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Saturday, November 10, 2012

पूँजीवाद और “मानव स्वभाव” : एक भंडाफोड

अमरीकी महाद्वीप के मूलनिवासियों का उपहार पर्व- पोटलैच

 -जय मूर 
द वेल्थ ऑफ नेशंस के सबसे मशहूर हिस्से में, जहाँ श्रम विभाजन के फायदों की चर्चा की गयी है, एडम स्मिथ इस सिद्धांत को आगे बढ़ाते हैं कि “यह चीज सभी मनुष्यों में समान है” कि उनमें “एक चीज के बदले दूसरी चीज की लेन-देन, अदला-बदली और विनिमय की स्वाभाविक प्रवृति” पायी जाती है. स्मिथ इस बात को खोल कर नहीं बताते कि क्या यह “प्रवृति” मूल मानवीय स्वभाव का मामला है या, प्रबोधनकालीन एडम स्मिथ के लिए ऐसा मानना सुविधाजनक है कि यह मनुष्य की वैसी ही अनोखी क्षमता है जिस तरह चेतना और बोलने की क्षमता. लेकिन इसी अप्रमाणित धारणा के ऊपर कि ऐसी किसी “प्रवृति” का अस्तित्व है, और इसी के साथ एक और ऐसी ही अप्रमाणित धारणा को मिला कर कि अभाव की परिस्थिति में बेपनाह जरूरतों की ख्वाहिश रखने वाला “स्वामित्वशाली व्यक्तिवाद” विश्वव्यापी जन्मजात मानवीय प्रवृति है, पूरा का पूरा आधुनिक नव-क्लासिकीय अर्थशास्त्र इसी पर टिका हुआ है. मुख्यधारा के अर्थशास्त्र की कोई भी किताब पलट के देखिये तो आपका सामना एडम स्मिथ के प्रसिद्द उद्धरण से होगा, जिसे पूँजीवाद और तथाकथित “मुक्त बाजार” की श्रेष्ठता के पक्ष में एक स्वयंसिद्ध प्रस्थान बिन्दु माना जाता है, क्योंकि उन फर्जी आर्थिक रूपों से इस फर्जी मानवीय प्रवृति का काफी मेल बैठता है.

जिस किसी को भी इतिहास और मानवशास्त्र के गहन अध्ययन का अवसर मिला हो, जैसा कि मुझे, जिसने स्थान और काल से परे मानव समाजों और संस्कृतियों की बड़े पैमाने पर परिवर्तनशीलता पर मुग्ध हुआ हो और कुछ बुनियादी समानताओं और विन्यासों पर विचार किया हो (जिनके अस्तित्व को ऐतिहासिक भौतिकवाद दर्शाता है) तो उसने उपरोक्त धारणा के इस चरम कुतर्क पर ध्यान दिया होगा कि आधुनिक बुर्जुआ का ठेठ चरित्र ही सर्वव्यापी मानव चरित्र है. इतिहास के पूरे दौर में अधिकांश मनुष्यों ने ऐसी “प्रवृति” को नहीं दर्शाया है.

कई समाजों में, और शायद सभी समाजों में व्यापारियों का अस्तित्व रहा है, लेकिन जिन लोगों ने भी खुद को धनी बनाने के उद्देश्य से पेशे के रूप में यह काम किया, उन्हें संदेह से देखा जाता रहा है. व्यापार मुख्यतः सामाजिक हासिये पर ही किया जाता था. और, जैसा कि डेविड ग्राएबर ने “कर्ज” के राजनीतिक अर्थशास्त्र के बारे में अपनी चिरस्मरणीय रचना में दर्शाया है, अब तक ज्ञात कोई भी समाज वस्तु विनिमय पर आधारित नहीं रहा है. आधुनिक युग के पहले तक उपहार की अर्थव्यवस्था सबसे अधिक प्रचलित थी, जिसमें समाज में चीजें एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक परिचालित होती थीं और कोई इस बात की गणना नहीं करता था कि उसने जो कुछ दिया उसके बदले उसी के बराबर या उससे बड़ी कोई चीज वापस मिले, यानी कोई भी व्यक्ति संभावित लाभ की उम्मीद नहीं करता था. “अग्रिम भुगतान” की अवधारणा इसी का आधुनिक प्रतिरूप है.

