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Friday, June 21, 2013

उत्तराखण्ड में भयावह तबाही : प्राकृतिक आपदा नहीं, अंधाधुंध पूँजीवादी विकास का नतीजा

प्रकृति के साथ आपराधिक छेड़-छाड और विकास के नाम पर हो रहे पर्यावरण विनाश के कारण उत्तराखंड में जो भयावह तबाही मची है वह प्राकृतिक आपदा नहीं है. बल्कि यह अंधाधुंध और बदहवास पूँजीवादी विकास का नतीजा है.
अब से 137 साल पहले महान विचारक फ्रेडरिक एंगेल्स ने ‘वानर से नर बनने की प्रक्रिया में श्रम की भूमिका’ नामक अपने लेख में प्रकृति और मानव जाति के बीच सामंजस्यपूर्ण सम्बन्धों को बाधित किये जाने के दुष्परिणामों के बारे में जो राय व्यक्त की थी वह आज हू-ब-हू हमारे सामने आ रहे हैं. प्रस्तुत है उस लेख का एक अंuttrakhandश--

...प्रकृति पर अपनी मानवीय विजयों के कारण हमें आत्मप्रशंसा में विभोर नहीं हो जाना चाहिए, क्योंकि वह हर ऐसी विजय का हमसे प्रतिशोध लेती है. यह सही है कि प्रत्येक विजय से पहले-पहल वे ही परिणाम प्राप्त होते हैं, जिनका हमने भरोसा किया था, पर दूसरी और तीसरी बार उसके बिलकुल ही भिन्न और अप्रत्याशित परिणाम होते हैं, जिनसे अक्सर पहले परिणाम का असर जाता रहता है. मेसोपोटामिया, यूनान, एशिया माइनर तथा अन्य स्थानों में जिन लोगों ने कृषियोग्य भूमि प्राप्त करने के लिये वनों को बिलकुल ही नष्ट कर डाला, उन्होंने कभी यह कल्पना तक नहीं की थी कि वनों के साथ आर्द्रता के संग्रह-केन्द्रों और आगारों का उन्मूलन करके वे इन देशों की मौजूदा तबाही की बुनियाद डाल रहे हैं. आल्प्स के इटलीवासियों ने जब पर्वतों की दक्षिणी ढलानों पर चीड़ के वनों को (ये उत्तरी ढलानों पर खूब सुरक्षित रखे गये थे) पूरी तरह से तबाह काट डाला तब उन्हें इस बात का अहसास नहीं था कि ऐसा करके वे अपने प्रदेश के पहाड़ी पशु-पालन पर कुठाराघात कर रहे हैं. इससे भी कम आभास उन्हें इस बात का था कि अपने कार्य द्वारा वे अपने पर्वतीय स्रोतों को वर्ष के अधिक भाग के लिये जलहीन बना रहे हैं और साथ ही इन स्रोतों के लिये यह सम्भव बना रहे हैं कि वे वर्षाऋतु में मैदान में और भी भयावह बाढ़ें लाया करें... हमें हर पग पर यह याद कराया जाता है कि प्रकृति पर हमारा शासन किसी विदेशी जाति पर एक विजेता के शासन जैसा कदापि नहीं है, वह प्रकृति से बाहर के किसी व्यक्ति जैसा शासन नहीं है, बल्कि रक्त, मांस और मस्तिष्क से युक्त हम प्रकृति के ही प्राणी हैं, हमारा अस्तित्व उसके ही मध्य है और उसके ऊपर हमारा सारा शासन केवल इस बात में निहित है कि अन्य सभी प्राणियों से हम इस मानी में श्रेष्ठ हैं कि हम प्रकृति के नियमों को जान सकते हैं और ठीक-ठीक लागू कर सकते हैं.
...जैसा समाज के संबंध में वैसे ही प्रकृति के संबंध में भी वर्तमान उत्पादन-प्रणाली मुख्यतया केवल प्रथम, ठोस परिणाम भर से मतलब रखती है. और तब विस्मय प्रकट किया जाता है कि इस उद्देश्य की पूर्ति के किये गये क्रियाकलाप के दूरवर्ती प्रभाव बिलकुल दूसरे ही प्रकार के, बल्कि मुख्यतया बिलकुल उल्टे ही प्रकार के होते हैं; कि पूर्ति और माँग का तालमेल बिलकुल विपरीत वस्तु में परिणत हो जाता है...