Sunday, December 4, 2011

डरबन जलवायु सम्मेलन : अडंगेबाज देशों की धींगामुश्ती

                                                             - माइकल जैकोब्स

(क्वेटो सम्मेलन से लेकर कोपेनहेगन और अब डरबन में भी जलवायु वार्ताओं के दौरान साम्राज्यवादी देशों का रवैया टालमटोल रहा है. जिन देशों ने का बेपनाह दोहन करके उसे कबही की गर्त में धकेल दिया, वे अरब उसे बचने के नाम पर आनाकानी कर रहे हैं. और पूरी मानवता का विनाश करने पर आमादा हैं. जहाँ एक-एक दिन भरी पद रहा हो वहाँ ये साल डर साल की मोहलत लेना कहते हैं. इसी सम्बन्ध में प्रस्तुत है यह लेख.)
डरबन में जलवायु सम्मेलन का विरोध
मनोवैज्ञानिकों ने जब ज्ञान-वैषम्य (cognitiv dissonance) की परिघटना, यानी एक ही समय दो परस्पर बातों पर यकीन करने की क्षमता को पहचाना तो शायद वे अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन समझौतों की व्याख्या कर रहे थे.
केवल इसी महीने, दो आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने ध्यान दिलाया है कि दुनिया के पास अब कुछ ही वर्ष बचे हैं जिसके भीतर खतरनाक ग्लोबल वार्मिंग से लड़ने के लिए पर्याप्त कार्रवाई शुरू कर देनी होगी.
संयुक्त राष्ट्र संघ पर्यावरण कार्यक्रम ने कार्बन उत्सर्जन की खाई पाटने सम्बंधी जो रिपोर्ट प्रस्तुत की है उसके अनुसार अगर सभी देश 2020 तक अपने उत्सर्जन लक्ष्यों को अधिकतम सीमा तक लागू कर दें, तब भी कुल उत्सर्जन उस लक्ष्य से अधिक होगा, जो संयुक्त राष्ट्र संघ ने ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक न बढ़ने देने के लिए निर्धारित किया है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि यदि उत्सर्जन की इस खाई को पाटना है तो और भी आगे बढ़कर कार्रवाई करने की जरूरत है.
इसी समय अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने चेतावनी दी है कि अब दुनिया के पास पेट्रोलियम पदार्थों की जगह कम कार्बन उत्सर्जन वाली ऊर्जा का इस्तेमाल और ऊर्जा कुशलता की दिशा में गंभीर शुरुआत करने के लिए केवल पांच वर्ष का समय है. 2017 तक जरुरी निवेश करने में असफलता, भविष्य में अत्यधिक उत्सर्जन की जकड़बंधी को इस हद तक पहुंचा देगी कि 2 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य हासिल करना असंभव हो जायेगा.
इसके बावजूद डरबन में संयुक्तराष्ट्र जलवायु वार्ता में शामिल प्रतिनिधि इस बात पर तर्क-वितर्क कर रहे हैं कि नए दौर की समझौता-वार्ताएँ 2015 से पहले शुरू हो भी पाएंगी या नहीं. कुछ देश तो लगता है कि 2 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को ही कूड़ेदान में फेंक देना चाहते हैं, भले ही वे इस पर सहमति जताने का शब्दजाल फैलाते हों.
अलग-अलग देश अपने निकम्मेपन को छुपाने के लिये गड़े गए इस झूठे आरोप के आधार पर अपना दृष्टिकोण तय कर रहे हैं की जलवायू वार्ताएँ हमेशा ही विकसित बनाम विकासशील देशों के मुद्दे पर जाकर अटकती रही है. इस तर्क-वितर्क के एक छोर पर वे देश हैं जो जलवायु परिवर्तन के आगे सबसे अधिक लाचार हैं- छोटे द्वीप और अल्प विकसित राष्ट्र और यूरोपीय संघ. ये देश चाहते हैं कि नए वैधानिक सहमति  को लेकर समझौते की शुरुआत अगले साल हो जाये, 2015 तक निष्कर्ष निकल आये और उसके बाद जितनी जल्दी संभव हो, उन्हें लागू कर दिया जाये (यूरोपीय संघ ने कहा है कि हद से हद 2020 तक). दूसरा छोर जो इस बात की वकालत कर रहा है कि नयी वार्ताएँ 2015 के बाद ही शुरू होनी चाहिए, वह परंपरागत विकसित देशों में फिसड्डी रहे- अमरीका, कनाडा, रूस और जापान तथा दो बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं चीन और भारत का एक असंभव सा गठजोड़ है.
