत्रकार के रूप में वे भारत के बारे में क्या लिखते हैं, यह उनका मामला है. कोई भी उनके लापरवाह होने और छलकपट करने के अधिकार पर सवाल नहीं उठा सकता.

लेकिन नोबेल पुरष्कार ने उन्हें एक अचानक प्राधिकार दे दिया है और उनके द्वारा इसके इस्तेमाल पर नजर रखना जरूरी है.

नोबेल पुरष्कार मिलने के बाद नायपॉल ने सबसे पहले जो काम किये, उनमें से एक यह था कि वे भाजपा के दिल्ली कार्यालय में गये. जिन्होंने पहले यह घोषित किया था कि वे राजनीतिक नहीं हैं, क्योंकि “राजनीतिक दृष्टिकोण रखना प्रोग्राम्ड होना है,” अब घोषित किया कि वे राजनीतिक रूप से “सही जगह आकर” खुश हैं. यह तभी की बात है जब उन्होंने अपनी बहुत ही प्रसिद्द टिप्पणी की थी- उन्होंने कहा था कि “अयोध्या एक तरह का जूनून है. कोई भी जूनून रचनात्मक होता है. भावोद्रेक रचनात्मकता की और ले जाता है.”
सलमान रुश्दी की प्रतिक्रिया थी कि नायपॉल का व्यवहार “फासीवाद के सहयात्री जैसा है और वे नोबेल पुरष्कार का अपमान कर रहे हैं.” 

एक विदेशी के लिए अयोध्या किसी अमूर्त सिद्धांत का मनोरंजक प्रमाण हो सकता है जिसे उसने खुद गढा हो (या उसे पका-पकाया मिल गया हो). लेकिन इसी अयोध्या के चलते अकेले मुम्बई की सडकों पर ही 1500 मुसलमानों का कत्लेआम हुआ था. जिस समय दंगा भड़का, मैं दिल्ली के एक फिल्म फेस्टिवल में शामिल था और मुम्बाई से मेरे दोस्तों के आक्रोश भरे फोन आ रहे थे कि मुसलमानों को उनके घरों से खींचकर निकाल कर या सडकों पर रोक कर उनकी हत्या की जा रही है. मैंने अपने मुस्लिम संपादक को फोन करके बताया कि जब तक स्थिति सामान्य न हो जाय, वह अपने परिवार सहित हमारे फ़्लैट में जा सकता है, जो पारसी बहुल इलाके में है. महान मराठी अभिनेत्री फय्याज़, जिसके बारे में आख़िरकार एक हफ्ते बाद मुझे पता चला कि वह डर कर मुम्बई से पुणे भाग आयी थी. उसने बताया कि किस तरह शिव सैनिकों ने मुस्लिम झुग्गी-बस्तियों में बम फेंक कर आग लगाई और जब वहाँ के निवासी आतंकित हो कर घरों से बाहर निकले तो पुलिस ने उन्हें बलवाई कह कर गोली मार दी.


सात साल बाद नायपॉल इन घटनाओं का बड़े ही निर्मम ढंग से “जूनून” कह कर महिमामण्डित कर रहे थे, इसे “रचनात्मक कार्रवाई” बता रहे थे.

यह ध्यान देने योग्य है कि पुरष्कार के प्रसस्ति-पत्र में नायपॉल के समाजशास्त्रीकरण के इस पहलू का कोई उल्लेख नहीं किया गया है. फार्रुख ढोंडी ने भी अपने साक्षात्कार में इसका जिक्र नहीं किया, हालाँकि उन्होंने एमंग द विलिव्हर किताब  का नाम लिया और फिर तुरंत इस बात की लम्बी-चर्चा में मशगूल हो गये कि 13 साल पहले किस तरह उन्होंने विदिया को एक बिल्ली गोद लेने लेने में मदद की थी और कैसे एक दिन वह उनकी गोद में पड़ी-पड़ी सो रही थी- जिस बात ने नायपॉल एक और मौका दे दिया कि वे भावुकता में बह कर फूट-फूट कर रो पड़ें. शायद ढोंडी यह साबित करने की कोशिश कर रहे थे नायपॉल कितने “मानवीय” हैं.

लेकिन जिस लैंडमार्क लिटरेचर लाइव ने इस अवार्ड की घोषणा की है, उसकी यह जिम्मेदारी है कि वे हमलोगों को बताएं कि वे नायपॉल की टिप्पणियों से सहमत हैं या नहीं. क्या वे नायपॉल की इस समझ का भाव बढ़ाना चाहते हैं कि भारतीय मुसलमान आक्रांता और लूटेरे हैं? क्या वे उनके द्वारा लगातार दिये जानेवाले इस तर्क का समर्थन कर रहे हैं कि भारत की मुस्लिम इमारतें बलात्कार और लूट के स्मारक हैं? या वे अपनी चुप्पी के जरिये यह बता रहे हैं कि इन विचारों का कोई मायने ही नहीं है?

अगर यह अवार्ड देनेवाले लोग इस बाहरी व्यक्ति द्वारा भारतीय आबादी के एक समूचे तबके को बलात्कारी और हत्यारा बताते हुए उसे अपराधी करार देने की अपनी राय पर जानबूझ कर चुप हैं, तो हमें कहने दिया जाय कि यह चुप्पी लापरवाही से भी अधिक बुरी है. यह हतप्रभ कर देने वाला है.

जहाँ तक इस अवार्ड का सवाल है, इसे शर्मनाक ही कह जा सकता है.

(गिरीश कर्नाड के भाषण का सम्पादित अंश मिन्ट से साभार. अनुवाद- दिगम्बर)