Monday, November 21, 2011

एक परिवार की कहानी : जो बत्तीस रुपये रोज से अधिक खर्च करता है



अमरपाल/ पारिजात

(योजना आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार शहरी क्षेत्र में 32 रुपये और ग्रामीण क्षेत्र में 26 रुपये प्रतिदिन प्रति व्यक्ति खर्च करने वाला परिवार गरीबी रेखा से ऊपर माना जायेगा।
इस 32 रुपये और 26 रुपये में भोजन, आवास, वस्त्र, शिक्षा, स्वास्थ्य और मनोरंजन जैसे सभी खर्चे शामिल हैं। हमने अपने आस-पास के कुछ परिवारों से बातचीत कर उनकी जिन्दगी की हकीकत जानने की कोशिश की। स्थानाभाव के कारण हम उनमें से एक ही परिवार की स्थिति यहाँ दे रहे हैं। बाकी लोगों की कहानी भी लगभग ऐसी ही है।)
अब से 14 साल पहले चंद्रपाल (उम्र- 45 वर्ष) एक लोहा फैक्ट्री में काम करते थे, जहाँ भारी वजन उठाने के चलते उनकी रीढ़ की हड्डी खिसक गयी। तभी से वे कोई भारी काम करने लायक नहीं रहे। उन्हें घर बैठना पड़ा। इलाज के अभाव में वे अब लगभग अपंग हो गए हैं।
चंद्रपाल मूल रूप से खुर्जा (बुलंदशहर) के रहने वाले हैं। जब वह छोटे थे तभी दवा के अभाव में डायरिया से उनके पिता की मौत हो गयी थी। चंद्रपाल बताते हैं कि उनके माता-पिता की दस संताने हुईं, जिनमें से सिर्फ तीन ही बच पायीं। बाकी सभी बच्चे बीमारी और कुपोषण से मर गये। जो बचे रहे उनमें भी बड़े भाई टीबी होने और खुराक न मिलने से मर गए। उनकी माँ ने खेत में मजदूरी करके किसी तरह अपने बच्चों को पाला-पोसा और चंद्रपाल को 12वीं तक पढ़ाया। इसके बाद वे खुर्जा शहर में ही एक लोहे की फैक्ट्री में काम करने लगे। फैक्ट्री में काम दौरान रीढ़ की हड्डी की परेशानी और बेहतर काम की तलाश में वे दिल्ली चले आये।
दिल्ली के पास लोनी में उनका 50 गज का अपना मकान है तीन कमरों का, जिस पर पलस्तर नहीं हुआ है। 1997 में उन्होंने यह जमीन 55 हजार रुपये में खरीदी थी जो अपने खून पसीने की कमाई और खुर्जा का पुश्तैनी मकान बेचकर जुटाया था। उन्होंने अपना सारा पैसा इसी घर में लगा दिया, लेकिन फिर भी मकान अधूरा ही बन पाया। चंद्रपाल और उनका बेटा अब खुद ही उसे थोड़ा-थोड़ा करके पूरा करते हैं। मकान में काम करते हुए ही चंद्रपाल के एक हाथ की हड्डी भी टूट गयी, जो इलाज के बाद भी नहीं जुड़ी। परिवार की आमदनी इतनी नहीं कि ऑपरेशन करवा सकें। ये दर्द अब उनकी जिन्दगी का हिस्सा बन गया है। अब वे हाथ से भी भारी काम करने में अक्षम हैं।
परिवार का खर्च उनकी पत्नी अंगूरी देवी चलाती हैं। वे दिल्ली में किसी सेठ की कोठी पर घरेलू नौकरानी का काम करती हैं। पूरे दिन घर का सारा काम करने के बदले उन्हें हर महीने 5 हजार रुपये मिलते हैं। पिछले 14 साल में केवल एक हजार रुपये की बढ़ोत्तरी हुई। वे सारा पैसा घर में देती हैं। अपने पास एक धेला भी नहीं रखती। इसका कारण बताते हुए कहती हैं कि बाजार में चलते हुए कभी उनका मन ललचा गया तो गलती से वह कुछ खरीद न लें। इसीलिए उनके पास सिर्फ 70 रुपये का रेल पास रहता है, ताकि वे रोज लोनी से दिल्ली आ-जा सकें।
चंद्रपाल के घर में बिजली कनेक्शन नहीं है। किराये पर जनरेटर का कनेक्शन है जो रात को तीन घण्टे बिजली देता है , जिससे 15 वाट का एक बल्ब जलता है। इसके लिए उन्हें 100 रुपये महीना देना होता है। बाकी समय वे ढिबरी से काम चलाते हैं। पीने के पानी का कनेक्शन भी नहीं है। घर में एक हैंडपम्प है। 120 फीट गहरा।  दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों में इतनी गहराई पर पीने लायक पानी नहीं मिलता। जगह-जगह बोर्ड लगे हैं कि हैंडपम्प के पानी का प्रयोग पीने के लिए न करें। लेकिन यहाँ तो इसी पानी से काम चलाना पड़ता है।