डरबन में जलवायु सम्मेलन का विरोध
देर करने वाले दलील देते हैं कि एक नए चरण की वार्ताएँ करने का अभी समय नहीं आया है. एक साल पहले कानकुन में अंतिम दौर की वार्ता समाप्त होने के बाद, आज की प्राथमिकता उन निर्णयों को लागू करना है जिन पर सहमति बनी है. उनका कहना है कि देशों ने अभी-अभी तो अपने घरेलू उत्सर्जनों में कटौती की योजनाएँ लागू करना शुरू किया है. इनमें से अधिकांध देश निम्न कार्बन और हरित विकास की नीतियों को अपनाने के लिए जूझ रहे हैं, इसलिए वे नए समझौतों के बारे में सोचने के लिए तैयार नहीं हैं.
मौजूदा आर्थिक वातावरण में 2020 के लिए नयी वचनबद्धता पर सहमति की सम्भावनाएं लगभग नहीं के बराबर हैं. तर्क यह दिया गया है कि संयुक्तराष्ट्र 2013-15 में होने वाले 2 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य की समीक्षा के लिए पहले ही वचनबद्ध है जो उसके बाद के नए समझौतों के लिए उपयुक्त आधार प्रदान करेगा (एक भारतीय प्रतिनिधि ने डरबन में कहा कि इस बात का फैसला करने के लिये कि क्या तथ्यत: कोई उत्सर्जन की खाई है भी या नहीं, 2014 में इंटर गवर्मेंट पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की 2014 में अपनी अगली रिपोर्ट आने तक दुनिया को इंतजार करना चाहिये.) देर करने वाले समूह में शामिल कई देशों के लिए ये तर्क-वितर्क केवल इस बात को ढकने का बहाना भर है कि वे किसी नयी वैधानिक सहमति के लिए बिलकुल ही तैयार नहीं हैं.
क्वेटो को नकारने वाले (अमरीका, जिसके साथ अब कनाडा भी जुड़ गया) किसी भी तरह अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी के बंधन को नापसंद करते हैं, जबकी चीन और भारत उस तारीख को टालकर आगे बढ़ाने की माँग कर रहे हैं, जिस दिन से ये समझौते लागू होने हैं. हालाँकि इस बात का जवाब किसी के पास नहीं कई कि जिस 2 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य को सबने गले लगाया, उसे देर करते जाने पर कैसे हासिल किया किया जा सकता है.
सच तो यह है कि इस बात को लेकर ‘तत्काल वार्ता शुरू करो’ खेमे के भीतर भी असहमति है. छोटे द्वीप और अल्पविकसित देश चाहते हैं की कोई भी अवधि केवल अगले पांच वर्ष (2013-17) तक बढ़ायी जानी चाहिये और नए चरण के लक्ष्य 2018 में शुरू हो जाने चाहिये. लेकिन यूरोपीय संघ को अपने घरेलू जलवायु नीतियों के विशाल और नाजुक ढांचे को दुबारा शुरू करने से नफ़रत है जो सभी 2020 से जुड़े हुए हैं. उन्हें भय है कि इन्हें कड़ा करने के बनिस्बत सुलझा लेने की सम्भावना अधिक है.
यह तय है कि समाधान इस बात में निहित है कि 2013-15 के लिए निर्धारित संयुक्त राष्ट्र समीक्षा, कितनी वृहतर तात्कालिक महत्वाकांक्षा उत्पन्न कर पाती है.