जब यूरोप के लोगों का पहले-पहल उत्तर-पश्चिमी तटवासी इन्डियन (अमरीका के मूलनिवासी) लोगों से सामना हुआ तो वे यह देख कर हैरान रह गये कि वहाँ के निवासियों में धन बटोरने की अंतहीन पूँजीवादी हवस नहीं थी, बल्कि समाजिक जरूरतें पूरी करने के उद्देश्य से संग्रह करने या उपहार देकर अपनी स्थिति सुधारने की प्रथा थी और उपहार पर्व मनाने और अपनी सम्पदा को बाँट कर खत्म करने का चलन था. इसीलिए उन्होंने वहाँ के लोगों का दमन किया तथा इंडियन लोगों के मन में कार्य नैतिकता, बचत और निवेश के बारे में बुर्जुआ विचारों को ठूँस-ठूँस कर भर दिया. कनाडा की सरकार ने 1884 में उपहार पर्व को गैरकानूनी घोषित कर दिया; फिर भी कुछ मूलनिवासी इंडियनों ने इस “असभ्य” प्रथा को जारी रखा तो उन्हें जेल में ठूँस दिया गया और उनके आनुष्ठानिक स्मरण-चिन्हों को उनसे छीन लिया गया. (उन स्मरण चिन्हों को अजायब घरों में रख दिया गया, जहाँ शीशे के खाने में पड़े-पड़े वे विस्मृति के गर्त में चले गये.) अफ्रीका में, सभी यूरोपीय उपनिवेशवादियों ने एक ही तरह के निराशा का इजहार किया, जब बाजार के प्रलोभनों के जरिये वे वहाँ के मूलनिवासियों से अधिक उत्पादन के लिए कठिन श्रम नहीं करवा पाए. उल्टे हुआ यह कि अफ्रीकी ग्रामीण अगर कुछ अधिक अर्जित करने में समर्थ भी थे, जैसा कि आधुनिक युग से पहले की दुनिया के कई दूसरे हिस्से के किसान, तो वे अक्सर काम काम करना पसंद करते थे और छुट्टी का जम के मजा लेते थे. जब उन पर झोपड़ी टैक्स थोपा गया और हिंसा का तांडव किया गया, तब मजबूर होकर उन्होंने बाजार के लिए अधिक उत्पदान किया.
   
इसके अलावा, यह भी जरूरी नहीं कि बाज़ार में छोटे पैमाने की भागीदारी पक्के तौर पर पूँजीवादी मूल्यों को अपनाने का इजहार करती है, हालाँकि एक लंबे अरसे के दौरान विचारों और कार्रवाइयों पर इसका विनाशकारी प्रभाव जरुर हुआ होगा. लोगों ने “परंपरागत” सामाजिक उत्पादन के लिए “एक चीज के बदले दूसरी चीज की लेन-देन, अदला-बदली और विनिमय” करने का फैसला लिया होगा और जरूरी नहीं कि इसके पीछे मुनाफा कमाना ओर “तरक्की करना” उनका उद्देश्य रहा हो. उपहार की अर्थव्यवस्था भी उसी के साथ-साथ या बाजार आर्थव्यवस्था के साथ तालमेल करते हुए चलती रही होगी. उत्तरी-पश्चिमी तटवासी अमरीकी मूलनिवासी यूरोप के साथ ऊन और मछली का व्यापार करते थे, ताकि बदले में वे अपने उपहार पर्व (पोटलैच) के लिए अनोखी वस्तुएँ हासिल कर सकें.

हालही में मैंने एक दिलचस्प किताब पढ़ी- द डिस्कवरी ऑफ फ़्रांस: ऐ हिस्टोरिकल जोगरफी फ्रॉम द रेवोलूशन टू द फर्स्ट वर्ल्ड वार, जिसके लेखक ग्राहम रोब हैं. इसमें विस्तार से यह बताया गया है कि प्रांतीय फ़्रांस में रोजमर्रे का जनजीवन कैसा था और आधुनिकता के उभर के बाद उसमें किस तरह बदलाव आया. यह ठीक वही समय था जब व्यावहारिक रूप से अब तक अपनी कीमत पर पूरी जिन्दगी गुजारते आ रहे ग्रामीण लोग, अमूमन हैरत और नाउम्मीदी के साथ देख रहे थे कि अब वे “फ़्रांस” नामक एक कहीं बड़े सत्ता के अंग हैं. एक छोटी सी कहानी खास तौर पर मेरे दिमाग में बस गयी है- ऑरजेनिया इलाके में महिलाओं का एक समूह कपड़ों की सिलाई-बुने के लिए एकत्र होता था जहाँ दूसरों के लिए काम करने के बदले घुमंतू व्यापारी उनको बहुत ही थोड़े पैसे देते थे. लेकिन वहाँ मामला पैसा कमाने का था ही नहीं. असली बात शाम होने के बाद भी घर से बाहर निकलने और आपसी मेलजोल की थी. कपड़ों की सिलाई-कढाई से जितने पैसे मिलते थे वे तो चिराग जलाने के लिए तेल खरीदने में ही लग जाते थे. रोब कहते हैं कि इन महिलाओं जैसे लोगों के व्यवहार को प्रेरित करने वाला कारक किसी आर्थिक जरुरत से कहीं ज्यादा अपनी ऊब मिटाना होता था.