गंदे पानी की निकासी का कोई इंतजाम नहीं है और न ही गलियों की साफ सफाई का। घर के आगे नाली का पानी बहता है और घर के पीछे सड़ता-बजबजाता पानी का गड्ढा।  परिवार में हरदम कोई न कोई बीमार रहता है। हर महीने इलाज पर औसतन 200 रुपये का खर्चा आता है। जो कुल आमदनी का 4 प्रतिशत बैठता है। चंद्रपाल के टूटे हाथ का इलाज कराना परिवार के बस का नहीं है। वे इस पर सोचते भी नहीं। वे जानते हैं कि सरकारी अस्पताल में ऑपरेशन करवाने पर भी उसमें कम से कम दो महीने की कमाई लग जाएगी।
बीमारी के बारे में चन्द्रपाल ने कहा कि लोनी में किसी को डेंगू नहीं होता। लोगों को सबसे ज्यादा मलेरिया होता है। डेंगू के मच्छर तो साफ पानी में पलते हैं। यहाँ तो पीने के लिए भी साफ पानी नहीं है। घर के आगे-पीछे हमेशा गन्दा पानी भरा रहता है। उसमें तो मलेरिया के मच्छर ही पलते हैं। मच्छर इतने कि घर में बैठ नहीं सकते। बीमारी की जड़ यही सब है।
इस परिवार का मुख्य भोजन आलू की सब्जी या चटनी और रोटी है। अंगूरी देवी अपने मालिक के यहाँ से कभी कोई सब्जी ले आयें, तभी उन्हें सब्जी नसीब होती है। हफ्ते में एक या दो दिन ही घर में सब्जी बनती है।  हमारा देश मसालों के लिए मशहूर है, लेकिन इस घर में हल्दी ,जीरा, धनिया और लाल मिर्च के अलावा और कोई मसाला इस्तेमाल नहीं होता।
चंद्रपाल के लिए फल खरीद पाना मुमकिन नहीं। सालों से परिवार में कोई फल नहीं आया। परिवार में माँस-मछली नहीं बनती। पनीर खाने के बारे में वे सोच भी नहीं सकते।  अंगूरी देवी बताती है की जब से कोठी में काम करने लगीं तब से उन्हें चाय पीने की लत लग गयी। सुबह 6 बजे चाय पीकर ही वह काम पर जाती हैं। इसी बहाने घर में रोज 10 रुपये का 300 ग्राम दूध आता है। अपनी पत्नी की इस बुरी लत से चंद्रपाल खुश हैं क्योंकि इसी बहाने उन्हें भी दूध की चाय मिल जाती है। ईंधन में 3 लीटर मिट्टी का तेल राशन की दुकान से और 4 किलो रसोई गैस ब्लैक खरीद कर इस्तेमाल होता है। खाने के मद में औसतन 3000 रुपये महीने का खर्च आता है जो की कुल आय का 60 प्रतिशत है।
जब हमने उनसे महँगाई के बारे में पूछा कि क्या इससे घर के खर्च पर कोई फर्क पड़ा है, तो वह बेबस होकर बोले ‘‘सरकार गरीबों की दुश्मन हो गयी है। हमसे न जाने किस जनम का बदला ले रही है। महँगाई दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। पहले एक आदमी काम करता था और पूरा परिवार खाता था। ठीक से गुजारा होता था। लेकिन अब तो महँगाई के मारे सबको काम करना पड़ता है, फिर भी किसी का गुजारा नहीं होता। हमारे सामने वाले परिवार में माँ-बाप और एक लड़की है, तीनों काम करते हैं। माँ-बाप बाहर और लड़की घर पर ही किसी के दो बच्चों की देखभाल का काम करती है। अपने घर का सारा काम भी वही करती है, फिर भी गुजारा नहीं। वे भी हमारे ही तरह हैं।’’
भारत में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 9 गज कपड़े की खपत होती है। चंद्रपाल के परिवार ने पिछले 14 सालों से शायद ही कभी कोई नया कपड़ा खरीदा हो। अंगूरी देवी जिस कोठी पर काम करती हैं वहीं से मिले उतरन को इस्तेमाल करने लायक बना लिया जाता है। यानी कपड़े के मद में वे कुछ भी खर्च नहीं करते।
परिवार की खराब स्थिति के बारे में बात चली तो अंगूरी देवी गुस्से में बोलीं-‘‘अरे भइया क्या करें, कौन अपने बच्चों को अच्छा खिलाना-पिलाना नहीं चाहता। महँगाई ने मार डाला। हमारी जिन्दगी तो नरक बन गयी है। गरीबों का कोई नहीं है। पर क्या करें, भइया जीना तो पड़ता ही है।’’
