Monday, March 12, 2012

जाति में जकडे रहना भारत की नियति नहीं

आंद्रे बताई
जो लोग अखबारों और टीवी चैनलों पर सामायिक मुद्दों के ऊपर चर्चा करते रहते हैं, वे अगर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जाति भारत की नियति है, तो उन्हें माफ़ कर देना चाहिए. राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी करनेवाले मीडिया विशेषज्ञों के बीच अगर किसी बात में समानता है तो बस यही कि जाति के विषय में और चुनावी राजनीति में उसकी भूमिका की ओर ध्यान आकृष्ट करने में वे हमेशा लवलीन रहते हैं.
बहुतेरे लोग अब यह यकीन करने लगे हैं कि देश में हो रहे जनसंख्या सम्बंधी, तकनीकी और आर्थिक बदलावों से तो इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन फिर भी जातियों और समुदायों में बंटे होना भारतीय समाज का अनिवार्य चरित्र है और इसे मिटा पाना असंभव है. उनका यह भी मानना है कि इन बंटवारों को नजरअंदाज करना या आमदनी, शिक्षा और पेशा जैसे दूसरे बंटवारों की ओर ध्यान दिलाना जमीनी सच्चाइयों से मुँह चुराना है. उनमें से जो कुछ ज्यादा ही रेडिकल हैं, वे यह भी जोड़ देते हैं कि इन सच्चाइयों की अनदेखी करना, दरअसल समाज के फायदे और जिम्मेवारियों का इंसाफ और बराबरी के साथ बंटवारे की राजनीतिक जिम्मेदारी से टालमटोल करना है.
क्या भारत में कुछ भी नहीं बदला है? वास्तव में पिछले साथ सालों के दौरान हमारी राजनीतिक अवधारणा और सामाजिक यथार्थ दोनों ही मामलों में ढेर सारे बदलाव हुए हैं. राष्ट्रीय आंदोलन के जिन नेताओं ने उपनिवेशिक शासन से भारत की स्वतंत्रता के लिए सफलतापूर्वक संघर्ष किया, उनका विश्वास था कि अतीत में भारत भले ही जातियों और समुदायों में बंटा समाज था, लेकिन नए गणतांत्रिक संविधान को अंगीकार कर लेने के बाद यह नागरिकों का राष्ट्र बन जाएगा. वे अत्यंत आशावादी थे. संविधान ने नागरिकों के अधिकारों को स्थापित किया, लेकिन इसने जिन नागरिकों का सर्जन किया उनके दिलों और दिमागों से जाति का निर्मूलन नहीं किया. कई भारतीयों का, शायद अधिकांश लोगों का दिली मिजाज़ आज भी उंच-नीच में बंटे समाज का ही मिजाज़ है.
आपसी खान-पान के नियम
सार्विक वयस्क मताधिकार ने जाति के आधार पर चुनावी समर्थन जुटाने की नयी सम्भावनायें पैदा कीं और इस तरह जातिगत चेतना को समाप्त होने से रोका. लोकतंत्र से अपेक्ष थी कि यह जातिगत भेदभाव को नष्ट कर देगा, लेकिन इसके परिणामस्वरूप जो उम्मीद थी, उससे उलते ही नतीजे सामने आये. लोकतंत्र में राजनीति किसी देश के जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है, लेकिन यह उसका एकमात्र अंग नहीं है. जीवन के दूसरे क्षेत्र हैं जिनमें जातिगत चेतना निस्तेज होती गयी है, भले ही बहुत तेजी से और नाटकीय रूप में न हुई हो. बदलाव की जिस रुझान के बारे में हम आगे चर्चा करेंगे उस ओर मीडिया का ध्यान नहीं गया क्योंकि यह बदलाव लंबे समयांतराल में घटित हुआ. इसे महीने-महीने या साल दर साल देख पाना मुमकिन नहीं, बल्कि दो या दो से अधिक पीढ़ियों के दौरान ही इसे महसूस किया जा सकता है.
हम पवित्रता और अपवित्रता के कर्मकांडी विरोध से ही शुरू करें, जो जातियों के ऊँच-नीच में बंटवारे की एक बुनियाद थी. पवित्रता और अपवित्रता के नियम जातियों और उपजातियों के भीतर भेदभाव और श्रेणी-विभाजन को चिन्हित करने में काम आते थे. इनमें से कुछ लक्षण आपस में घुलने-मिलने और एक साथ खाने-पीने से सम्बंधित थे.  उन्हीं से तय होता था कि कौन किसके साथ खाने की पंगत में बैठ सकता है और किनके हाथ का खाना और पानी ले सकता है. केवल बराबर दर्जे वाली जातियों के लोग ही एक पंगत में खा सकते थे. आम तौर पर लोग अपने से ऊँची जाति के लोगों के हाथ से ही खाना और पानी लेते थे, अपने से नीची जाति के हाथ से नहीं.
भोजन की लेन-देन के बारे में शास्त्रीय विधि-निषेध कठोर थे और अब से सौ साल पहले तक जारी थे. इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि उन विधि-निषेधों का लगातार क्षरण हुआ है. जीवन और कार्य की आधुनिक परिस्थितियों ने इनमें से बहुतेरों को लुप्तप्राय बना दिया. पवित्रता और अपवित्रता के अतिरेक को कोलकाता और दिल्ली जैसे शहरों में रहनेवाले पढ़े-लिखे लोग मजाक का विषय समझते हैं. कॉलेज कैंटीन या ऑफिस के भोजन कक्ष में इस तरह के नियमों का पालन करना असंभव है. सार्वजनिक आयोजनों में लोगों को अपनी-अपनी जाति के अनुसार बैठने पर जोर देना आज शर्मनाक घटना मानी जायेगी.