ऐसे ही कई और उदाहरण दिये जा सकते हैं जो दिखाते हैं कि एडम स्मिथ ने मानव जाति का जो काल्पनिक खाका बनाया है उसमें अधिकांश मनुष्य फिट नहीं बैठते, न तो स्वाभाविक रूप से और नही “तर्क” का अभ्यास करने से. जैसा कि कार्ल पोलान्यी ने द ग्रेट ट्रांसफोर्मेशन में दिखाया है, मानव समाज विभिन्न प्रकार की आर्थिक तार्किकताओं का वाहक रहा है; सब को उन्होंने इन समूहों में रखा है- परस्पर लेनदेन, पुनर्वितरण, परिवार के उपभोग के लिए उत्पादन और बाजार व्यवस्था. बाजार व्यावस्था की प्रधानता से पहले की अर्थव्यवस्थाएं अकेले व्यक्ति की सत्ता नहीं होती थीं. बावजूद इसके कि वहाँ विभिन्न सत्रों और अधिक समानता वाले समाजों में अंतर मौजूद था, सभी अर्थव्यवस्थाएँ सामाजिक संबंधों में “सन्निहित” या “अंतर्गुम्फित” थीं और सम्मान जैसी नीतियों पर आधारित थीं- सीधे निजी आर्थिक स्वार्थों से उनका कोई लेना-देना नहीं था. पोलान्यी दर्शाते हैं कि किस तरह “एक चीज के बदले दूसरी चीज की लेन-देन, अदला-बदली और विनिमय,” जो इस हद तक समाज की चारित्रिक विशेषता बन गये हैं, इंग्लैण्ड में, जो कि इनका मुख्य उद्भव स्थल है, स्वाभाविक रूप से नहीं आए थे. 18वीं सदी के उत्तरार्ध और 19वीं सदी की शुरुआत (जो इस किताब का शीर्षक है) में मुक्त व्यापार अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों की आड़ में कठोर कानूनों की एक पूरी श्रृंखला को जबरन लागू करके इसे संस्थाबद्ध किया गया था. पूँजीवादी सम्पत्ति संबंधों और पूँजीवादी मानदंडों को थोपने और बनाये रखने में राजसत्ता ने केन्द्रीय भूमिका निभाई थी और आज भी निभा रही है.

अच्छी हैसियत वाले पूँजीपतियों और मुख्यधारा के पूँजीवाद समर्थक अर्थशास्त्रियों की निगाह में निजी स्वार्थों को अधिकाधिक बढ़ाने वाले व्यवहारों के अलावा सभी तरह के आचरण “अतार्किक” होते हैं. स्कूलों में “व्यापार में कैसे सफल हों,” इस बारे में तो ढेर सारे पाठ्यक्रम होते हैं, लेकिन सहकारी समितियों का गठन और संचालन कैसे करें या शोषणकारी और अलगाव का शिकार बनाने वाली “मुक्त बाजार” प्रक्रिया के किसी दूसरे विकल्प के पाठ्यक्रम शायद ही होते हों.

आश्चर्य की बात नहीं कि इस माहौल में एक सामूहिक सुर उभरता है जो किसी भिन्न राय पर विचार करते हुए उसे विदेशी और ‘काल्पनिक” बताता है और कहता है कि इसे तो असफल होना ही है. लेकिन हम यह पूछ सकते हैं कि हमारा यह समाज कितना तार्किक है जहाँ धनी और गरीब के बीच, 1 % और 99 % के बीच विकराल और विस्मयकारी असमानता मौजूद है, जहाँ एक अरब लोग रोज भूखा सोते हैं, जबकि बेलगाम विकास और उसे टिकाये रखने के लिए बेशुमार उपभोग की आदत ने समूची पृथ्वी के पर्यावरण को तबाह कर दिया और इसके विनाश का खतरा पैदा कर दिया?

हालाँकि आधुनिक काल से पहले या उसके शुरूआती युग के लोगों का रोमानी चित्र खींचना उचित नहीं, फिर भी रोब कंगाली की गर्त में पड़े, अनिश्चितता में डूबे फ़्रांसिसी किसान का वर्णन करते हैं जो कुर्क अमीन या मूसलाधार बारिश का इंतजार करता थरथर काँपता रहता था. कितना अच्छा होता कि पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली के चलते उत्पादन क्षमता में जो अद्भुत वृद्धि हुई है उसका संचालन एक समकालीन “सहकारी राष्ट्रमंडल” के जरिये होता, जो पूँजीवादी निजी मुनाफाखोरी से नहीं, बल्कि उपहार अर्थव्यवस्था और इतिहासकारों द्वारा वर्णित मानवीय किस्म की मूल्य-मान्यताओं से प्रेरित होता. 

(जय मूर एक रेडिकल इतिहासकार हैं. वेरमौंट के ग्रामीण इलाके में रहते हैं और जब कभी काम मिल जाता है तो पढाने का काम करते हैं. मंथली रिव्यू से आभार सहित. अनुवाद- दिगम्बर)         