चंद्रपाल के दो बच्चे हैं बड़ा लड़का सरकारी स्कूल में 11वीं कक्षा में पढ़ता है। उसकी फीस 550 रुपये छमाही है। लड़की प्राइवेट स्कूल में 9वीं में पढ़ती है। पहले वे दोनों ही प्राइवेट स्कूल में पढ़ते थे, लेकिन फीस न भर पाने के कारण लड़के को सरकारी स्कूल में दाखिला लेना पड़ा। सरकार कुल जीडीपी का शिक्षा के मद में जितना खर्च करती है उससे ज्यादा यह परिवार करता है- कुल आय का लगभग 6.2 प्रतिशत और वह भी सबसे घटिया दर्जे की शिक्षा के बदले।
अंगूरी देवी ने बताया कि बच्चे कभी नहीं खेलते। चन्द्रपाल ने बीच में टोका कि पूरी लोनी में खेलने की कहीं  कोई जगह भी है क्या, जो खेलें। और खेल का सामान भी तो  हो। उनका कहना था कि हमारा लड़का पढ़ाई में बहुत होशियार था। लेकिन अब पता नहीं उसे क्या हो गया है, पढ़ने में जी नहीं लगाता। 11वीं में फेल भी हो गया था पिछले साल। (हफ्ते भर बाद पता चला कि उनके लड़के ने पढ़ाई छोड़ दी है और अब कहीं काम ढूँढ रहा है।)
चंद्रपाल बताते हैं कि उन्होंने अपनी पत्नी के साथ 1992 में सिनेमा हॉल में कोई फिल्म देखी थी, वही पहला और आखरी मौका था। चंद्रपाल बहुत साल पहले पोस्टमैन की भर्ती परीक्षा में खुर्जा से लखनऊ गये थे। उसमें भी रेल में किराया नहीं दिया था और रात स्टेशन पर ही बितायी थी, पैसे के अभाव के कारण। यही उनकी जिन्दगी की सबसे लम्बी यात्रा रही।
पति-पत्नी दोनों का मानना है कि आज वह जिस हालत में हैं वह सब बाबा गोरखनाथ की कृपा है, इसलिए महीने में दो बार वे हरियाणा के किसी आश्रम में जाते हैं। इस यात्रा में लगभग 500 रुपये मासिक खर्च आता है। यदि इसे पर्यटन माने (जो है भी) तो इसमें उनकी आय का कुल 10 प्रतिशत खर्च होता है।
मनोरंजन का कोई साधन घर में नहीं है। चन्द्रपाल ने बताया कि ‘‘बहुत समय से एक रेडियो खरीदना चाहता हूँ, लेकिन तंगी की वजह से नहीं खरीद पाया। टीवी तो बहुत बड़ी बात है हमारे लिए, सपने जैसा।’’
उनके घर में 2 टूटी खाट, वर्षों से खराब पड़ा एक 14 इंच का ब्लैक एण्ड व्हाइट टीवी, एक मेज और एक डबल बेड है। टीवी और डबल बेड अंगूरी देवी के मालिक ने बहुत ही सस्ते में दिया था, इसके अलावा मालिक का दिया हुआ एक मोबाइल फोन भी है। इसमें वे हर महीने औसतन 15 रुपये का रिचार्ज करवाते हैं। इस तरह संचार पर उनकी आमदनी का 0.3 प्रतिशत खर्च है। अखबार कभी कहीं दिख गया तो चन्द्रपाल उसे पढ़ लेते हैं। खरीद पाना उनके बस का नहीं।
इस परिवार की प्रति व्यक्ति मासिक आमदनी 1250 रुपये यानी प्रतिदिन 41 रुपये 70 पैसे है जो सरकार द्वारा तय किये गये गरीबी रेखा के पैमाने (960 रुपये) की तुलना में 290 रुपये ज्यादा है। जबकि परिवार के लोग ठीक से खाना भी नहीं खा पाते, भोजन में प्रोटीन, वसा और विटामीन का कोई नामों निशान नहीं, कपड़ा नहीं खरीदते, रहन-सहन का स्तर बहुत ही खराब है, पीने का साफ पानी मयस्सर नहीं, बीमार पड़ने पर उचित इलाज नहीं करा सकते, बच्चों को पढ़ा नहीं सकते, मनोरंजन के बारे में सोच भी नहीं सकते, त्योहार नहीं मनाते, सर के ऊपर किसी तरह छत तो है लेकिन, दड़बेनुमा, गन्दगी भरे माहौल में वे दिन काट रहे हैं। जाड़े में सीलन और ठण्ड, बरसात में कीचड़, गर्मी में तपिस। चारों ओर बदबू और मच्छर। इस नरक से भी बदतर जिन्दगी की गाड़ी उसी दिन पटरी से उतर जायेगी जिस दिन किसी कारण से परिवार की आय का एक मात्र जरिया, अंगूरी देवी की घरेलू नौकरानी की नौकरी छूट जायेगी।
लेकिन योजना आयोग की नजर में यह परिवार गरीबी रेखा से ऊपर है। चूँकि यह परिवार गरीब नहीं है, इसलिए यह कोई भी सरकारी सहायता पाने का हकदार नहीं है।
अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक 77 फीसदी लोगों की आय प्रतिव्यक्ति 20 रुपये रोज, यानी 600 रुपये प्रतिमाह है। उसकी तुलना में तो इस परिवार की आय दुगुने से भी ज्यादा है। यह सब अकल चकरा देनी वाली बातें हैं। देश में गरीबी का अन्दाजा लगाइये। 
(देश-विदेश पत्रिका के अंक 12 में प्रकाशित)