अतीत में, जाति के नियमों के मुताबिक एक-दूसरे के साथ खाने-पीने और शादी-विवाह करने पर लगाये गए रोक का सीधा सम्बंध था. शादी पर रोक अभी समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन कुछ हद तक इसमें ढील आई है. हिंदुओं में, अंतरजातीय विवाह पर पहले क़ानूनी रोक था. अब वह कानून तो बदल गया, लेकिन जाति के भीतर शादी करने का रिवाज आज भी भारी पैमाने पर देखा जा सकता है. हालाँकि हो यह रहा है कि शादी तय करते समय अन्य बातों के आलावा शिक्षा और आमदनी को भी दिमाग में रखा जा रहा है. बहरहाल, यह बहस करना काफी कठिन है कि पिछले कुछ दशकों से वैवाहिक मामलों में जातिगत चेतना उठान पर है.
राजनीति में, मीडिया में
जाति और पेशे के बीच एक आम जुडाव इस हद तक अभी जारी है कि निम्नतम जातियों के लोग बड़े पैमाने पर घटिया और कम मजदूरी वाले कामों में लगे हैं, जबकि उपरी जाति के लोगों का झुकाव अच्छी आमदनी और सर्वोत्तम पेशों की ओर है. लेकिन जाति और पेशे के बीच का संबंध, जमीन और अनाज की परंपरागत अर्थव्यवस्था की तुलना में आज कहीं ज्यादा लचीला है. तेज आर्थिक विकास और माध्यम वर्ग के विस्तार के साथ-साथ व्यक्तिगत अवसर की गतिशीलता ने जाति और पेशे के बीच के संबंध को और अधिक ढीला किया है.
इन सब के बावजूद, अगर जनता की चेतना पर जातिगत जकडबंदी न सिर्फ कायम है, बल्कि मजबूत होती जा रही है, तो इसके निश्चित कारण हैं. यह कारण संगठित राजनीति के क्षेत्र में देखा जा सकता है. राजनीति के अखाड़े में जाति का प्रवेश आज़ादी हे पहले ही हो गया था, खास तौर पर भारतीय उपमहाद्वीप में. लेकिन आज़ादी के बाद सार्विक वयस्क मताधिकार अपनाये जाने के बाद राजनीतिक प्रक्रिया में जाति को घंसीटने का ढंग और दायरा बिलकुल बदल गया.
जातीय चेतना चुनावों के मौके पर आगे लायी जाती है. लोकसभा और विधान सभा के चुनाव अब पूरे साल होते रहते हैं. सामान पहुँचाने और तैयारी से जुड़े दूसरे कारणों से, विधान सभा के चुनाव भी अब कई-कई हफ्ते में पूरे होते हैं. आम चुनावों के आलावा उप-चुनाव भी होते हैं. चुनाव अभियान दिनोंदिन भडकीले और लगातार खर्चीले होते गए हैं और अक्सर वे आनंदोत्सव का वातावरण तैयार करते हैं. जाति के आधार पर चुनावी समर्थन जुटाना एक जटिल परिघटना है जिसके नतीजे बेइंतिहा अटकलों की गुंज़ाइश पैदा करते हैं.
बावजूद इसके कि पूरे देश के लिए चुनावी मौसम का कभी भी अंत नहीं होता, कोई खास मतदाता चुनाव की प्रक्रिया में कभी कभार और छिटपुट रूप से ही भाग लेता है. औसत ग्रामीण मतदाता चुनावी मामलों के बजाय अपने घरेलू मसलों, काम-धाम और पूजा-पाठ में कहीं ज्यादा दिमाग खपाता है. सब को पता है कि शहरों में रहनेवाले भारतीय मतदाता बहुत काम संख्या में वोट देने जाते हैं. लेकिन मतदान केन्द्र तक जाने के लिहाज से भले ही वे चुनाव में भाग नहीं लेते, मगर अप्रत्यक्ष रूप से वे इनमें जरूर भाग लेते हैं, क्योंकि वे टेलीविजन पर देखते रहते हैं कि बाहरी दुनियां में क्या हो रहा है. थोड़ी मात्रा में राजनीतिक शिक्षा के साथ टेलीविजन हमें मनोरंजन की भरपूर खुराक देता है.
निजी टेलीविजन चैनलों ने एक पूरी दुनिया रची है जिसमें उनके संचालक और विशेषज्ञ एक दूसरे के साथ जीवंत संपर्क में रहते हुए “जातिगत घटक” के महत्त्व का लेखा-जोखा लेते हैं तथा उनके टीकाकार जातियों, उपजातियों और जातियों के समूहों के बीच की प्रतिद्वंद्विता और गंठबंधन की खोजबीन करते है, जिनमें से अधिकांश लोगों की देश में दूरगामी बादलावों के रुझान की न तो कोई समझ होती है और न ही उसमें कोई रूचि. ये विचार-विमर्श यह भ्रम पैदा करते हैं कि जाति भारतीय समाज का एक अपरिवर्तनीय लक्षण है. आज जातिगत चेतना को मजबूत करने और हमें इस बात का  कायल बनाने के लिए कि जाति भारत की नियति है, मीडिया में जो कुछ चल रहा है, उसे यदि जारी रहने दिया गया तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा.
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के मानद प्रोफ़ेसर और राष्ट्रिय अनुसन्धान प्रोफ़ेसर हैं. २१ फरवरी के ‘द हिंदू’ में प्रकशित लेख का अनुवाद, आभार सहित.)

