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Saturday, November 10, 2012

पूँजीवाद और “मानव स्वभाव” : एक भंडाफोड

अमरीकी महाद्वीप के मूलनिवासियों का उपहार पर्व- पोटलैच

 -जय मूर 
द वेल्थ ऑफ नेशंस के सबसे मशहूर हिस्से में, जहाँ श्रम विभाजन के फायदों की चर्चा की गयी है, एडम स्मिथ इस सिद्धांत को आगे बढ़ाते हैं कि “यह चीज सभी मनुष्यों में समान है” कि उनमें “एक चीज के बदले दूसरी चीज की लेन-देन, अदला-बदली और विनिमय की स्वाभाविक प्रवृति” पायी जाती है. स्मिथ इस बात को खोल कर नहीं बताते कि क्या यह “प्रवृति” मूल मानवीय स्वभाव का मामला है या, प्रबोधनकालीन एडम स्मिथ के लिए ऐसा मानना सुविधाजनक है कि यह मनुष्य की वैसी ही अनोखी क्षमता है जिस तरह चेतना और बोलने की क्षमता. लेकिन इसी अप्रमाणित धारणा के ऊपर कि ऐसी किसी “प्रवृति” का अस्तित्व है, और इसी के साथ एक और ऐसी ही अप्रमाणित धारणा को मिला कर कि अभाव की परिस्थिति में बेपनाह जरूरतों की ख्वाहिश रखने वाला “स्वामित्वशाली व्यक्तिवाद” विश्वव्यापी जन्मजात मानवीय प्रवृति है, पूरा का पूरा आधुनिक नव-क्लासिकीय अर्थशास्त्र इसी पर टिका हुआ है. मुख्यधारा के अर्थशास्त्र की कोई भी किताब पलट के देखिये तो आपका सामना एडम स्मिथ के प्रसिद्द उद्धरण से होगा, जिसे पूँजीवाद और तथाकथित “मुक्त बाजार” की श्रेष्ठता के पक्ष में एक स्वयंसिद्ध प्रस्थान बिन्दु माना जाता है, क्योंकि उन फर्जी आर्थिक रूपों से इस फर्जी मानवीय प्रवृति का काफी मेल बैठता है.

जिस किसी को भी इतिहास और मानवशास्त्र के गहन अध्ययन का अवसर मिला हो, जैसा कि मुझे, जिसने स्थान और काल से परे मानव समाजों और संस्कृतियों की बड़े पैमाने पर परिवर्तनशीलता पर मुग्ध हुआ हो और कुछ बुनियादी समानताओं और विन्यासों पर विचार किया हो (जिनके अस्तित्व को ऐतिहासिक भौतिकवाद दर्शाता है) तो उसने उपरोक्त धारणा के इस चरम कुतर्क पर ध्यान दिया होगा कि आधुनिक बुर्जुआ का ठेठ चरित्र ही सर्वव्यापी मानव चरित्र है. इतिहास के पूरे दौर में अधिकांश मनुष्यों ने ऐसी “प्रवृति” को नहीं दर्शाया है.

कई समाजों में, और शायद सभी समाजों में व्यापारियों का अस्तित्व रहा है, लेकिन जिन लोगों ने भी खुद को धनी बनाने के उद्देश्य से पेशे के रूप में यह काम किया, उन्हें संदेह से देखा जाता रहा है. व्यापार मुख्यतः सामाजिक हासिये पर ही किया जाता था. और, जैसा कि डेविड ग्राएबर ने “कर्ज” के राजनीतिक अर्थशास्त्र के बारे में अपनी चिरस्मरणीय रचना में दर्शाया है, अब तक ज्ञात कोई भी समाज वस्तु विनिमय पर आधारित नहीं रहा है. आधुनिक युग के पहले तक उपहार की अर्थव्यवस्था सबसे अधिक प्रचलित थी, जिसमें समाज में चीजें एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक परिचालित होती थीं और कोई इस बात की गणना नहीं करता था कि उसने जो कुछ दिया उसके बदले उसी के बराबर या उससे बड़ी कोई चीज वापस मिले, यानी कोई भी व्यक्ति संभावित लाभ की उम्मीद नहीं करता था. “अग्रिम भुगतान” की अवधारणा इसी का आधुनिक प्रतिरूप है.