योजना आयोग ने कहा- गाँव में 26 और शहर में 32 रुपए से ज्यादा खर्च करने वाले गरीब नहीं हैं।
अर्जुन सेनगुप्ता कमिटी ने कहा- 80 करोड़ देशवासी 20 रुपये रोज पर गुजर-बसर करते हैं।
दोनों सही हैं तो देश में गरीबों की कुल संख्या का अंदाजा लगाइए। 80 करोड़? 90 करोड़? 100 करोड़?
आँकड़े निर्मम होते हैं।
आँकड़ों से खिलवाड़ करने वाले जालिम होते हैं।

Wednesday, November 16, 2011

डॉ. कलाम, आपका लेख जितने जवाब नहीं देता, उससे ज्यादा सवाल खड़ा करता है


(नाभिकीय ऊर्जा पूरी दुनिया में विनाश का पर्याय बन चुका है। अमरीका के थ्री माइल्स वैली, रूस के चेर्वोनिल और अभी हाल ही में जापान के फुकुशिमा ने बार-बार यह चेतावनी दी है कि नाभिकीय ऊर्जा मानवता के लिए अत्यन्त घातक है। इससे निकलने वाले विकिरण का प्रभाव मौजूदा पीढ़ी को ही नहीं बल्कि आने वाली असंख्य बेगुनाह पीढ़ीयों को अपंग बनाता रहता है। यह बात जगजाहिर है।
पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश के शासक इन सच्चाइयों की अनदेखी करते हुए नाभिकीय ऊर्जा को हर कीमत पर बढ़़ावा दे रहे हैं। संसद में ‘‘नोट के बदले वोट’’ का खेल खेलकर भी अमरीका के साथ नाभिकीय समझौते को अन्तिम रूप दिया गया। जैतापुर और कुडानकुलम में वहाँ के स्थानीय लोगों द्वारा प्रबल विरोध के बावजूद हर कीमत पर नाभिकीय संयंत्र लगाया जा रहा है।  
पिछले कुछ दिनों से पूर्व-राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम जी कुडानकुलम नाभिकीय प्लांट के पक्ष में अभियान चला रहे हैं। आसपास की जनता लंबे अरसे से इस विनाशकारी परियोजना का विरोध कर रही है। श्री कलाम ने आसपास के गावों के लिए 200 करोड़ रुपये कि एक विकास योजना भी प्रस्तावित की है, जिसका अभिप्राय समझना कठिन नहीं. इस सन्दर्भ में भारत सरकार के पूर्व ऊर्जा सचिव और योजना आयोग के पूर्व ऊर्जा सलाहकार श्री ई.ए.एस. शर्मा का श्री कलाम के नाम यह खुला पत्र।  अनुवाद - सतीश पासवान  )

भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम के नाम पत्र

प्रेषक:
डॉ. ई. ए. एस. शर्मा
पूर्व सचिव (विद्युत ), भारत सरकार
पूर्व सलाहकार (ऊर्जा), योजना आयोग

प्रिय श्री अब्दुल कलम,

मैं नाभिकीय शक्ति पर द हिन्दू में प्रकाशित आपके अति-आश्वासनकारी लेख की तरफ ध्यान दिलाना चाहता हूँ। मैं समझता हूँ कि आप कुडानकुलम के लोगों को इस बात के लिए आश्वस्त करने की हद तक चले गये कि नाभिकीय ऊर्जा ‘‘100 प्रतिशत सुरक्षित है’’। मैं आँकडों की जानकारी के मामले में बहुत ही अनाड़ी हूँ, फिर भी मुझे आश्चर्य है कि कैसे कोई व्यक्ति इतना प्रशंसात्मक दावा कर सकता है, विशेषतया तब जब कि तकनोलोजी से थोड़ा भी परिचित व्यक्ति इस तरह के दावे करने से हिचकेगा!

मैं श्रीकाकुलम, आंध्र प्रदेश का रहने वाला हूँ। मेरे निवास के बहुत ही नजदीक, कोव्वाडा में न्यूक्लियर पावर कारपोरेशन आफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल)ने एक बहुत बड़ा नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र का काम्प्लेक्स लगाने का प्रस्ताव रखा है। नाभिकीय ऊर्जा कि सुरक्षा को लेकर मेरी गंभीर आशंकायें हैं। अब जब कि यह मेरे घर के पिछवाड़े ही लगाने जा रहा हैं, मेरी आशंकायें कई गुना बढ़ गयी हैं। जो व्यक्ति ऐसी तकोनोलोजी से प्रभावी होने वालों में शामिल हो उसके मन में ऐसी आशंकायें होना स्वाभाविक है, भले ही कहीं दूर बैठकर लेख लिखने वाले व्यक्ति को, ऐसी आशंकायें किसी “हास्य-विनोद की किताबी कल्पना’’ जैसी लगाती हों।

मैं समझता हूँ कि एनपीसीआईएल ने नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र के स्थान के चारों ओर बसे लोगों को चेतावनी देने के लिए उस संयंत्र के इर्द-गिर्द एक जोनिंग प्रणाली स्थापित की है। मैं समझता हूँ कि, ”वर्जित क्षेत्र“, ‘‘विकिरण मुक्त किया गया क्षेत्र” और “आपातकालीन जाँच-पड़ताल क्षेत्र’’ उस संयंत्र के घेरे से 16 किलोमीटर दूर तक फैला हुआ है। श्रीकाकुलम मे रह रहे मेरे परिवार को अभी तक यह सब नहीं बताया गया है। शायद, प्रभावित होने वाले सिरे पर स्थित लोगों को इसकी सूचना देने से पहले ही एनपीसीआईएल संयंत्र के पूरा हो जाने कि प्रतीक्षा कर रहा है। आपका लेख निश्चय ही इस बात पर कूटनीतिक चुप्पी साधे हुए है। शायद एनपीसीआईयल ऐसे तुच्छ तथ्यों को तूल देना नहीं चाहता हो!

