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Thursday, July 14, 2011

इकबाल के चंद अशआर जो आज के दौर में बेहद मौजूँ हैं

अता ऐसा बयाँ मुझको हुआ रंगीं बयानों में
कि बामे अर्श के ताईर हैं मेरे हमजुबानों में

रुलाता है तेरा नज्जारा ए हिन्दोस्तां मुझको
कि इबरत खेज़ है तेरा फ़साना सब फसानों में

निशाने बर्गे गुल तक भी न छोड़ा बाग़ में गुलचीं
तेरी किस्मत से रज्म आराइयाँ हैं बागबानों में

वतन की फ़िक्र कर नादाँ! मुसीबत आने वाली है
तेरी बर्बादियों के मश्वरें हैं आसमानों में

जरा देख उसको जो कुछ हो रहा है, होने वाला है
धरा क्या है भला उहदे कुहन की दास्तानों में

ये ख़ामोशी कहाँ तक ? लज्ज़ते फरियाद पैदा कर!
जमीं पर तू हो, और तेरी सदा हो आसमानों में!

न समझोगे तो मिट जाओगे ए हिन्दोस्तां वालो!
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में!