जब यूरोप के लोगों का पहले-पहल उत्तर-पश्चिमी तटवासी इन्डियन (अमरीका के मूलनिवासी) लोगों से सामना हुआ तो वे यह देख कर हैरान रह गये कि वहाँ के निवासियों में धन बटोरने की अंतहीन पूँजीवादी हवस नहीं थी, बल्कि समाजिक जरूरतें पूरी करने के उद्देश्य से संग्रह करने या उपहार देकर अपनी स्थिति सुधारने की प्रथा थी और उपहार पर्व मनाने और अपनी सम्पदा को बाँट कर खत्म करने का चलन था. इसीलिए उन्होंने वहाँ के लोगों का दमन किया तथा इंडियन लोगों के मन में कार्य नैतिकता, बचत और निवेश के बारे में बुर्जुआ विचारों को ठूँस-ठूँस कर भर दिया. कनाडा की सरकार ने 1884 में उपहार पर्व को गैरकानूनी घोषित कर दिया; फिर भी कुछ मूलनिवासी इंडियनों ने इस “असभ्य” प्रथा को जारी रखा तो उन्हें जेल में ठूँस दिया गया और उनके आनुष्ठानिक स्मरण-चिन्हों को उनसे छीन लिया गया. (उन स्मरण चिन्हों को अजायब घरों में रख दिया गया, जहाँ शीशे के खाने में पड़े-पड़े वे विस्मृति के गर्त में चले गये.) अफ्रीका में, सभी यूरोपीय उपनिवेशवादियों ने एक ही तरह के निराशा का इजहार किया, जब बाजार के प्रलोभनों के जरिये वे वहाँ के मूलनिवासियों से अधिक उत्पादन के लिए कठिन श्रम नहीं करवा पाए. उल्टे हुआ यह कि अफ्रीकी ग्रामीण अगर कुछ अधिक अर्जित करने में समर्थ भी थे, जैसा कि आधुनिक युग से पहले की दुनिया के कई दूसरे हिस्से के किसान, तो वे अक्सर काम काम करना पसंद करते थे और छुट्टी का जम के मजा लेते थे. जब उन पर झोपड़ी टैक्स थोपा गया और हिंसा का तांडव किया गया, तब मजबूर होकर उन्होंने बाजार के लिए अधिक उत्पदान किया.
   
इसके अलावा, यह भी जरूरी नहीं कि बाज़ार में छोटे पैमाने की भागीदारी पक्के तौर पर पूँजीवादी मूल्यों को अपनाने का इजहार करती है, हालाँकि एक लंबे अरसे के दौरान विचारों और कार्रवाइयों पर इसका विनाशकारी प्रभाव जरुर हुआ होगा. लोगों ने “परंपरागत” सामाजिक उत्पादन के लिए “एक चीज के बदले दूसरी चीज की लेन-देन, अदला-बदली और विनिमय” करने का फैसला लिया होगा और जरूरी नहीं कि इसके पीछे मुनाफा कमाना ओर “तरक्की करना” उनका उद्देश्य रहा हो. उपहार की अर्थव्यवस्था भी उसी के साथ-साथ या बाजार आर्थव्यवस्था के साथ तालमेल करते हुए चलती रही होगी. उत्तरी-पश्चिमी तटवासी अमरीकी मूलनिवासी यूरोप के साथ ऊन और मछली का व्यापार करते थे, ताकि बदले में वे अपने उपहार पर्व (पोटलैच) के लिए अनोखी वस्तुएँ हासिल कर सकें.

हालही में मैंने एक दिलचस्प किताब पढ़ी- द डिस्कवरी ऑफ फ़्रांस: ऐ हिस्टोरिकल जोगरफी फ्रॉम द रेवोलूशन टू द फर्स्ट वर्ल्ड वार, जिसके लेखक ग्राहम रोब हैं. इसमें विस्तार से यह बताया गया है कि प्रांतीय फ़्रांस में रोजमर्रे का जनजीवन कैसा था और आधुनिकता के उभर के बाद उसमें किस तरह बदलाव आया. यह ठीक वही समय था जब व्यावहारिक रूप से अब तक अपनी कीमत पर पूरी जिन्दगी गुजारते आ रहे ग्रामीण लोग, अमूमन हैरत और नाउम्मीदी के साथ देख रहे थे कि अब वे “फ़्रांस” नामक एक कहीं बड़े सत्ता के अंग हैं. एक छोटी सी कहानी खास तौर पर मेरे दिमाग में बस गयी है- ऑरजेनिया इलाके में महिलाओं का एक समूह कपड़ों की सिलाई-बुने के लिए एकत्र होता था जहाँ दूसरों के लिए काम करने के बदले घुमंतू व्यापारी उनको बहुत ही थोड़े पैसे देते थे. लेकिन वहाँ मामला पैसा कमाने का था ही नहीं. असली बात शाम होने के बाद भी घर से बाहर निकलने और आपसी मेलजोल की थी. कपड़ों की सिलाई-कढाई से जितने पैसे मिलते थे वे तो चिराग जलाने के लिए तेल खरीदने में ही लग जाते थे. रोब कहते हैं कि इन महिलाओं जैसे लोगों के व्यवहार को प्रेरित करने वाला कारक किसी आर्थिक जरुरत से कहीं ज्यादा अपनी ऊब मिटाना होता था.