Wednesday, November 7, 2012

वे कुछ भी नहीं देखते, कुछ भी याद नहीं करते

-मार्कंडेय काटजू


रौ में है रख्शे-ऐ-उम्र कहाँ देखिये थमे
नै हाथ बाग पर है, न पा है रकाब में
मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर सारतः आज के भारत की ऐतिहासिक परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करता है.
“रौ” का मतलब है रफ़्तार, “रख्श” का मतलब है घोड़ा (?), “उम्र” का मतलब है समय (इसका मतलब जिन्दगी भी है, लेकिन यहाँ इसका मतलब समय या युग है), “बाग” का मतलब घोड़े का “लगाम” और “रकाब” का मतलब पैर रखने का कुंडा.
इस तरह इस शेर का मतलब है- “समय का घोड़ा सरपट दौड़ रहा है, देखें यह कहाँ जा कर रुकता है/ घुड़सवार के हाथों में लगाम है, न उसके पैर ही कुंडे में हैं.”
ग़ालिब संभवतः 1857 के महान विप्लव के दौर में होने वाली घटनाओं के विषय में लिख रहे थे, जब घटनाएँ सरपट भाग रही थीं. लेकिन ग़ालिब की शायरी की खूबसूरती यही है (जो उर्दू की ज्यादातर शायरी में दिखती है) कि यह स्थान और काल के मामले में सर्वकालिक है.
आज के भारत में, इतिहास की रफ़्तार तेज हो गयी है. घटनाएँ पहले की तुलना में तेजी से घटित हो रही हैं और हर कोई अचम्भे में है कि आखिर इनका अंत कहाँ होगा.
मीडिया में एक के बाद एक घोटाले की रिपोर्ट आ रही है, जिनमें अमूमन उन राजनेताओं के लिप्त होने की बात होती है जो समाज के गरीब और वंचित तबकों के नाम पर कसमें खाते हैं.
टैलीरां (फ़्रांसिसी कूटनीतिग्य) ने बोर्बों वंश के राजाओं के बारे में कहा था कि उन्होंने- “कुछ भी नहीं देखा, कुछ भी याद नहीं किया और कुछ भी नहीं भूला.” अधिकतर भारतीय राजनेता भी आज किसी बोर्बों की याद दिलाते हैं. वे अपने खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश को नहीं देख रहे हैं, जो सारी हदें पर करता जा रहा है. वे इस बात को याद नहीं करते कि बोर्बों शासकों, हैप्सबर्गों और रोमोनोवों का क्या हश्र हुआ (पता नहीं, उन्हें इनके बारे में कुछ मालूम भी है या नहीं). और वे अपनी सत्ता और धन-दौलत को नहीं भूलते, वे यही सोचते हैं कि यह सब हमेशा कायम रहेगा, जैसा कि दुर्भाग्य के शिकार उपरोक्त राजवंशों के लोग सोचा करते थे.
अर्थव्यवस्था निर्णायक कारक है. योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने हाल ही में कहा कि भारतीय सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर में गिरावट आते-आते अब वह 5.5 फीसदी पर ठहर गयी है. यह सुहावनी तस्वीर स्टैण्डर्ड एंड पुअर की इस चेतावनी के एकदम विपरीत है जिसमें कहा गया है कि 24 महीने में भारतीय अर्थव्यवस्था का संप्रभु कर्ज मूल्यांकन (क्रेडिट रेटिंग) घट कर “रद्दी हालत” में पहुँच जायेगा.
जिस चीज को डॉ. अहलुवालिया जैसे अर्थशास्त्री नहीं देखते, वह यह है कि भारत में समस्या  उत्पादन को कैसे बढ़ाया जाय, यह नहीं है (भारी संख्या में इन्जीनियरों और तकनीशियनों तथा विपुल प्राकृतिक संसाधनों को देखते हुए इसे बड़ी आसानी से बढ़ाया जा सकता है) बल्कि समस्या यह है कि भारतीय जनता की क्रय शक्ति कैसे बढ़ाई जाय. आख़िरकार, जो भी उत्पादन होता है, उसे बेचना भी तो होता है, लेकिन बिकेगा कैसे, जबकि हमारी 75-80 फीसदी जनता गरीब है, जो लगभग 25 रुपये रोज पर गुजार-बसर करती है?
यही नहीं, अगर सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि केवल धनी लोगों को और अधिक धनी बनाने के काम आती हो, जबकि गरीब जनता महंगाई के चलते और भी कंगाल होती जा रही हो, तो जाहिर है कि तैयार होने वाला माल बिक ही नहीं सकता, क्योंकि लोगों में खरीदने की क्षमता नहीं है.
हाल के महीनों में, भारत के विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट आयी है. निर्यातोन्मुख उद्योगों को खास तौर पर करारा झटका लगा है, क्योंकि पश्चिमी देशों में मंदी आई हुई है.
भारत की तुलनात्मक स्थिरता का आधार आबादी का महज 15-20 फीसदी मद्ध्यम वर्ग है, जिसकी कुल संख्या, 120 करोड़ की भारी आबादी में लगभग 20-25 करोड़ होगी. हमारे माल और सेवाओं को यही तबका बाजार माँग मुहय्या करता है. आसमान छूती महंगाई के चलते इस मद्ध्यम वर्ग की क्रय शक्ति में भी गिरावट आ रही है. इसी का नतीजा है कि भारतीय स्थिरता की जमीन तेजी से खिसक रही है, जिसे हालिया आन्दोलनों में देखा जा सकता है.
विकराल गरीबी, भारी पैमाने पर बेरोजगारी, आसमान छूती महंगाई, ग़रीबों के इलाज का आभाव, किसानों की आत्महत्याएँ, बाल कुपोषण, इत्यादि, इन सब से एक विस्फोटक मिश्रण तैयार हुआ है. अगर बोर्बों अब भी नहीं जागे (फ़िलहाल जिसकी कोई उम्मीद मुझे दिख नहीं रही है) तो आने वाले समय में, भारत एक लम्बे समय तक चलने वाले उथल-पुथल और अराजकता की गिरफ्त में होगा, और अब वह दिन बहुत दूर नहीं.
(मार्कंडेय काटजू सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और प्रेस काउन्सिल ऑफ इण्डिया के अध्यक्ष हैं. द हिंदू में प्रकाशित अंग्रेजी लेख की साभार प्रस्तुति. अनुवाद- दिगम्बर.)   