डरबन सम्मेलन में शामिल विभिन्न पक्षों के भीतर इस बात पर अभी तक मतभेद हैं की समीक्षा आखिर क्या बाला है. कुछ इसे महज एक रिपोर्टिंग प्रक्रिया के रूप में देखते हैं कि अलग-अलग देश अपनी वचनबद्धता को लागू करने के लिए क्या कर रहे हैं. लेकिन दूसरे इसे इस आकलन की सम्भावना के रूप में देखते हैं कि 2 डिग्री सेल्सियस वास्तव में सही वैश्विक लक्ष्य है भी या नहीं (छोटे द्वीप की सरकारें चाहती हैं कि यह 1.5 डिग्री सेल्सियस होना चाहिये) और उत्सर्जन में कमी लाने के लिए मिल-जुल कर प्रयास कैसे किया जा सकता है. यह न केवल 2025 और 2030 के लिए नयी वचनबद्धताएं निर्धारित करने की अनुमति देगा- जो निश्चय ही किसी नये लक्ष्य- क्वेटो प्रोटोकॉल के नए संसकरण के लिए आधारशिला का काम करेगी, बल्कि 2020 के लिए की गयी वचनबद्धता के लिए मजबूती प्रदान करेगी. इस बात की सम्भावना बहुत ही कम है कि फ़िलहाल कुछ हो पायेगा.
लेकिन 2015 तक, जब हो सकता है कि बदतरीन आर्थिक संकट (शायद) खत्म हो जाये और नयी आईपीसीसी रिपोर्ट एक बार फिर दुनिया को उस खतरे के प्रति आगाह करे जो जलवायु परिवर्तन के चलते उत्पन्न हो रहा है, उम्मीद है की शायद कुछ हो पाए.
(लेखक : माइकल जैकोब्स, लन्दन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में जलवायु परिवर्तन के अतिथि प्राध्यापक हैं.द हिन्दू 3 दिसम्बर 2011 में प्रकाशित. क्लाइमेट टाक्स : ‘डिलेयर कंट्रीज’ फ्लेक्स मसल्स का हिन्दी अनुवाद)       



Wednesday, November 30, 2011

खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी निवेश की इजाजत : विनाश को बुलावा

 -दिगम्बर
दिल्ली में फेरी-खोमचे वालों का प्रदर्शन : फोटो -द हिन्दू 
मनमोहन सिंह सरकार ने आखिरकार खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी निवेश की इजाजत दे दी। सरकार का यह फैसला इस कारोबार से अपनी रोजी-रोटी चलाने वाले करोड़ों परिवारों के लिए तबाही और बर्बादी का फरमान है। अनेक ब्राण्ड वाले खुदरा व्यापार में पहले विदेशी पूँजी का प्रवेश वर्जित था, वहाँ अब 51 फीसदी पूँजी निवेश के साथ विदेशी नियंत्रण की छूट हो गयी। एक ब्राण्ड वाली दुकानों में विदेशी पूँजी निवेश की सीमा 51 फीसदी थी जिसे हटा कर अब 100 फीसदी पूँजी निवेश की इजाजत दे दी। विपक्षी पार्टियों और खुद अपने ही गठबन्धन के कुछ सहयोगी पार्टियों के विराध को पूरी तरह नजरन्दाज करते हुए सरकार ने यह फैसला मंत्रीमंडल की बैठक में लिया। संसद का सत्र जारी होने के बावजूद उसने इस मुद्दे पर बहस चलाने की औपचारिकता भी पूरी करना भी जरूरी नहीं समझा। सरकार की साम्राज्यवाद परस्ती और विदेशी पूँजी के प्रति प्रेम को देखते हुए यह कोई अचरज की बात नहीं।
खुदरा व्यापार में विदेशी सरमायादारों की हिस्सेदारी और नियंत्रण की पूरी तरह इजाजत देने के लिए सरकार पर लम्बे अरसे से विदेशी दबाव पड़ रहा था। अमरीका और यूरोप में मंदी और संकट के गहराते जाने के साथ ही यह बेचैनी और भी बढ़ती गयी। जॉर्ज बुश की भारत यात्रा के समय दुनिया का विराट खुदरा व्यापारी कम्पनी वालमार्ट का प्रतिनिधि भी यहाँ आया था और दोनों देशों के पूँजीपतियों के साझा प्रतिनिधि मंडल ने उस वक्त सरकार को जो माँगपत्र पेश किया था, उसमें खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी निवेश की जबरदस्त सिफारिश की गयी थी। सरकार उस दौरान ही इसके लिए तत्पर थी। लेकिन अपने गठबन्धन के प्रमुख सहयोगी, वामपंथी पार्टियों के विरोध को देखते हुए इस काम को एक झटके में कर डालना उसके लिए आसान नहीं था। इसी लिए सरकार ने इस एजन्डे को टुकड़े-टुकड़े में और कई चरणों में पूरा करने की रणनीति अपनायी। अनाज और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की