आपकी प्रतिष्ठा को ध्यान मे रखते हुए, मैंने आपके लेख को बहुत ही सावधानी से पढकर यह समझने की कोशिश की कि कोव्वाडा “नाभिकीय पार्क“ के बिलकुल नजदीक रहने वाला खुद मैं, कितना सुरक्षित रह पाऊँगा।  एनपीसीआईएल ने इस संयंत्र को “स्वच्छ“ और “हरित” दिखाने के लिए उसे कितना खूबसूरत नाम दिया है- “नाभिकीय पार्क।"

एक स्थान पर, आपने निम्नलिखित दावा करने कि कृपा की है। 

"नाभिकीय बहस के इर्द-गिर्द एक अन्य दलील यह है कि नाभिकीय दुर्घटना और उसके बाद होने वाला विकिरण केवल उसकी चपेट मे आनेवाली पीढ़ी को ही नुकसान नहीं पहुँचायेगा, बल्कि आनेवाली पीढ़ियों पर भी अपना घातक प्रभाव डालता रहेगा। अगर केवल अटकलबाजी और हास्य-विनोद की किताबी कल्पना की तुलना मे उपलब्ध तथ्यों और वैज्ञानिक जाँच-पड़ताल को ज्यादा महत्त्व दिया जाय , तो यह दलील हर तरह से एक मिथक साबित होगी।"

इस तरह का बयान देने से पहले निश्चित तौर पर आपने इस विषय पर उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य के सारे स्रोतों  की छानबीन की होगी। मुझे यकीन है कि आपने ऐसा जरूर किया होगा। मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ कि अनुभव और अटकलबाजी की तुलना में वैज्ञानिक जाँच-परख को ज्यादा महत्त्व दिया जाना चाहिए। लेख का एक-एक वाक्य पढ़ने के बाद मैं निम्नलिखित चिंताओ का निवारण करने मे असमर्थ रहा हूँ, जो अब भी मेरे दिमाग को मथ रही है।

1- आपने नाभिकीय तकनोलोजी की  सुरक्षा से जुड़े मसलों को महज अटकलबाजी कहते हुए दरकिनार कर दिया। लेकिन क्या आपने नाभिकीय संस्थापन से यह पूछने का प्रयत्न किया कि एनपीसीआईएल ने हरेक मौजूदा नाभिकीय संयंत्र के भीतर किसी खास अवयव में खराबी आने के चलते पैदा होने वाली यांत्रिकी की गड़बड़ी से होने वाली दुर्घटना की जटिल सम्भावना का अनुमान लगाने के लिए कभी विश्वस्त अभियांत्रिकी सम्बन्धी अध्ययन कराया? यदि ऐसा नहीं हुआ, तो क्या आप केवल कुछ एक दुर्घटनाओं के अपने मूल्यांकन के आधार पर, जो पिछले कुछ दशकों में घटित हुई हैं, इस निष्कर्ष तक छलांग लगा सकते हैं कि दुर्घटना होने कि संभावना नगण्य है? क्या इस तरह का निष्कर्ष जो अत्यन्त कृत्रिम नमूने पर आधारित हैं और सांख्यिकी के लिहाज से बेहद कमजोर  हैं,  भ्रामक अनुमान की ओर नहीं ले जाता?

2- आपने कृतज्ञतापूर्वक यह स्वीकार किया है कि विकिरण से प्रभावित होने और कैंसर के खतरे में कुछ सह-सम्बन्ध है। फिर भी आपने रेडीयोएक्टिविटी के दूरगामी हानिकारक प्रभावों की सम्भावना, विशेषकर मानव कोशिकाओं पर इसके दुष्प्रभाव को कम करके आंका है। क्या संयोगवश आपने इस विषय पर उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य कि विस्तृत जाँच-पड़ताल की? क्या आप पूरे आत्म-विश्वास से इस तथ्य को नकार सकते हैं कि लघु-तीव्रता और उच्च-तीव्रता के विकिरण का मानव स्वास्थ्य पर सम्भावित प्रभाव, अनुवांशिकी प्रभाव सहित, के बारे में वैज्ञानिक ज्ञान में भारी अंतर है? लघु-तीव्रता तक के विकिरण का भी मानव कोशिकाओं पर सम्भावित खतरे एक उदाहरण के तौर मैंने एक लेख संलग्न किया है जो कुछ दिनों पहले ‘द हिन्दू’ में उसी तरह छपा था, जिस तरह आपका यह लेख इस प्रतिष्ठित समाचार-पत्र  में छपा था। मुझे उम्मीद है कि आपने स्वास्थ्य पर विकिरण के प्रभाव के बारे में दावे के साथ कहने से पहले वैज्ञानिक साहित्य का सावधानी से अध्ययन किया होगा।