Thursday, August 2, 2012

पावर ग्रिड ठप्प या कल्पनाशीलता का लोप?

कल दुनिया के सबसे बड़े बिजली संकट के कारण ट्रेन यातायात बाधित रहा

-एम जी देवसहायम
(लेखक श्री देवसहायम एक सेवानिवृत्त भारतीय प्रसाशनिक अधिकारी [आईएएस] और हरियाणा राज्य विद्युत बोर्ड के पूर्व प्रमुख हैं.)   

मंगलवार को दोपहर एक बजे एक-के-बाद एक तीन ग्रिड फेल होने के कारण इतिहास का सबसे बड़ा बिजली संकट आया जिसने 60 करोड़ लोगो को अपनी चपेट में ले लिया.
राष्ट्रीय पावर ग्रिड एक छोर पर ट्रांसमिसन लाइनों और विद्युत उत्पादन केन्द्रों से जुड़े सब-स्टेशनों और दूसरे छोर पर लोड केन्द्रों (या वितरण कम्पनियों) का आपस में गुथा हुआ जाल है. उत्पादन केन्द्र ट्रांसमिसन लाइनों के जरिये ग्रिड को बिजली भेजते हैं. लोड केन्द्र इन लाइनों से बिजली लेकर अंतिम छोर पर मौजूद उपभोक्ताओं को देते हैं.

बिजली कि आपूर्ति में अवरोध न हो, इसके लिए उत्पादन और खपत के बीच हमेशा एक नाजुक  संतुलन बनाये रखना जरूरी होता है.
भारत में पाँच बिजली ग्रिड हैं- उत्तरी, पूर्वी, उत्तरपूर्वी, दक्षिणी और पश्चिमी. सरकारी कम्पनी पावर ग्रिड कार्पोरेशन, जो उन 95,000 हज़ार सर्किट किलोमीटर से भी ज्यादा ट्रांसमिसन लाइनों का संचालन करती है, जिन के जरिये ये ग्रिड काम करते हैं. इन पाँच ग्रिडो में तीन ग्रिड- उत्तरी, पूर्वी और उत्तरपूर्वी मंगलवार को बैठ गये.
कोई ग्रिड तभी फेल होता है जब इससे जुड़े राज्य या तो इसकी क्षमता से ज्यादा बिजली निकासी करने लगते हैं या उत्पादन केन्द्र से बहुत ज्यादा बिजली आने लगती है. ग्रिड फेल होने का इससे कोई लेना-देना नही होता कि बिजली उत्पादन की स्थापित क्षमता या इसकी मात्रा कितनी है.

क्षमता से ज्यादा बिजली निकासी का मतलब यह है कि एक दिन पहले ग्रिड आपरेटर को जो  रिपोर्ट दी जाती है, जिसमें उस दिन बिजली का कितना उपभोग होना है इसका हर 15 मिनट का ब्यौरा होता है, उसमें बताई गयी क्षमता से ज्यादा बिजली की निकासी करना. केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग हर राज्य के लिए बिजली निकासी की सीमा तय करता है, जो राज्यों और उत्पादक कम्पनियों के बीच हुए समझौते पर आधारित होता है.

ग्रिड फेल होने की मुख्य जिम्मेदारी पवार ग्रिड कार्पोरेशन और नेसनल लोड डिस्पैच सेंटर की होती है और यह विभिन्न उत्पादन, ट्रांसमिसन और वितरण कम्पनियों की भी साझा जिम्मेदारी होती है.
इसका मूल कारण बिजली से सम्बंधित विभिन्न संस्थाओं में फैली सडांध है जिनके पास प्रबंधन का कोई दर्शन नहीं है और जो वितरण और विभाजन की कार्यकुशलता को बिलकुल महत्त्व नहीं देते. वे केवल अधिक से अधिक विद्युत उत्पादन का राग अलापते रहते हैं, और वह भी केंद्रीकृत, क्योंकि उसमें भारी पूँजी निवेश होता है तथा घूसखोरी और भ्रष्टाचार की भरपूर गुन्जाइश होती है.
बिजली विहीन भारत ‘अंधा युग’ में प्रवेश कर रहा है. इसका एक मात्र समाधान है एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना. इसमें विकेन्द्रित रूप से अलग-अलग जगहों पर उत्पादन करना (ग्रिड से इतर अक्षय ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता), वितरण और विभाजन का आधुनिकीकरण, माँग पक्ष का प्रबंधन और अंतिम उपभोक्ता तक पहुँचाने में कार्यकुशलता, सब शामिल है. बिजली उपभोग के मामले में प्रबंध संस्कृति के प्रतिमान में भी बदलाव लाना जरूरी है.
 (अनुवाद- सतीश)