थोक खरीद-बिक्री में विदेशी पूँजी लगाने की छूट देना, कोटा-परमिट-लाइसेंस की समाप्ति, वैट लागू करके पूरे देश में बिक्री कर को सरल और समरूप बनाना, सीलिंग के जरिये आवासीय इलाकों से दुकानें हटवाना, छोटे-बड़े शहरों में मॉल, मार्केटिंग कॉमप्लेक्स और व्यावसायिक इमारतों के लिए पूँजीपतियों को सस्ती जमीनें मुहैया कराना और ऐसे ही ढेर सारे उपाय इसी दिशा में उठाये गये कदम हैं। इसी के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के उपभोक्ता वस्तुओं के थोक व्यापार, रखरखाव, भंडारण, कोल्डस्टोरेज, फूड प्रोसेसिंग, माल ढुलाई और आपूर्ति जैसे खुदरा व्यापार के लिए जरूरी और सहायक कामों में सरकार ने सौ फीसदी विदेशी पूँजी निवेश की पहले ही इजाजत दे दी थी।
सरकार की इन्हीं मेहरबानियों का लाभ उठाते हुए दैत्याकार अमरीकी बहुराष्ट्रीय खुदरा व्यापारी वालमार्ट के 2006 में सुनील मित्तल की कम्पनी भारती इन्टरप्राइजेज के साथ गठजोड़ करके भारत के बाजार में दाखिल होने का ऐलान किया था। चूंकि खुदरा दुकान खोलने की इजाजत विदेशी कम्पनी को नहीं थी। इसलिए वालमार्ट को पृष्टभूमि में रहकर आपूर्ति और अन्य जिम्मेदारियाँ निभानी थी। इन देशी-विदेशी सरमायादारों ने आजादी की 60वीं वर्षगाँठ पर 15 अगस्त 2007 को ही देश के विभिन्न शहरों में लगभग 100 खुदरा बिक्री केन्द्रों की शुरूआत करने का फैसला लिया था।
लगभग पाँच वर्ष पहले ही वालमार्ट ने भारत में अपना बिजनेस डेवलमेन्ट एण्ड मार्केट रिसर्च ऑफिस खोला था। इसका मकसद भारत के खुदरा व्यापार में मुनाफे का अनुमान लगाने के अलावा यहाँ नेताओं, मंत्रियों, आला अफसरों, अर्थशास्त्रिायों और मीडिया से तालमेल बिठा कर खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना था। साथ ही, अमरीकी सरकार भी भारत सरकार पर लगातार इसके लिए दबाव देती रही। इन सारी बातों को देखते हुए सरकार का यह फैसला कोई अप्रत्याशित नहीं।
भारत का कुल खुदरा व्यापार लगभग 25,00,000 करोड़ रुपये है जिसमें भारी हिस्सा छोटे-बड़े किराना दुकान, फड-खोखा, ठेला-खोमचा, हाट-व्यापार या फेरी वालों का है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण 2009-10 के अनुसार थोक और खुदरा व्यापार में 4 करोड़ 40 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है जो कुल श्रमशक्ति के 10 फीसदी से भी अधिक है। इनमें से बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो स्वरोजगार में लगे हुए हैं। इन लोगों की रोजी-रोटी छीनने के लिए तेजी से फलफूल रहे खुदरा व्यापार पर पहले ही बड़ी कम्पनियों के मेगामार्ट, सुपर बाजार और बडे़ मॉल की घुसपैठ शुरू हो गयी थी। पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में मित्तल, अम्बानी, टाटा, बिड़ला जैसे इजारेदार घरानों की दिलचस्पी काफी बढ़ी है। इसके बीच कई खुदरा कम्पनियों के विलय और गठजोड़ भी हुए हैं।
खुदरा व्यापार में भारी मुनाफे के लोभ में पिछले कुछ वर्षों से हर छोटे-बड़े शहर में पुराने ढर्रे की दुकानों की जगह चमक-दमक वाले मेगा मार्ट और डिपार्टमेंटल स्टोर खुलने लगे। सुभेक्षा, स्पेंसर, बिग बाजार, विशाल मेगामार्ट, त्रिनेत्र और सुपर रिटेल जैसी संगठित खुदरा व्यापार कंपनियों की भारी कमाई को देखते हुए कई दूसरे इजारेदार घराने भी इस दौड़ में शामिल होने लगे. छोटी पूंजी और अपने परिवार की मेहनत से रोजी-रोटी चलानेवाले छोटे दुकानदारों को उजाड़ने के लिए तो अरबों-खरबों की पूंजी लेकर अखाड़े में उतरने वाले देशी सरमायेदार ही काफी थे. अब खुदरा व्यापार पर निर्भर लोगों को निगलने के लिए सरकार ने खुद अपने ही देश में ‘बेन्तोविले का दानव’ नाम से कुख्यात वालमार्ट जैसी विदेशी कंपनियों को भी बुला लिया.