Monday, March 5, 2012

किसका है यह विदेशी हाथ


जनसत्ता 5 मार्च, 2012: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परमाणु-विरोधी आंदोलनों के खिलाफ खुली जंग छेड़ दी है। पिछले दिनों जीन-संशोधित खाद्य पदार्थों और परमाणु बिजलीघरों के खिलाफ चल रहे जन-आंदोलनों को उन्होंने देश के विकास में बाधक बताया और यह भी कहा कि इन आंदोलनों  के पीछे ‘बाहरी ताकतों का हाथ’ है। 

कम-से-कम इस बार हम अपने प्रधानमंत्री से पूरी तरह सहमत हो सकते हैं। 

इस मामले में यह समझना जरूरी है परमाणु-विरोधी आंदोलन दरअसल मौजूदा व्यवस्था के बाहर से आती हुई एक आवाज है, जिसका राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक धरातल मनमोहन सिंह के खयालों के इंडिया से बिल्कुल अलग है।

कुडनकुलम के अनपढ़ मछुआरे अगर आवारा पूंजी के कायदों पर आधारित मनमोहन सिंह के भारत में शामिल हो जाएं तो उनकी रोजगार गारंटी योजना में जितना कमाएंगे, आज वे उसका लगभग तीन गुना प्रतिदिन कमाते हैं। इस आंदोलन के सहारे दरअसल एक टिकाऊ सामुदायिक जीवन नवउदारवादी भारत का हिस्सा बनने से मना कर रहा है। यह सब न सिर्फ मनमोहन सिंह के लिए बाहरी है, बल्कि अंतत: उस अर्थशास्त्र के खिलाफ जाता है जिसकी बुनियाद पर हमारे प्रधानमंत्री खडे हैं। 