Wednesday, April 18, 2012

पूँजीवाद हमें क्या देता है


--रिचर्ड डी वोल्फ

अमरीका के ज्यादातर राष्ट्रपति एक या एक से अधिक पूँजीवादी गिरावटों (ठहराव, मंदी और संकट) की सदारत करते  आ रहे हैं. रुजवेल्ट के ज़माने से ही अमरीका का हर राष्ट्रपति जनता और पूँजीपतियों की माँग पर मंदी से निपटने के लिए कोई न कोई कार्यक्रम जरुर पेश करता है. रूजवेल्ट और उसके बाद के हर राष्ट्रपति ने यह वादा किया कि उसका कार्यक्रम न केवल मौजूदा आर्थिक कठिनाइयों से मुक्ति दिलाएगा, बल्कि इस बात को भी  सुनिश्चित करेगा कि हम या हमारे बच्चे भविष्य में ऐसी मंदी का दोबारा सामना नहीं करेंगे. ओबामा इस बात की सबसे ताजा मिसाल है.

कोई भी राष्ट्रपति अब तक इस वादे को पूरा नहीं कर पाया. मौजूदा पूँजीवादी संकट पिछले पाँच सालों में अभी बीच रास्ते तक ही पहुँचा है और खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. यह साबित करता है कि भावी आर्थिक संकटों को रोकने का वादा, केवल पिछले हर राष्ट्रपति और उसके  बेशकीमती आर्थिक सलाहकारों को बचाने में ही सहायक रहा है. चूँकि ओबामा का कार्यक्रम भी पिछले राष्ट्रपतियों के कार्यक्रमों से मूलतः भिन्न नहीं है, इसलिए इसकी सफलता की उम्मीद पालने का भी कोई कारण नहीं है.

पूँजीवादी संकट को हल करने में इस असफलता की कीमत हमारे देश के लाखों लोगों  को चुकानी पड़ी, जिन्होंने न केवल रोजगार, रोजगार की सहूलियत और सुरक्षा गंवाने जैसी बार-बार की तबाही झेली, बल्कि हमारे बच्चों के लिए मकान और नौकरी की उम्मीद भी काफी कम होती गयी. पूँजीवादी संकट से उबर पाने में असफलता के चलते आम जनता को जो व्यक्तिगत, पारिवारिक और आर्थिक  नुकसान उठाने पड़े, वे सचमुच विचलित कर देने वाले हैं. लाखों अमरीकी आज या तो रोजगार से वंचित हैं या फिर वे पार्ट-टाइम नौकरी करते हैं, जबकि उन्हें पूरा काम चाहिए. अमरीकी सरकार के मुताबिक अर्थव्यवस्था  के तीस फीसदी मशीन, औजार, ऑफिस, गोदाम और कच्चा माल बेकार पड़े हैं. यह पूँजीवादी व्यवस्था हम लोगों को उस उपज और संपत्ति से वंचित करती है जिसका उत्पादन हो सकता है, बशर्ते लोगों को काम मिले और उत्पादन के साधन बेकार पड़े सड़ते न रहें.

यह उत्पादन हमारे उद्योगों और हमारे शहरों का पुनर्निर्माण कर सकता है, उनको पर्यावरण का सम्मान करने वाली संस्थाओं में परिवर्तित कर सकता है तथा अमरीका और दूसरे देशों की गरीबी दूर कर सकता है. आज जो लोग बेरोजगार हैं उनको काम मिल जाये तो वे बेहतर जिंदगी जी सकते हैं, अपना घर चला सकते हैं और उत्पादन भी बढ़ा सकते हैं. अगर रोजगार चाहने वाले लोगों को बेकार पड़े उत्पादन के साधनों से जोड़कर हमारे लिए जरूरी उत्पादन चालू करने में पूँजीवाद आज इतनी बुरी तरह असफल नहीं होता तो निस्संदेह इससे हम सबका बहुत ही अधिक लाभ होता.

क्या इस बुनियादी समस्या के बारे में सरकारी नीतियां और कार्यक्रम झूठ नहीं फैलाते. आख़िरकार, सभी प्रमुख पार्टियां, नेता, लॉबी बनाने वाले तथा मीडिया और विद्वानों के बीच उनके साथी-संघातियों ने एक साथ मिल कर पूँजीवाद का उत्सव मानाया. पिछले पचास सालों से वे इस बात पर जोर देते रहे कि पूँजीवाद का प्रदर्शन चाहे जितना भी खराब क्यों न हो, इसकी आलोचना करना बेवकूफी, निराधार, बेहूदा, देशद्रोह और घटिया काम है. उनका एक ही मन्त्र रहा है- “पूँजीवाद अच्छा काम करता है.”'

पूँजीवाद की आलोचना पर लगभग पूरे प्रतिबन्ध के सुरक्षा कवच के पीछे अमरीकी पूँजीवादी ब्यवस्था की हालत खस्ता हो गई (आम तौर पर यही होता है जब सामाजिक संस्थाओं की सार्वजनिक आलोचना कि इजाजत नहीं होती). जब 2007 में यह संकट शुरु हुआ, तब पूंजीवाद हम में से अधिकांश लोगों के लिए बुरा काम कर रहा था. आने वाले वर्षों में यह और भी बुरे प्रदर्शन की लगातार चेतावनी दे रहा है. आलोचना से परे, पूँजीवाद को टॉनिक पिलाने वाले अब सरकार पर दबाव डाल रहे हैं कि वह सार्वजनिक खर्चों में कटौती करे, जबकि अमरीकी जनता को इसकी पहले से भी ज्यादा जरुरत है. उनका मूल नारा और कार्यक्रम आज भी यही है- थोड़े से लोगों के लिए आर्थिक स्वास्थ्य लाभ और बहुतों के लिए मितव्ययिता.