ऐसे ही कई और उदाहरण दिये जा सकते हैं जो दिखाते हैं कि एडम स्मिथ ने मानव जाति का जो काल्पनिक खाका बनाया है उसमें अधिकांश मनुष्य फिट नहीं बैठते, न तो स्वाभाविक रूप से और नही “तर्क” का अभ्यास करने से. जैसा कि कार्ल पोलान्यी ने द ग्रेट ट्रांसफोर्मेशन में दिखाया है, मानव समाज विभिन्न प्रकार की आर्थिक तार्किकताओं का वाहक रहा है; सब को उन्होंने इन समूहों में रखा है- परस्पर लेनदेन, पुनर्वितरण, परिवार के उपभोग के लिए उत्पादन और बाजार व्यवस्था. बाजार व्यावस्था की प्रधानता से पहले की अर्थव्यवस्थाएं अकेले व्यक्ति की सत्ता नहीं होती थीं. बावजूद इसके कि वहाँ विभिन्न सत्रों और अधिक समानता वाले समाजों में अंतर मौजूद था, सभी अर्थव्यवस्थाएँ सामाजिक संबंधों में “सन्निहित” या “अंतर्गुम्फित” थीं और सम्मान जैसी नीतियों पर आधारित थीं- सीधे निजी आर्थिक स्वार्थों से उनका कोई लेना-देना नहीं था. पोलान्यी दर्शाते हैं कि किस तरह “एक चीज के बदले दूसरी चीज की लेन-देन, अदला-बदली और विनिमय,” जो इस हद तक समाज की चारित्रिक विशेषता बन गये हैं, इंग्लैण्ड में, जो कि इनका मुख्य उद्भव स्थल है, स्वाभाविक रूप से नहीं आए थे. 18वीं सदी के उत्तरार्ध और 19वीं सदी की शुरुआत (जो इस किताब का शीर्षक है) में मुक्त व्यापार अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों की आड़ में कठोर कानूनों की एक पूरी श्रृंखला को जबरन लागू करके इसे संस्थाबद्ध किया गया था. पूँजीवादी सम्पत्ति संबंधों और पूँजीवादी मानदंडों को थोपने और बनाये रखने में राजसत्ता ने केन्द्रीय भूमिका निभाई थी और आज भी निभा रही है.

अच्छी हैसियत वाले पूँजीपतियों और मुख्यधारा के पूँजीवाद समर्थक अर्थशास्त्रियों की निगाह में निजी स्वार्थों को अधिकाधिक बढ़ाने वाले व्यवहारों के अलावा सभी तरह के आचरण “अतार्किक” होते हैं. स्कूलों में “व्यापार में कैसे सफल हों,” इस बारे में तो ढेर सारे पाठ्यक्रम होते हैं, लेकिन सहकारी समितियों का गठन और संचालन कैसे करें या शोषणकारी और अलगाव का शिकार बनाने वाली “मुक्त बाजार” प्रक्रिया के किसी दूसरे विकल्प के पाठ्यक्रम शायद ही होते हों.

आश्चर्य की बात नहीं कि इस माहौल में एक सामूहिक सुर उभरता है जो किसी भिन्न राय पर विचार करते हुए उसे विदेशी और ‘काल्पनिक” बताता है और कहता है कि इसे तो असफल होना ही है. लेकिन हम यह पूछ सकते हैं कि हमारा यह समाज कितना तार्किक है जहाँ धनी और गरीब के बीच, 1 % और 99 % के बीच विकराल और विस्मयकारी असमानता मौजूद है, जहाँ एक अरब लोग रोज भूखा सोते हैं, जबकि बेलगाम विकास और उसे टिकाये रखने के लिए बेशुमार उपभोग की आदत ने समूची पृथ्वी के पर्यावरण को तबाह कर दिया और इसके विनाश का खतरा पैदा कर दिया?

हालाँकि आधुनिक काल से पहले या उसके शुरूआती युग के लोगों का रोमानी चित्र खींचना उचित नहीं, फिर भी रोब कंगाली की गर्त में पड़े, अनिश्चितता में डूबे फ़्रांसिसी किसान का वर्णन करते हैं जो कुर्क अमीन या मूसलाधार बारिश का इंतजार करता थरथर काँपता रहता था. कितना अच्छा होता कि पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली के चलते उत्पादन क्षमता में जो अद्भुत वृद्धि हुई है उसका संचालन एक समकालीन “सहकारी राष्ट्रमंडल” के जरिये होता, जो पूँजीवादी निजी मुनाफाखोरी से नहीं, बल्कि उपहार अर्थव्यवस्था और इतिहासकारों द्वारा वर्णित मानवीय किस्म की मूल्य-मान्यताओं से प्रेरित होता. 

(जय मूर एक रेडिकल इतिहासकार हैं. वेरमौंट के ग्रामीण इलाके में रहते हैं और जब कभी काम मिल जाता है तो पढाने का काम करते हैं. मंथली रिव्यू से आभार सहित. अनुवाद- दिगम्बर)