पांच साल पहले वालमार्ट और भारती के बीच गठजोड़ के बाद खुदरा व्यापार क्षेत्र में पांव पसारने के लिए भारत के बड़े पूंजीपतियों की सरगर्मी को देखते हुए यह लगभग तय था कि सरकार इसे विदेशी पूंजी निवेश के लिए खोल देगी. टाटा ने आस्ट्रेलिया की कंपनी बुलवर्थस् के साथ गठजोड़ करके क्रोमा नाम से खुदरा दुकानों की शृंखला शुरू की. अम्बानी ने भी रिलाएंस फ्रेश के नाम से खुदरा चेन शुरू की तथा शुभेक्षा, अदानी और अन्य खुदरा कंपनियों के अधिग्रहण का प्रयास किया. पेंटालून रिटेल के किशोर बियानी ने 2007 में 100 नए बिग बाजार खोलने की घोषणा की थी. बिडला ग्रुप ने 172 सुपर बाजारों के मालिक त्रिनेत्र कंपनी का अधिग्रहण किया था. दूसरी ओर केयरफोर, मेंट, मेट्रो और टेस्को भी भारत में अपने संश्रयकारी (कोलेबोरेटर) की तलाश करने में मशगूल थे और उनकी आड़ में अपनी दुकानें भी खोल रहे थे.
मॉल और सुपर बाजार का फैलता जाल 
विदेशी बहुराष्ट्रीय खुदरा कंपनियों के मुनाफे का बड़ा हिस्सा विदेशी कारोबार से आता है. 2007 में अमरीकी कंपनी वालमार्ट का विदेशों से आनेवाला मुनाफा 379 अरब डॉलर था जो भारत के कुल खुदरा व्यापार से भी ज्यादा और भारत के सकल घरेलु उत्पाद के एक चौथाई के बराबर बैठता है. भारतीय पूंजीपति इन विराट पूंजी और तकनोलोजी के मालिक कंपनियों के साथ साझेदारी करके अपने देश की लूट में हिस्सा पाने को लालायित हैं.
दुनिया का अनुभव बताता है कि जिन देशों में इन दैत्याकार कंपनियों ने अपना कारोबार फैलाया वहाँ अपनी भारी-भरकम पूंजी और अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति पर इजारेदारी के दम पर खरीद, भण्डारण और वितरण में लगे आपूर्ति शृंखला के तमाम बिचौलियों को तबाह कर दिया. उनके भारी मुनाफे का राज यही है. देशी बिचौलियों को समाप्त करने के बाद उन कंपनियों ने एक तरफ छोटे-मझोले उत्पादकों और दूसरी ओर विशाल उपभोक्ता समूह को दोनों हाथों से लूटना शुरू किया. हमारे देश में पहले ही खेती में घाटा उठाकर आत्महत्या कर रहे किसानों और महँगाई की मार झेल रहे उपभोक्ताओं के ऊपर इस सरकारी फैसले का क्या असर होगा, इसे समझने के लिए हमें मनमोहन सिंह या मोंटेक सिंह अहलुवालिया जितना अर्थशास्त्र पढने की जरुरत नहीं है.