1950 और ’60 के दशकों में सबसे धनी अमरीकियों के लिए आय कर ही उच्चतम सीमा 91 प्रतिशत थी जो आज 35 प्रतिशत रह गयी है. 1977 में वे लोग “पूँजीगत लाभ (जब वे शेयर या बोंड की बिक्री खरीद-मूल्य से अधिक दाम पर करते थे) पर 40 प्रतिशत टैक्स जमा करते थे.  आज यह दर 15 प्रतिशत है. आम जनता को टैक्स में इतनी बड़ी छूट मयस्सर नहीं. इन कटौतियों से धनी और भी धनी होते गए, जबकि सरकार को धनि लोगों से टैक्स न मिलने की भरपाई उधार लेकर करना पड़ा. कैसी विचित्र स्थिति है कि धनी लोग अब सरकारी कर्ज का उपभोग कर रहे हैं और इसके बदले आम अमरीकियों की सार्वजानिक सेवाओं में कटौती की जा रही है.

आज हम जिस तरह के आर्थिक संकट के शिकार हैं उसका समाधान राष्ट्रपति का एक और सुधार, नियमन, आर्थिक उत्प्रेरण और घाटे का बजट कार्यक्रम नहीं है. यह तो हम वर्षों से करते ही आ रहे हैं. यह उपाय लोगों को बार-बार इस आर्थिक व्यवस्था द्वारा कठिन समय में धकेलते चले जाने से रोक नहीं पाया. पूँजीवाद की गंभीर, खुली और मुक्त सार्वजनिक आलोचना काफी लंबे अरसे से अपेक्षित है और होना तो यह चाहिए था कि पहले ही इसे रोका ना जाता. हमें इस बात की जाँच करना जरूरी है अमरीका, पूँजीवाद से बेहतर उपाय क्या और कैसे कर सकता है.

किसी भी मानवीय संस्था की तरह आर्थिक व्यवस्था भी जन्म लेती है, समय के साथ फलती-फूलती है और गुजर जाती है. दास प्रथा और सामंतवाद की मृत्यु होने पर पूँजीवाद का जन्म हुआ था. फ़्रांसिसी क्रांतिकारियों के शब्दों में इसने स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा का वादा किया था. इसने उन लक्ष्यों की ओर कुछ सही प्रगति भी की. हालाँकि इसी ने कुछ ऐसे भारी अवरोध भी खड़े किये, जिससे इन लक्ष्यों को वास्तव में हासिल करना असंभव हो जाय. उनमे से प्रमुख है, पूँजीवादी उद्यमों के भीतर उत्पादन का संगठन.

पूँजीवादी उद्यम जो आज की अर्थव्यवस्था पर हावी हैं, उनके बड़े अंशधारक और उनके द्वारा चुने गए बोर्ड के डायरेक्टर विशेष हैसियत वाले लोग होते हैं और वे सभी जरुरी फैसले अलोकतांत्रिक तरीके से लेते हैं. बड़े अंशधारक और बोर्ड के डायरेक्टर उन पूंजीवादी उद्यमों से सीधे जुड़े हुए लोगों में से गिने-चुने लोग ही होते हैं. भारी संख्या उन उद्यमों के मजदूर और उन उद्यमों पर निर्भर जन समुदाय होते हैं. 
फिर भी इन थोड़े से लोगों का हर निर्णय (कि क्या, कैसे कहाँ उत्पादित करना है और उससे होनेवाले मुनाफे को कहाँ खर्च करना है) एक बहुत बड़ी आबादी की जिंदगी पर असर डालता है- जिसमें संकट का आना भी शामिल है- जबकि उन बहुसंख्य लोगों को निर्णय लेने में सीधे भागीदारी करने की इजाजत नहीं होती. तब इसमें भला आश्चर्य की क्या बात कि मुट्ठी भर लोग आमदनी और मुनाफे का बहुत बड़ा भाग अपने ही पास रख लेते हैं. इसी की बदौलत वे राजनीति पर अपनी गिरफ्त कायम कर लेते हैं और आर्थिक नुकसान और वंचना को खत्म करने की माँग कर रहे बहुमत की राह में रोडे अटकाते हैं. यही कारण है कि आज सरकार धनी लोगों को संकट से उबारने पर पैसा बहा रही है, जबकि हम लोगों को मितव्ययिता का पाठ पढ़ा रही है. 

जब तक समाज इस पूँजीवादी उत्पादन के संगठन को लाँघ कर आगे नही बढ़ता, आर्थिक संकट यूँ ही आता रहेगा और वे जनता से इसी तरह उससे उबारने के बारे में झूठे वादे करते रहेंगे. व्यवस्था के मुट्ठी भर कर्ताधर्ताओं से यह उम्मीद करना हद दर्जे का भोलापन है कि जो व्यवस्था उनके हित में भलीभांति काम कर रही है, उसकी अर्थव्यवस्था और राजनीति का वे जनवादीकरण करेंगे. यह काम तो 99 प्रतिशत जनता के ही जिम्मे है.