पिछले साल जैतापुर में तीखे जन-विरोध के बाद लोगों को ‘विश्वास में लेने’ और ‘जागरूक करने’ जैसे नारों के साथ स्थानीय कमिश्नर जब विशालकाय फौज-फाटे के साथ माडबन गांव पहुंचे तो पूरे गांव ने उनकी इस बैठक का बहिष्कार किया। सिर्फ एक बूढ़ी महिला चौक तक आई और उसने अधिकारियों से पूछा- ‘‘बेटा तुम बात करने आए हो तो इतनी बड़ी बटालियन और बंदूकों के साथ क्यों आए हो? तुमको डर किससे लग रहा है?’’ ऐसी निडरता और यह नैतिक गरिमा जाहिर तौर पर मनमोहन सिंह की चौहद्दी से बाहर है। 

हरियाणा के फतेहाबाद जिले में गोरखपुर परमाणु संयंत्र के लिए किसानों को दी जा रही मुआवजा राशि को कई बार बढ़ा कर अब चौंतीस लाख रुपए प्रति एकड़ कर दिया गया है। गोरखपुर और उसके आसपास के गांवों के किसान पिछले दो साल से फतेहाबाद के मिनी सचिवालय पर धरने पर बैठे हैं और जाड़ा-गरमी-बरसात में लगातार इस धरने पर बैठे रहने से तीन किसान अब तक जान गंवा चुके हैं।
  
हरियाणा में इस संयंत्र की योजना बनाने के पीछे सरकार का यही सोच रहा होगा कि इस प्रदेश के किसान अच्छे मुआवजे पर जमीन देने से नहीं कतराते। लेकिन इस महीने हजारों की तादाद में लोग फतेहाबाद में इकट्ठा हुए और उन्होंने अपनी सेहत, सुरक्षा, जीविका और गरिमा की कीमत पर करोड़ों का मुआवजा लेने और जमीन देने से मना कर दिया। हरियाणा के किसानों का यह सरोकार उन लोगों के लिए बाहरी अजूबा ही है जिनकी हसरतों के मुल्क में हर शय बिकाऊ है। 

कुडनकुलम आंदोलन के नेता डॉ एसपी उदयकुमार ने न सिर्फ प्रधानमंत्री पर मानहानि का मुकदमा दायर किया है और मनगढ़ंत आरोपों के लिए माफी मांगने की मांग है, बल्कि उन्होंने इस बात पर हैरानी भी जताई है कि हमारे नीति-निर्माताओं के सोच से यह बात ओझल कैसे हो गई है कि गांधी के इस देश में पूरा आजादी का आंदोलन छोटे-छोटे चंदों और भागीदारियों से लड़ा और जीता गया। सरकारें, कंपनियां और मीडिया तक, अब सिर्फ पैसे की भाषा समझते हैं। डॉ उदयकुमार ने आंदोलन के पूरे खर्च का ब्योरा सार्वजनिक किया है, जिससे पता चलता है कि मछुआरे, किसान और इलाके के आमलोग अपनी कमाई का एक हिस्सा पिछले कई महीनों से आंदोलन को दे रहे हैं। लोगों के आम सहयोग से चल रहे इस संघर्ष में सबकुछ साझा किया जाता है और नकद की जरूरत ही बहुत कम होती है।  

देश की जमीनी सच्चाइयों से सरकार का इस कदर कट जाना, हमारे समाज और लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक है। मीडिया और सरकार को तब परमाणु मामले में विदेशी हाथ नजर नहीं आता जब हिलेरी क्लिंटन यह धमकी देती हैं कि अमेरिका भारतीय संसद में पारित परमाणु दायित्व कानून को नहीं मानेगा और उसकी कंपनियों को हादसे की हालत में पूरी तरह मुक्त रखना होगा। परमाणु करार पर संसद में बहस के वक्त अमेरिकी दूतावास के अधिकारी न सिर्फ खुलेआम अलग-अलग पार्टियों के नेताओं से मिल कर ‘सहमति’ बना रहे थे, बल्कि सांसदों को पैसा पहुंचाने में भी उनका नाम आया था। तब मनमोहन सिंह को विदेशी हाथ नहीं दिखा। लेकिन जापान के फुकुशिमा, रूस के चेरनोबिल और अमेरिका के थ्री-माइल आइलैंड में भीषण परमाणु दुर्घटना झेल चुके लोगों से जब कोई सीखने की बात कहता है तो वह विदेशी हो जाता है। वह भी तब जब इसमें बाहर से पैसा आने जैसी बात पूरी तरह मनगढ़ंत हो। 