3- नाभिकीय तकनोलोजी के सकारात्मक पहलुओं पर वाक्पटुता के बावजूद आपने इसके नकारात्मक पहलुओं की पूरी तरह अनदेखी की है। मैं इसके कारणों को समझ सकता हूँ। तकनोलोजी के अनेक मामलों में, तकनोलोजी संस्थाएँ, अपनी तकनोलोजी को आगे बड़ाने की बेचैनी में, कीमतों का कम, लेकिन फायदों का अधिक आंकलन करती है। लोक-नीति के मामले में किसी भी व्यक्ति को अनिवार्य रूप से इसके प्रति हमेशा सतर्क रहना चाहिए।

4- क्या आपने अब तक बन्द हुए किसी नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र के आधार पर किसी नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र को बंद करने की कीमत का अनुमान लगाने का प्रयत्न किया? आपने “अवसर लागत“ के बारे मे तो बताया है, लेकिन क्या आपने लम्बे समय तक संचित होने वाले रेडीयोएक्टीव कचरे के प्रबंधन की लगत का भी आंकलन का प्रयास किया? क्या आप जानते हैं कि इसकी लागत कितनी अधिक होगी यह आंकलन लगाना मुश्किल है? चेर्नोबिल को बन्द करने की कीमत का आंकलन कभी नहीं हो पायेगा, क्योंकि उसे कभी भी बन्द नहीं किया जा सकेगा। रूस सरकार दूषित चेर्नोबिल रिएक्टर के चारों तरफ विदेशी वित्तीय सहायता से पत्थर का एक विराट ताबूत बना रही है! फुकुशिमा की क्या कीमत चुकानी पड़ी, आज तक किसी को नहीं पता।

5- आपने ऊर्जा और अर्थव्यवस्था के बीच के सम्बन्धों की बात कही हैं। इस मामले मे आपके विवेक पर सवाल खड़ा करने में मुझे हिचकिचाहट हो रही है। हालाँकि मैं सुनिश्चित नहीं हूँ कि आप ऊर्जा और आर्थिक विकास के ऊपर कुशलता सुधार, माँग प्रबंधन और दूसरे उपायों के प्रभाव से अवगत हैं या नहीं। मुझे उम्मीद है कि इस विषय पर आपने इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइन्स के प्रो. अमूल्य रेड्डी से, जब वे जीवित थे, आपको इस विषय पर बातचीत का अवसर मिला होगा। मैं अपने पूरे सामर्थ्य से आपको पेंगुइन प्रकाशन के लेखक एमोरी बी लोविंस की किताब “सॉफ्ट इनर्जी पाथ्स: टुवार्ड्स ए ड्यूरेबल पीस“ पड़ने की सलाह देता हूँ। इस विचारोत्तेजक किताब को पड़कर बहुत लाभान्वित हुआ हूँ।

श्री कलाम, इस पत्र को लिखने का मेरा मकसद किसी भी तरीके से आपके लेख में खोट निकालना नहीं, बल्कि अपनी सच्ची मानवीय चिंताओं को प्रकट करना है। आप एक विद्वान लेखक हैं। लेकिन मेरी जगह बैठे किसी व्यक्ति के लिए या मौजूदा नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र के आस-पास बसे लोगों के लिए जो बात महत्त्वपूर्ण है, वह पूर्व-कल्पित धारणा पर आधारित लेख नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित तर्क है। मैं भयभीत हूँ कि आपका लेख जितने जवाब नहीं देता उससे ज्यादा सवाल खड़े करता है।

सादर,
आपका,
डॉ. ई. ए.एस. शर्मा
पूर्व सचिव(विद्युत),भारत सरकार
पूर्व सलाहकार(ऊर्जा ),योजना आयोग
विशाखापट्टनम (दिनांक 6-11-11)


अंग्रेजी मे मूल लेख पढने के लिए इस लिंक पर क्लीक करें-