(रिचर्ड डी वोल्फ मेसाचुसेट्स विश्वविद्यालय के मानद प्रोफ़ेसर, डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता, रेडियो कार्यक्रम संचालक और कई पुस्तकों के लेखक हैं. यह लेख "मंथली रिव्यू" से लेकर अनुवाद किया गया है. अनुवाद- दिगंबर)

Friday, April 6, 2012

दुनिया पर 1318 कम्पनियों का कब्जा

वाल स्ट्रीट पर कब्जा करोआंदोलन ने अपना निशाना एक प्रतित बहुराष्ट्रीय निगमों को बनाया था। उनके नारे, निशाना और नजरिया कितने सही हैइसका अंदाजा हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन से लगा सकते हैं।
जूरिख स्थित इंस्टिच्यूट ऑफ टेकनोलोजी की तीन सदस्यीय टीम ने एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में उन्होंने दुनिया भर की कुल 3.7 करोड़ कम्पनियों और निवेकों में से 3060 को छाँटकर अध्ययन का ब्योरा दिया है। जटिल गणतीय मॉडल से यह अध्ययन किया गया जिसमें इस बात को स्पष्ट किया गया है कि कैसे ये कम्पनियाँ अन्य कम्पनियों के शेयर खरीदकर उसमें साझेदारी करती हैं और किस तरह केवल 1318 कम्पनियों के एक गिरोह ने दुनिया की 60 प्रतित आमदनी पर मालिकाना कायम कर लिया है। इससे भी आगे इस रिपोर्ट ने आपस में गुँथी हुई 147 कम्पनियों के एक महा-गिरोह का भी पता लगाया है जिसका ऊपर बताये गये गिरोह की कुल सम्पत्ति में से 40 प्रतित पर कब्जा है। इन मुट्ठीभर कम्पनियों में बर्कले बैंक, जेपी मॉर्गन चेज एण्ड कम्पनी और गोल्डमैन सैक्स जैसे ज्यादातर बैंक शामिल है। लन्दन विश्वविद्यालय में बृहद अर्थशास्त्र के एक विशेषज्ञ का कहना है कि इस विश्लेषण का महत्त्व केवल इतना ही नहीं है कि इसने मुट्ठीभर लोगों द्वारा अर्थव्यवस्था पर कब्जा जमाये जाने को उजागर कर दिया है, बल्कि यह विश्व-अर्थव्यवस्था के टिकाऊपन के बारे में हमारी जानकारी भी बढ़ाता है।
जूरिख टीम के अनुसार कम्पनियों की ऐसी गिरोहबंदी एक विकट समस्या बन गयी है। इस गिरोहबंदी में अगर कोई एक कम्पनी डूबती है तो उससे जुड़ी तमाम कम्पनियों की अर्थव्यवस्था भरभराकर गिरने लगती है। नतीजतन पुरे विश्व की अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त हो जाती है। अमरीका में 2008 के संकट तथा अन्य संकटों ने इस बात को सही ठहराया है। जूरिख टीम का मानना हैं कि भले ही इस महा-गिरोह का जन्म सहज तरीके से हुआ हो, लेकिन विभिन्न देशों की राजनीतिक सत्ता पर इस महा-गिरोह का दबदबा कायम है।
जाहिर हैं कि विश्व-अर्थव्यवस्था पर अपने दबदबे से इस महा-गिरोह को असीम क्ति हासिल हुई है। उसके चलते इनको बेलगाम ताकत मिला है। इस बेलगाम ताकत तथा पूँजी संचय और मुनाफाखोरी की इनकी घृणित बीमारी ने इनको इतना क्रूर और निष्ठुर बना दिया है। कि किसी दे की अर्थव्यवस्था को चुटकियों में तबाह कर देना या लाखों लोगों का कत्लेआम करवाना इनके लिए आम बात हो गयी है। अपफगानिस्तान, इराक और लीबिया की तबाही इसके जीवंत उदाहरण हैं। ईरान पर हमले के लिए लगातार उकसावा भी इसी की मिसाल है।
आज जबकि यह पूरी तरह सापफ हो गया है कि हमारी धरती 99 प्रतित आम मेहनतक जनता और एक प्रतित धनाढ्यों के दो खेमों में बँट चुकी है और दुनिया की ज्यादातर मुसीबतें चाहे सामाजिक-आर्थिक संकट हो या जलवायु संकट, इन सबके पीछे इसी एक प्रतित लुटेरों का हाथ है। इसलिए पूरी मानवता और अपनी धरती को बचाने के लिए हर हालत में इन एक प्रतित के खिलाफ हम 99 प्रतित को एकजुट होकर इन्हें परास्त करना होगा। निश्चय ही यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी बहुत ही चुनौती भरा है। उन्नत चेतना और मजबूत संगठन के बल पर ही यह कार्यभार पूरा किया जा सकता है।
(देश-विदेश अंक-१३ में प्रकाशित)