कुडनकुलम में रूस-निर्मितरिएक्टर का विरोध करने वाले अगर अमेरिकी पैसे से संचालित हैं तो सरकार इस बात का जवाब क्यों नहीं देती कि फिर यही लोग गुजरात और आंध्र में अमेरिकी रिएक्टरों का, जैतापुर में फ्रांस के रिएक्टरों का और हरियाणा, मध्यप्रदेश में लग रहे देशी रिएक्टरों का भी तो विरोध कर रहे हैं। अभी बिजली की हमारी कुल खपत का सिर्फ ढाई प्रतिशत परमाणु ऊर्जा से आता है जिसे अगले तीस सालों में छह से सात प्रतिशत बढ़ाने की योजना है, जबकि अभी ही नवीकरणीय ऊर्जा हमें दस प्रतिशत से ज्यादा बिजली देती है। पिछले कुछ सालों में अक्षय ऊर्जा की तकनीक उन्नत हुई है, इसके दाम भी काफी कम हुए हैं। इसके उलट, परमाणु ऊर्जा न सिर्फ हर हाल में असुरक्षित है,   बल्कि इसकी लागत भी कई गुना ज्यादा है। 

अमेरिका और यूरोप में परमाणु उद्योग पिछले तीस सालों से मंदी का शिकार रहा है और वहां निजी पूंजी इसके कारोबार से कन्नी काट लेती है। पूरी दुनिया में बिना सरकारी मदद और सबसिडी के अणुऊर्जा उत्पादन असंभव है। खुद विश्व बैंक से लेकर बड़ी-बड़ी बीमा कंपनियां भी परमाणु उद्योग को प्रोत्साहित नहीं करतीं। ऐसे में, फुकुशिमा के बाद अगर परमाणु ऊर्जा क्षमता का विस्तार सिर्फ भारत और चीन में होता दिख रहा है, तो इसका कारण यही है कि इन देशों की सरकारें वैसे भी आमलोगों की मेहनत से जमा सरकारी पूंजी बेतहाशा विकास के नाम पर निजी हाथों में लुटाती हैं। देश के संसाधनों को ऐसे ही औने-पौने दाम पर बेचने के मामले 2-जी से लेकर खनन माफिया तक जुड़ते हैं। 

लेकिन हमारे देश में असली गुनहगारों के बजाय मासूमों को निशाना बनाया जाता है। इस हफ्ते कुडनकुलम के नजदीक स्थित नागरकोयल शहर से रेनर नाम के एक जर्मन पर्यटक को रातोंरात देश से बाहर निकाल दिया गया और अगले कई दिनों तक सरकार और मीडिया हमें यह बताते रहे कि इस व्यक्ति ने आंदोलन को पांच सौ करोड़ रुपए की मदद की। रेनर यूरोपीय जिंदगी


 से थके एक अधेड़ फक्कड़ घुमक्कड़ हैं, जो पिछले चार साल से इस इलाके में आते रहे हैं। सस्ते होटलों में ठहर कर प्रकृति और भारतीय सामुदायिक जीवन का अध्ययन उनका शगल है और पांच सौ करोड़ रुपए उनकी पहुंच से बाहर की बात है। कुडनकुलम आंदोलन ने यह मांग की है कि अगर सरकार को अपनी बात का इतना भरोसा है तो रेनर को आनन-फानन में भगाने के बजाय उन पर मुकदमा क्यों नहीं चलाया गया? 

दरअसल, कुडनकुलम आंदोलन पूरी तरह पारदर्शी और अहिंसक है और सरकार उसे किसी तरह घेर नहीं पा रही है। ऐसी ही कोशिशों में कुडनकुलम में एनजीओ और चर्च की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए, लेकिन इनसे आंदोलन न कभी संचालित होता था न इस सबसे कमजोर हुआ। कुडनकुलम के मछुआरे संयोगवश ज्यादातर ईसाई हैं और जब एक पूरा इलाका आंदोलनरत होगा तो उस आबादी का हिस्सा रही सामाजिक-धार्मिक संस्थाएं भी उसमें स्वत: शामिल हो जाती हैं। लेकिन इसकी आड़ में आंदोलन को चर्च और विदेश से संचालित बताना असली मुद्दों से कन्नी काटना है। कुडनकुलम के लोग सरकार से कोई मदद पाने के लिए नहीं लड़ रहे, बल्कि सिर्फ इतना कह रहे हैं कि वे खुश हैं और उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाय। ऐसे में, आंदोलन का कोई कमजोर सिरा सरकार की पकड़ में नहीं आ रहा है। इस मायने में परमाणु-विरोधी आंदोलन बिल्कुल अलग है कि इसने विकास की मौजूदा तर्कपद्धति पर सबसे तीखा हमला किया है और जहां मजदूर आंदोलन ताकतवर होने के बावजूद मौजूदा व्यवस्था की भाषा में ही बात करता है और अपने लिए अधिकारों की मांग करता है, इस आंदोलन का तार्किक धरातल बिल्कुल स्वायत्त है। यह आवाज उस जगह से आ रही है जिसे हम विकास की होड़ में कहीं पीछे छोड़ आए हैं, जहां हमारा भविष्य भी जुड़ा हुआ है अगर हमें एक कौम के बतौर जिंदा रहना है। 