वे हमें बताना चाहते हैं कि विदेशी खुदरा व्यापार कम्पनियाँ यहाँ एक करोड नए रोजगार पैदा करेंगी. वे यह नहीं बताते कि इसकी कीमत उन साढ़े चार करोड़ परिवारों को चुकाना पड़ेगा जिनकी जीविका उन कम्पनियों के आते ही दाँव पर लग जायेगी. ऊँची तकनीक और कम मजदूर रखनेवाली इन कंपनियों का रोजगार के मामले में क्या रिकार्ड है, इसे वालमार्ट के उदहारण से ही समझा जा सकता है. दुनिया के 14 देशों में वालमार्ट के 6200 मेगामार्ट हैं जिनमें 16 लाख लोग काम करते हैं और भारत के कुल खुदरा व्यापारियों के बराबर कमाई करके वालमार्ट को देते हैं. जाहिर है कि ये कम्पनियाँ कुछ लाख लोगों से ही अपना सारा काम करवाएँगी और पहले से रोजगार में लगे करोड़ों लोगों को सडकों पर फेंक देंगी.
अपने ही देश अमरीका में वालमार्ट एक बदनाम कंपनी है जहाँ इसके खिलाफ मुकदमें, विरोध और प्रदर्शनों का सिलसिला चलता ही रहता है. न्यू यार्क और लॉस एंजेल्स के स्थानीय लोगों के विरोध के चलाते वहाँ आज तक उसकी एक भी शाखा खुल नहीं पायी. इंडोनेशिया में वालमार्ट द्वारा उजाड़े गये दुकानदारों ने लगातार उसके ऊपर हमले किये जिसके बाद कंपनी को वहाँ से अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा.
खुदरा व्यापार में उतरने वाले देशी-विदेशी सरमायादारों की प्राथमिकता उत्पादन बढ़ाना और उसका स्तर सुधारना नहीं है. उनका मकसद यहाँ रोजगार के अवसर पैदा करना भी नहीं है. उनकी निगाह 5 करोड़ उच्च मध्यवर्ग और उससे निचले पायदान पर खड़े 10 करोड़ मध्य वर्ग कि ओर लगी है जिन्हें रिझाने के लिए वे वितरण और विक्री की व्यवस्था को अत्याधुनिक और आकर्षक बनाने में लगे हैं. इसीलिए उन्होंने मध्यवर्ग की कुल संख्या, उसकी खरीद क्षमता, अभिरुचियों और जरूरतों पर ढेर सारे शोध और अध्ययन करवाए हैं. इन्हीं मुट्ठी भर लोगों कि माँग के अनुरूप वातानुकूलित मॉल में सजी-धजी चीजें उपलब्ध करने में उनकी दिलचस्पी है. देश की आम जनता जो खरीदने की क्षमता न होने के चलते बाजार की परिधि से बाहर है, वह उनकी कार्यसूची से भी बाहर है.
अमरीका में वालमार्ट के खिलाफ प्रदर्शन  : फोटो -अर्थ फर्स्ट  
ईस्ट इण्डिया कंपनी ने भारत में आने के बाद यहाँ के मुट्ठी भर विश्वासघाती लोगों के साथ दुरभिसंधि करके षड्यंत्रों के जरिये इस देश को गुलाम बनाया था. नयी गुलामी के वर्तमान दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने उस पुरखे को भी मत दे दी है. भारत में प्रवेश से पहले ही उन्होंने यहाँ की सरकार और सरमायादारों के साथ मिलकर षडयंत्रकारी तरीके से अपने अनुकूल कायदे-कानून बनावा लिये. सरकार की पूरी राज मशीनरी उनकी हिफाजत के लिए मुस्तैद है.
लेकिन विदेशी खुदरा व्यापारियों के लिए भारत में पांव पसारना निरापद नहीं. 22 फरवरी 2007 को, जब वालमार्ट का प्रतिनिधि-मंडल खुदरा व्यापार में उतरने की अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने भारत आया था, तब दिल्ली, मुंबई और बंगलुरु सहित देश के कई शहरों में खुदरा व्यापारियों, फेरी-खोमचा-ठेले वालों, व्यापारी संगठनों और कई संगठनों ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किये थे. दिल्ली के वाणिज्य मंत्रालय की तरफ कूच करते प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया था. हालांकि प्रतिरोध अभी काफी कमजोर है और राजनीतिक पार्टियों का रुख भी औपचारिक और ठंडा है, लेकिन हालात ऐसे ही नहीं बने रहेंगे. आखिर कोई तो हद होगी? लोग कब तक चुपचाप बैठे अपनी बर्बादी का तमाशा देखते रहेंगे?