सरकार कुडनकुलम मामले में पूरी तरहइकतरफा और अलोकतांत्रिक रही है। दो दशक से निर्माणाधीन इस परियोजना को लेकर स्वतंत्र विशेषज्ञों ने शुरू से सवाल उठाए हैं। 1989 में ही पर्यावरणीय जांच के बिना परियोजना शुरू करने पर लोग हजारों की संख्या में कन्याकुमारी में गोलबंद हुए थे, जिन पर गोलियां भी चली थीं। आंदोलन के हालिया दौर में भी, सरकार ने एक तरफ तो लोगों से बातचीत के लिए एक विशेषज्ञ टीम बनाई लेकिन दूसरी तरफ आंदोलन के नेताओं पर देशद्रोह जैसे संगीन और झूठे मुकदमे थोपना जारी रखा। 

वार्ता के आखिरी दौर में जब आंदोलन के प्रतिनिधि (जिनमें महिलाएं भी थीं) सरकारी विशषज्ञों से बातचीत करने जा रहे थे, तो उन पर कांग्रेसी और भगवा गुंडों ने हमला कर दिया। सरकार के साथ इस बातचीत के लिए आंदोलन के लोगों ने परमाणु, पर्यावरण और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों से जुडेÞ बीस से ज्यादा स्वतंत्र विशेषज्ञों की एक टीम बनाई थी और यह मांग की थी कि आंदोलन की तरफ से उन्हें तर्क रखने का मौका दिया जाए। लेकिन सरकार ने एक तरफ तो यह मांग नहीं मानी और फिर जब लोगों ने यह कहा कि संयंत्र की सुरक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय प्रभावों आदि से जुड़ी जानकारी और दस्तावेज उन्हें उपलब्ध कराए जाएं जिससे आंदोलनरत लोग तैयारी के साथ बहस कर सकें, तो सरकार ने साफ मना कर दिया। इसके बाद अपनी मनचाही समिति की रिपोर्ट, जिसमें सभी महत्त्वपूर्ण सवालों से किनारा कर लिया गया है, को केंद्र सरकार आम-सहमति के दस्तावेज के रूप में दिखाती फिर रही है! 

दिसंबर के अपने रूस दौरे में प्रधानमंत्री ने यहां तक कहा कि सरकार ने लोगों को बातचीत में जरूरत से ज्यादा जगह दे दी है और जल्दी ही रिएक्टर चालू कर दिया जाएगा। इसके बावजूद जमीनी आंदोलन लगातार तेज हुआ है और एक पूरा समुदाय अपने अस्तित्व के लिए आखिरी लड़ाई लड़ रहा है। कुछ हफ्तों में तमिलनाडु में जान-बूझ कर बिजली की ज्यादा कटौती की जा रही है और मीडिया में इसकी जिम्मेवारी अणु-विरोधी आंदोलन पर थोप कर उसे बदनाम किया जा रहा है। जबकि सचाई यह है कि कुडनकुलम में अगर दोनों रिएक्टर चालू हो जाएं तब भी तमिलनाडु के हिस्से सिर्फ चार सौ मेगावाट तक बिजली आएगी, जबकि इसी राज्य में अगर सारे मौजूदा बल्ब सीएफएल से बदल दिए जाएं तो साढ़े पांच सौ   मेगावाट बिजली बचाई जा सकती है और अगर पूरी सबसिडी दी जाए तब भी इसका खर्च परमाणु रिएक्टर से बहुत कम बैठता है।

जनसत्ता से आभार सहित.